वर्चुअल वर्ल्ड में क्या है सुन्दरता का मापदण्ड?

डॉ. नीलम महेन्द्र

हाल ही में आईआईटी में पढऩे वाली एक लडक़ी के आत्महत्या करने की खबर आई। वह मोटी थी और उसे अपना मोटा होना इतना शर्मिंदा करता था कि वह अवसाद में चली गयी। अपनी परीक्षाओं में अव्वल आना भी उसे इस दु:ख से बाहर नहीं कर पाया। यानी उसकी बौद्धिक क्षमता शारीरिक आकर्षण से हार गयी। आज हम जिस युग में जी रहे हैं वह एक ऐसा वैज्ञानिक और औद्योगिक युग है जहां भौतिकवाद अपने चरम पर है। इस युग में हर चीज का कृत्रिम उत्पादन हो रहा है। यह ऐसा दौर है जिसमें ईश्वर की बनाई दुनिया से इतर मनुष्य ने एक नई दुनिया का ही अविष्कार कर लिया है यानी वर्चुअल वल्र्ड। इतना ही नहीं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशल इंटेलीजेंस ने भी इस युग में अपनी क्रांतिकारी आमद दर्ज कर दी है। ऐसे दौर में सौंदर्य कैसे अछूता रह सकता था। इसलिए आज सुंदरता एक नैसर्गिक गुण नहीं रह गया है अपितु यह अरबों के कॉस्मेटिक उद्योग के बाजारवाद का परिणाम बन चुका है। कॉस्मेटिक्स और कॉस्मेटिक सर्जरी ने सौंदर्य की प्राकृतिक दुनिया पर कब्जा कर लिया है। आज नारी को यह बताया जा रहा है कि सुंदरता वह नहीं है जो उसके पास है। बल्कि आज सुदंरता के नए मापदंड हैं और जो स्त्री इन पर खरी नहीं उतरती वह सुंदर नहीं है।

परिणामस्वरूप आज की नारी इस पुरुष प्रधान समाज द्वारा तय किए गए खूबसूरती के मानकों पर खरा उतरने के लिए अपने शरीर के साथ भूखा रहने से लेकर और न जाने कितने अत्याचार कर रही है यह किसी से छुपा नहीं है। सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि खूबसूरत दिखने के लिए महिलाएं उन ब्यूटी पार्लर्स में जाती हैं जिनका संचालन करने वाली महिलाओं का सुंदरता अथवा सौंदर्य के इन मानकों से दूर दूर तक कोई नाता ही नहीं होता।

दरअसल आज हम भूल गए हैं कि सुंदरता चेहरे का नहीं, दिल का गुण है। सुंदरता वह नहीं होती जो आईने में दिखाई देती है बल्कि वह होती है जो महसूस की जाती है। हम भूल गए हैं कि सम्पूर्ण सृष्टि ईश्वर का ही हस्ताक्षर है और इस शरीर के साथ साथ हमारा यह जीवन हमें उस प्रभु का दिया एक अनमोल उपहार है। आज सुंदरता में पूर्णता की चाह में स्त्री भूल गई है कि अधूरेपन और अव्यवस्था में भी एक खूबसूरती होती है। वह भूल गई है कि ईश्वर की बनाई हर चीज खूबसूरत होती है। कली की सुंदरता फूल से कम नहीं होती और बगीचे की खूबसूरती वन से अधिक नहीं होती। सूर्योदय की अपनी खूबसूरती है तो सूर्यास्त की अपनी। पहाड़ों की अपनी सुंदरता है तो नदियों और समुद्र की अपनी। अगर हमें मोर अपनी ओर आकर्षित करता है तो कोयल भी। वस्तुत: खूबसूरती तो प्रकृति की हर वस्तु में होती है लेकिन दुर्भाग्यवश हर किसी को दिखाई नहीं देती।

कहते हैं कि सुंदरता देखने वाले की आँखों में होती है इसलिए जिस दिन स्त्री खुद को खुद की नजरों से देखेगी उस दिन उसकी सौंदर्य की परिभाषा भी बदल जाएगी। वह समझ जाएगी कि सुंदर तो ईश्वर की बनाई हर कृति होती है। जब किसी वस्तु की सुंदरता के मापदंड तय कर दिए जाते हैं या तकनीकी रूप से सुंदरता की बात की जाती है तो इसका मतलब उसके ज्यामितीय रूप से होता है। उसके अंगों के माप से होता है या फिर उसके रंग और भौतिक स्वरूप से होता है। स्त्री को समझना होगा कि ऐसे मापदंडों के जाल में जो स्त्री अपने शरीर की सुंदरता ढूंढती है, जब वह खुद ही देह से परे अपना आस्तित्व नहीं देख पाएगी तो यह पुरुष प्रधान समाज कैसे देख पाएगा। इसलिए सबसे पहले तो स्त्री को स्वयं को इन मापदंडों से मुक्त करना होगा। इस दौर में जब पुरुषों के गोरे होने की क्रीमों के विज्ञापनों की बाढ़ आई हो तो उसे अपने सांवले रंग पर गर्व महसूस करना होगा।

इस दौर में जब पुरुषों में अपनी बाइसेप्स ट्राइसेप्स और एब्स का प्रदर्शन करने की होड़ लगी हो, उसे अपने व्यक्तित्व को संवारना होगा। वह जो है जैसी है खुद पर नाज करना होगा। उसे याद दिलाना होगा खुद को कि यह वह देश है जहां अगर गौरी हैं तो महाकाली भी हैं और पूजनीय दोनों ही हैं। ये वह देश है जहां नारी केवल स्त्री देह नहीं है वह शक्ति का केंद्र है, शक्ति, धन व ज्ञान की देवी है, अन्नपूर्णा और सृजनकर्ता है। वह कोमलता का प्रतीक है तो जन्मदात्री के रूप में सहनशक्ति की पराकाष्ठा है। यह वो देश है जहां सौंदर्य एक भौतिक गुण नहीं एक आध्यात्मिक अनुभूति है। क्योंकि यह वो देश है जहां सुंदरता की परिभाषा है, ‘सत्यं शिवम सुंदरम’ है। यानी जो सत्य है वह शिव है और वह ही सुंदर है। और सत्य क्या है? सत्य तो वह आत्मा है जो इस शरीर में निवास करती है। वह अगर सुंदर है तो यह सुंदरता ही सत्य है। इसलिए हमारी संस्कृति में बाहरी गुणों से अधिक महत्व भीतरी गुणों को दिया गया है। यही कारण है कि शास्त्रों में तन से अधिक मन की सुदंरता को महत्व दिया गया है। इसलिए जिस दिन स्त्री खुद को पहचान लेगी वो सौंदर्य के मौजूदा मानकों को अस्वीकार करके सुंदरता की अपनी नई परिभाषा गढ़ेगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)