साधन संपन्नता से नहीं योग की सात्विकता से जीवन होता है खुशहाल

साधन संपन्नता से नहीं योग की सात्विकता से जीवन होता है खुशहाल। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण आपको योगमय जीवन को अपनाने पर दिखाई देगा।  प्रातः कालीन बेला में प्रथम तो प्रातः 4:00 बजे बिस्तर छोड़ने का अभ्यास करें। नींद खुलने के बाद तुरंत झटके में ना उठें। लेटे ही लेटे भगवान के स्मरण के उपरांत उठें और धरती मां को चरण स्पर्श कर।अपने से बड़े बुजुर्गों के पैर छुएं। फिर ताम्बे के पात्र में रखे जल को थोड़ा सा गुनगुना करें और धीरे-धीरे सिप सिप करके जैसे चाय का आनंद लेते हुए पीते हैं वैसे ही कम से कम दो गिलास पानी पिएं इस क्रिया को उषा पान कहते हैं।

साधन संपन्नता से नहीं योग की सात्विकता से जीवन होता है खुशहाल। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण आपको योगमय जीवन को अपनाने पर दिखाई देगा।  प्रातः कालीन बेला में प्रथम तो प्रातः 4:00 बजे बिस्तर छोड़ने का अभ्यास करें। नींद खुलने के बाद तुरंत झटके में ना उठें। लेटे ही लेटे भगवान के स्मरण के उपरांत उठें और धरती मां को चरण स्पर्श कर।अपने से बड़े बुजुर्गों के पैर छुएं। फिर ताम्बे के पात्र में रखे जल को थोड़ा सा गुनगुना करें और धीरे-धीरे सिप सिप करके जैसे चाय का आनंद लेते हुए पीते हैं वैसे ही कम से कम दो गिलास पानी पिएं इस क्रिया को उषा पान कहते हैं।

दोनों हाथ ऊपर की ओर खींचते हुए ताड़ासन की मुद्रा में 1 मिनट तक पैर के पंजो पर खड़े होकर के दोनों हाथ कान से सटे हुए अपने पूरे शरीर को ऊपर की ओर खींचें इतनी क्रिया करते ही करते ही आप को शौचालय जाने की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी शौच क्रिया से निवृत्त होने के उपरांत स्वच्छ शरीर, विद्युत के कुचालक आसन पर योगा मैट या तखत पर चादर बिछा करके 2 से 3 मिनट तक भस्त्रिका प्राणायाम करें। इसके लिए आपको ध्यान मुद्रा में बैठ कर के दोनों नासिका छिद्रों से तीव्रता के साथ प्राणवायु को बलपूर्वक खींचना है और बाहर छोड़ना है। इसमें काफी ताकत लगेगी 2 से 3 मिनट करने के उपरांत आप कुछ ऐसे व्यायाम ,पी टी, दंड बैठक जो आपको सुगमता से आता हो उसे 15 से 20 मिनट तक निरंतर लगातार करें, चाहे एक ही स्थान पर दौड़ने का कार्य चाहे उठने बैठने का कार्य चाहे दंड बैठक का कार्य जिससे कि आपका शरीर थोड़ा सा गर्म हो जाए।

सिद्धासन सुखासन अथवा पद्मासन

बॉडी वार्म अप करने के बाद आप पुनः सिद्धासन सुखासन अथवा पद्मासन में योगा मैट अथवा विद्युत कुचालक आसन पर ध्यान मुद्रा में बैठ जाएं ध्यान मुद्रा के लिए आपको पलथी लगा करके अथवा सुखासन सिद्धासन या पद्मासन में हथेलियों का रुख ऊपर करते हुए जंघाओ पर हाथों को रखें जीव की प्रतीकात्मक उंगली तर्जनी को ब्रह्म के प्रतीक उंगली अंगूठा के अग्रभाग को स्पर्श करते हुए थोड़ा सा पुषकर दें अर्थात दोनों अंगूठे और तर्जनी के अग्रभाग को आपस में मिलाकर के दबाएं बंद आंखों के साथ पूरा ध्यान जहां पर तिलक लगाते हैं, बहने जहां पर बिंदी लगाती हैं लगाएं। उस स्थान को आज्ञा चक्र कहते हैं आज्ञा चक्र पर पूरा ध्यान केंद्रित करें।

अब पुनः भस्त्रिका प्राणायाम आरंभ करें इस समय आप अनुसंधान करें कि जब पहली बार आपने भस्त्रिका प्राणायाम किया था तब दोनों नासिका छिद्रों से प्राणवायु को खींचने में कितना बल लगाना पड़ रहा था और इस वक्त कितनी सुगमता के साथ प्राण वायु दोनों नासिका छिद्रों से पूरे डायफाम अर्थात दोनों फेफड़ों तक बड़ी सुगमता से भर जाती है योग की भाषा में प्राणवायु के भरने की क्रिया पूरक कहते हैं और बाहर फेंकने की क्रिया को रेचक कहते हैं 2:5 सेकेंड में पूरक और ढाई सेकंड में रेचक करने का विधान है। भस्त्रिका प्राणायाम 5 से 7 मिनट अधिकतम करने का विधान है।

कपालभाटी प्राणायाम

कपालभाटी प्राणायाम 10 से 15 मिनट तक निरंतर करना है इसमें आपको सिर्फ और सिर्फ रेचक क्रिया करनी है अर्थात दोनों नासिका छिद्रों से एक लय के साथ एक सेकंड में एक बार अर्थात 1 मिनट में 60 बार 5 मिनट में कम से कम 300 बार और 10 मिनट तक यदि आप करेंगे तो 600 बार दोनों नासिका छिद्रों से प्राणवायु को बाहर फेंकने का कार्य करना होता है। इस दौरान पेट में आकुंचन और प्रसारण की क्रिया होती है पेट में नाभि का भाग अपने आप अंदर और बाहर होता रहता है संभव है कि हल्का हल्का मीठा मीठा थोड़ा सा दर्द पेट में आपको महसूस हो किंतु बिना किसी भय के क्रिया को निरंतरता के साथ लयबद्धता के साथ एकरूपता के साथ निरंतर 10 मिनट तक बंद आंखों के साथ एकाग्रता पूर्वक करने का अभ्यास करते हैं।

पैंरों को हिलाएं

आरंभ में इतना प्राणायाम करने के उपरांत पैरों को खोलेंगे हिलाएंगे जिससे कि पैर की नस नाड़ियों में रक्त का संचार सामान्य रूप से प्रवाहित होता रहे नसों में अकड़न ऐठन ना उत्पन्न होने पाए पैरों को हिला लेते हैं सांस भरते हुए दोनों पंजे अंदर की ओर खींचे थोड़ा सा ठहराव महसूस करें और घुटने के नीचे भाग से पृथ्वी मां को पूरा दबाए दोनों हाथों से पृथ्वी मां को दबाए फिर सांस छोड़ते हुए पंजे बाहर की ओर फेंके फिर रुक जाएं सांसे वाहर फेके , घुटने के नीचे भाग से पृथ्वी मां को पूरा दबाने का अभ्यास करते हैं ऐसे ही पैर के दोनों पंजों से गोल गोल बड़ा सा जीरो बनाने का अभ्यास दक्षिणावर्त वामावर्त घुमा करके क्लाकवाइज ओर एंटीक्लाकवाइज पैरों को घुमाते हैं।

तितली आसन

फिर तितली आसन में बैठ जाते हैं दोनों पैरों को खींचकर के पैर की एड़ियां आपके शरीर से स्पर्श कर जाएं और दोनों हाथों से पैर के अग्र भाग को पंजों को पकड़ लेते हैं पैर के घुटनों को तितली के पंखों की भांति हिलाते हैं इसे तितली आसन के नाम से जाना जाता है। उसके उपरांत खड़े होकर की कम से कम 5 मिनट लगातार एक ही स्थान पर दौड़ने का अभ्यास करते हैं फिर रुक कर के सावधान मुद्रा में सांसे लंबी लंबी भरे और छोड़ो फिर पुनः सिद्धासन और सुखासन में बैठकर के त्रिबंध के साथ वाह्य प्राणायाम अग्निसार क्रिया उज्जाई प्राणायाम करेंगे फिर अनुलोम विलोम के बाद भ्रामरी प्राणायाम और उदगीद के बाद 5 मिनट बंद आंखों के साथ ईश्वर में ध्यान लगाते हैं।

आसन पर बैठे हुए ही ऐसा आभास करते हैं कि आप मंदिर अथवा अपने घर के पूजा घर में बैठे हुए हैं और आप के आराध्य देव जो भी इष्टदेव हैं, चाहे वह राम चाहे वो कृष्ण चाहे मां दुर्गा अथवा भगवान शंकरआपके जो भी ईश्वर हैं जिनकी आप पूजा करते हैं उनके साथ एकाकार होने का भाव परिलक्षित करें इतना एकाग्र होकर के उनका चिंतन करें कि उनका प्रतिबिंब आपकी आंखों के सामने उपस्थित हो जाए फिर चेतना में लौटते हुए दोनों हाथ ऊपर उठाकर के घर्षण और प्राप्त ऊर्जा को आंखों पर देकर के आंखों को खोलने का अभ्यास करना चाहिए।

पथ्य अपथ्य आहार-विहार

प्राणायाम व्यायाम से निवृत्त होने के उपरांत पसीने से आप स्वस्थ हो चुके होंगे शरीर को स्वच्छ करके फिर आप प्रात कालीन के नाश्ते की ओर बढ़ेंगे प्रातः काल फल जूस स्प्राउट अंकुरित अन्न यह 8:00 बजे तक निश्चित तौर पर लेकर के आप अपने कार्यों की ओर आगे बढ़ सकते हैं दोपहर में 1:00 बजे से 1:30 के बीच पर्याप्त भोजन चार रोटी एक कटोरी सब्जी एक कटोरी दाल सलाद चावल या जो भी सुगमता से आपको भोजन प्राप्त हो उसे आप निश्चित रूप से लेना सुनिश्चित करें।

यहां यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि शास्त्रों में बताया गया है कि भोजनांते विषम बारी अर्थात भोजन के उपरांत जल विष के समान होता है उसके बारे में कभी प्रथक से चर्चा करूंगा यहां पर इतना ही ध्यान रखना है कि भोजन के उपरांत 40 मिनट तक आपको जल नहीं ग्रहण करना है यदि जल लेने की आवश्यकता महसूस हो तो नींबू जरूर निचोड़ लें अर्थात फलों का रस आप ले सकते हैं फिर 4:00 से 5:00 के बीच में जो भी आपको समय उपयुक्त लगे उसमें हल्का सा नाश्ता दिव्य पेय जूस आदि लैया चना के साथ ले सकते हैं। 6:00 बजे के आसपास 20 मिनट तक पुनः कपालभाति और अनुलोम विलोम करें, रात्रि का भोजन यदि संभव हो तो सूर्यास्त के बाद ना करें यदि संभव नहीं है तो 8:00 बजे तक रात्रि का भोजन अवश्य ले लें।

भोजन वज्रासन में

भोजन के उपरांत जल नहीं रात्रि में दूध ले सकते हैं और भोजन वज्रासन में बैठकरके करने का अभ्यास या भोजन करने के उपरांत कम से कम 15 से 20 मिनट बजरासन में अवश्य बैठे यहां मैं आपको बताना चाहूंगा कि भोजन की मात्रा कितना लेना है यह आपकी इच्छा पर डिपेंड करता है किंतु भोजन लेते वक्त एक सुझाव कि एक निवाला अर्थात एक कवर हाथ के अंगूठे से बड़ा नहीं होना चाहिए और कम से कम मुख में डालने के उपरांत 32 बार उसे चलाने का अभ्यास करें अर्थात ठोस को द्रव में बदल करके ल्यूकेड बना देते हैं और उसे रसीला बनाते हुए चबाकर खाते हैं।

भोजन में बहुत जल्दी नहीं होनी चाहिए जब आप 32 बार एक निवाले को चुबुलाएंगे तो भोजन की मात्रा निश्चित रूप से आपकी कम हो जाएगी और बिना भूख लगे भोजन कतई न स्वीकारें आपका पेट कोई डस्टबिन नहीं है भोजन औषधि की भांति लिया जाता है, शरीर को स्वस्थ रखने के लिए लिया जाता है मन को संतुष्ट करने के लिए चटपटी चीजों से दूर रखें आहार सात्विक होना चाहिए और पूरी ईमानदारी के साथ कमाए हुए धन से ही राशन को क्रय करें और उसी से ही भोजन को स्वीकारें गलत तरीके से अर्जित किए हुए धन से प्राप्त भोजन सदैव शरीर को नुकसान पहुंचाता है।

वैसे आप परिपक्व हैं यह आपको बताने का विषय नहीं है किंतु मेरा सदैव अपने प्रिय के प्रति यह सुझाव रहा है कि इस तरीके से जीवन निश्चित रूप से खुशहाली प्रदान करता है साधन संपन्नता से जीवन सुखी हो ऐसा जरूरी नहीं किंतु सात्विकता के साथ जीवन निर्वाह करने से खुशियां अवश्य प्राप्त होती हैं सोने के पहले शवासन और 9:00 बजे से लेकर के 10:00 बजे तक निश्चित बिस्तर पर जाने का अभ्यास करें पर्याप्त मात्रा में 6 घंटे निश्चित रूप से नींद ले शरीर के लिए जितना भोजन आवश्यक है मस्तिष्क के लिए उतना ही नींद आवश्यक है सोने से पहले एक शिव संकल्प के साथ सोने का अभ्यास करते हैं कि प्रातः कालीन की बेला में उठ करके पुनः प्राणायाम व्यायाम करना है ।

ओंकार नाथ सिंह 9415010001