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मच्छर दिवस पर विशेष, जाने पूरे विश्व में इनकी प्रजातियां और इनसे फैलने वाले रोग

आज के दिवस के विषय में आपको सुनकर और पढ़कर बड़ा आश्चर्य लगेगा की क्या मच्छर दिवस विश्व में सभी देशों द्वारा बनाया जाता है।

rajeev gupta janasnehi
Written By rajeev gupta janasnehiPublished By Shweta
Updated on: 19 Aug 2021 2:29 PM GMT
कॉन्सेप्ट फोटो
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कॉन्सेप्ट फोटो ( फोटो सौजन्य से सोशल मीडिया)

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आज के दिवस के विषय में आपको सुनकर और पढ़कर बड़ा आश्चर्य लगेगा की क्या मच्छर दिवस विश्व में सभी देशों द्वारा बनाया जाता है जी हां यह मच्छर ही है जिसने समय-समय पर लाखों की संख्या में मानव जाति को गोकुलवासी बना दिया है। आज इस छोटे से मच्छर के बड़े घातक परिणामों की हम चर्चा कर रहे हैं।यह छोटा सा मच्छर बहुत गम्भीर घाव देता है। यह डायलॉग आपको याद होगा एक छोटा सा मच्छर आदमी को ————-बना देता हैं। हम सभी जानते हैं जुलाई अगस्त के महीने में बरसात के दिन होते हैं और जहां पानी भरता है या रुकता है और गंदगी होती है वहां पर यह मच्छर जन्म ले लेते हैं और इनके जन्म के साथ ही मानव जाति के लिए बीमारी और दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है और यह मच्छर विश्व भर में तमाम लोगों को रोगी बनाने के साथ उन्हें गोकुलवासी बनाने से भी नहीं चूकते हैं। इसलिए पूरे विश्व में मच्छरों के दुष्परिणाम को जागृत करने के लिए व उनसे कैसे बचा जाए ,इसके लिए 20 अगस्त को विश्व मच्छर दिवस के रूप में चिन्हित किया गया है। यह दिवस ना तो गिफ्ट देता है ना पैर छूता है यह केवल और केवल सामाजिक तौर पर व्यक्तिगत तौर पर और सरकारी तौर पर हम क्या व्यवस्थाएं अपनाएं जिससे इस प्रकोप से बचे रहें। यहां पर आप सभी को उल्लेखित है कि समय-समय पर मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया वायरल आदि बीमारी फैलती है।

सभी देशों में स्वास्थ्य व शहर की सफाई व्यवस्था के लिए उनके अपने विभाग होते हैं जो दिन प्रतिदिन स्वास्थ्य की शहर की सफाई व्यवस्था करते हैं। राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनवीबीडीसीपी) यह भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय के तकनीकी विभागों में से एक है और भारत में सभी वेक्टर-जनित रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए उत्तरदायी नोडल एजेंसी है।परंतु सीधे व प्रतिदिन स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा व नगर निगम और नगर निगम के स्वास्थ्य विभाग द्वारा यह काम बड़ी शिद्दत से किया जाता है परंतु हम सभी जानते हैं कि भारत में सरकारी व्यवस्थाएं कितनी शिद्दत से काम करती हैं। बरसात आने से पहले जिन नालों की सफाई की जानी चाहिए और उनके मलबों को उठाकर एक व्यवस्थित जगह पर पहुंचाना चाहिए तो यह काम का सही समय बरसात शुरू होने पर ही उन्हें समझ में आता है जिससे सफाई करना या ना करना उसका अर्थ खत्म कर देता है क्योंकि नालों से निकाला गया मलवा बरसात में बह कर या वाहनों के चलते हुए वह वापस नालियों नालों को जाम कर देता है।

स्वास्थ्य विभाग को व नगर निगम के कामों को वह रोज अंजाम तो देता है परंतु कर्मचारियों पर अंकुश ना होना शहर की बढ़ती हुई जनसंख्या से उनके द्वारा बनाए गए प्रोग्रामों को पतीला लग जाता है। जिसका परिणाम यह रहता है की जगह जगह पर मलवा, गंदगी, कूड़े के ढेर जलभराव की स्थिति बनी रहती है जिसकी वजह से मच्छरों का न केवल प्रजनन होता है बल्कि खा पी के हष्ट पुष्ट होते हैं और फिर मानव का खून चूसते उसे बीमारी ग्रस्त करते हैं। ऐसा नहीं है कि सारा दोष सरकारी विभागों का हो हम भारतीयों की लापरवाही भी इसमें काफी हद तक सहायक होती है क्योंकि हम भी नियम कायदे कानून का पालन नहीं करते हैं बस मेरा घर मेरी जगह साफ रहे इस स्वार्थ के चलते हुए हम सार्वजनिक स्थानों पर पानी और कूड़ा फेंक देते है। हमारी सजगता इतनी कमजोर है कि हम अपने एरिया के पार्षद और नगर निगम से समय-समय पर ना तो सफाई के लिए मांग करते हैं और ना ही फागिंग वगैरह कराने का आग्रह करते हैं। विभाग अपने समय पर अपने तरीके से वह सफाई और फागिंग करके चला जाता है। कुछ जगह जहां पर आवश्यक होता है वह उससे छूट जाता है जिसकी परिणीति दुष्परिणाम में बदलती है। 3 प्रजाति के मच्छर पनपते व आतंक मचाते हैं जिससे निम्नलिखित मच्छर व बीमारियां विश्व में होती हैं_

एडीज: चिकनगुनिया, डेंगू बुख़ार, लिम्फेटिक फाइलेरिया, रिफ्ट वैली बुखार, पीला बुखार (पीत ज्वर), ज़ीका। एक प्रकार का एडीज मच्छर, एक वर्ष से अधिक समय तक पानी के बिना रह सकता है।

एनोफिलीज़: मलेरिया, लिम्फेटिक फाइलेरिया (अफ्रीका में)।एनोफिलीज मच्छरों की लगभग 40 प्रजातियां हैं जो मनुष्यों में मलेरिया के लिए जिम्मेदार हैं|ये मच्छर ज्यादातर सुबह या सुबह के समय काटते हैं।

क्यूलेक्: जापानी इन्सेफेलाइटिस, लिम्फेटिक फाइलेरिया, वेस्ट नाइल फ़ीवर।

अमेरिकन मॉस्किटो कंट्रोल एसोसिएशन के मुताबिक हर साल दुनियाभर में मच्छर के काटने की वजह से 1 मिलियन से अधिक लोगों की मौत होती है। वही यूनिसेफ(UNICEF ) की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्वभर की 40 प्रतिशत तक की जनसंख्या उन इलाकों में रहती है, जहां मलेरिया होने का खतरा सबसे अधिक है। मादा मच्छर काटते हैं क्योंकि उन्हें अंडे के उत्पादन के लिए रक्त की आवश्यकता होती है जबकि नर मच्छर फूल अमृत या चीनी स्रोतों पर जिंदा रहते हैं।

हम लोगों को मानसून में मच्छर जनित बीमारियों के खिलाफ रोकथाम को कुछ बातों का ध्यान भी रखना चाहिए जैसे पानी को कही भी जमा ना होने दे ऐसे में पानी के कंटेनर व कूलर खाली कर दें और जिन जगहों पर पानी के जमा होने की उम्मीद हैं वहां कीटनाशकों का उपयोग करें। रोजाना मच्छरदानी के बिना न सोएं.और हल्के रंग के कपड़े पूरे कपड़े पहनकर रहें। मच्छर ना काटें इसके लिए क्रीम लगाकर रखें।कूड़ा करकट व झाड़ियों को साफ़ करते रहे नही तो मच्छरों के चपटे में आ जाएँगे| अपने इलाकों में मच्छरों को पैदा न होने दें|अपने घर की खिड़कियों और दरवाजों को बंद रखें.रोज नहाएं और खुद को साफ रखें क्योंकि मच्छर पसीने से आकर्षित होते हैं।

डस्टबिन को हमेशा ढक कर रखें।अवशिष्ट कीटनाशकों द्वारा दीवारों और अन्य सतहों को कोटिंग करके भी रोका जा सकता है। मच्छर हमेशा से ही लोगों की नजर में रहता है और सभी उससे बचने का प्रयत्न करते हैं। पुराने समय में गांवों में लोग नीम के पत्तों का धुआं आदि का उपयोग मच्छर से बचने के लिए करते थे। आधुनिक समय में आज कई उपकरण व क्रीम व कोईल डिस्कवर किए गए जो मच्छरों से बचाव करते हैं।भारत इसका बहुत बड़ा मार्केट बनता जा रहा है अब तो मच्छरों से बचाव स्टिकर भी आ गये है। विश्व मच्छर दिवस प्रतिवर्ष 20 अगस्त को मनाया जाता है। यह दिवस ब्रिटिश चिकित्सक, सर रोनाल्ड रॉस की स्मृति में मनाया जाता है, जिन्होंने वर्ष 1897 में यह खोज की थी, कि 'मनुष्य में मलेरिया के संचरण के लिए मादा मच्छर उत्तरदायी है'। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन और ट्रॉपिकल मेडिसिन ने विश्व मच्छर दिवस मनाने की शुरूआत वर्ष 1930 में की थी।

Shweta

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