राजस्थान व गुजरात में भाजपा की चाल से मुसीबत में फंसी कांग्रेस

मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को तोड़ने के बाद भाजपा राजस्थान और गुजरात में भी कांग्रेस के अंदरूनी झगड़े का फायदा उठाने में जुट गई है। इन दोनों राज्यों में भाजपा ने ऐसी चाल चली है जिससे कांग्रेस की नींद उड़ गई है।

अंशुमान तिवारी

नई दिल्ली: मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को तोड़ने के बाद भाजपा राजस्थान और गुजरात में भी कांग्रेस के अंदरूनी झगड़े का फायदा उठाने में जुट गई है। इन दोनों राज्यों में भाजपा ने ऐसी चाल चली है जिससे कांग्रेस की नींद उड़ गई है। दोनों ही राज्यों में भाजपा ने नामांकन के आखिरी दिन अप्रत्याशित कदम उठाते हुए एक-एक और उम्मीदवार मैदान में उतार दिए। इससे कांग्रेस के सामने अपने विधायकों को सहेजने का संकट खड़ा हो गया है। दोनों ही राज्यों में कांग्रेस के कई असंतुष्ट विधायक हैं और भाजपा ने इन्हीं का फायदा उठाने के लिए यह खेल किया है।

राजस्थान में अंतिम दिन उतारा दूसरा उम्मीदवार

मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार को भारी झटका देने के बाद भाजपा ने राजस्थान में नामांकन के अंतिम दिन आखिरी लम्हों में राज्यसभा के लिए दूसरे उम्मीदवार के रूप में ओंकार सिंह लखावत को चुनाव मैदान में उतार दिया। दरअसल, बीजेपी को लगता है कि यही मौका है कि जब यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से कितने विधायक नाराज हैं और क्या सचिन पायलट गुट से जुड़े विधायक कांग्रेस के उम्मीदवार का विरोध करने के लिए भाजपा के साथ आ सकते हैं या नहीं।

डांगी को टिकट देने से पायलट गुट नाराज

राजस्थान में तीन सीटों पर राज्यसभा चुनाव हो रहा है। विधायकों की संख्या के लिहाज से यहां कांग्रेस दो और भाजपा एक सीट जीतने की स्थिति में है। कांग्रेस ने यहां से संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल और नीरज डांगी को चुनाव मैदान में उतारा है। नीरज डांगी के नाम पर उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट तैयार नहीं थे। पायलट गुट के विधायक वेद प्रकाश सोलंकी ने तो खुलेआम नीरज डांगी विरोध भी किया था। नीरज डांगी को सीएम अशोक गहलोत का करीबी माना जाता है और अशोक गहलोत के कहने पर ही उन्हें चुनाव मैदान में उतरने का मौका मिल गया।

यह भी पढ़ें…बिछ गईं लाशों की कतारें: अभी हुआ भयानक हादसा, चीख-पुकार से सहमा प्रदेश

इसी नाराजगी का फायदा उठाने की कोशिश

सचिन पायलट गुट को नीरज डांगी के नाम पर इसलिए भी आपत्ति थी क्योंकि वे पिछले तीन बार से विधानसभा चुनाव बड़े अंतर से हार रहे हैं मगर अशोक गहलोत के करीबी होने की वजह से उन्हें हर बार टिकट मिल जाता है। अब तीसरी बार हारने के बाद भी डांगी को राज्यसभा का टिकट मिलने पर पायलट गुट नाराज है। पायलट गुट की इस नाराजगी का फायदा उठाने के लिए ही भाजपा ने ओंकार सिंह लखावत के रूप में दूसरा उम्मीदवार उतार दिया। इससे पहले बीजेपी ने अपने एक ही उम्मीदवार राजेंद्र गहलोत को राज्यसभा का पर्चा भरवाया था। माना जा रहा है कि इससे कांग्रेस के सामने अपने विधायकों को सहेजने का संकट खड़ा हो गया है।

यह भी पढ़ें…अमेरिका में कोरोना वायरस से 40 की मौत, ट्रंप ने उठाया ये बड़ा कदम

गुजरात में भी भाजपा ने किया खेल

उधर गुजरात की चार सीटों के लिए 26 मार्च को होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए राज्य की दोनों प्रमुख पार्टियों भाजपा और कांग्रेस ने दांवपेंच का दौर शुरू हो गया है। इस बीच भाजपा ने एक दांव से कांग्रेस की नींद उड़ा दी है। पार्टी ने अपने तीसरे कैंडिडेट के रूप में कांग्रेस के पूर्व कद्दावर नेता और पूर्व डिप्टी सीएम नरहरि अमीन को चुनाव मैदान में उतार दिया है।

यह भी पढ़ें…बड़ी खबर: सिंधिया पर हुआ जानलेवा हमला, शिवराज ने कहा…

गुजरात में पाटीदार कार्ड खेला

इसके पहले भाजपा की ओर से अभय भारद्वाज, रमीला बेन बारा ने नामांकन किया था। उधर कांग्रेस की ओर से कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता शक्तिसिंह गोहिल और पूर्व-जीपीसीसी प्रमुख भरतसिंह सोलंकी ने नामांकन किया है। बीजेपी ने अमीन को चुनाव मैदान में उतारकर पाटीदार कार्ड खेला है। राजस्थान, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में पिछडऩे के बाद बीजेपी की कोशिश है कि इस नुकसान की भरपाई के लिए तीन राज्यसभा सीटें हासिल की जाएं।

यह भी पढ़ें…योगी सरकार ने दंगाईयों के खिलाफ की ऐसी कार्रवाई, जीवनभर रखेंगे याद

कांग्रेस के लिए पैदा हुआ खतरा

गुजरात में भाजपा के पास 103 विधायक हैं और पार्टी 3 अन्य विधायकों के समर्थन का दावा करती है। तीन सीटों पर आराम से जीत हासिल करने के लिए बीजेपी को कांग्रेस के पांच विधायकों की जरूरत है। 73 सीटों के साथ और निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी के समर्थन वाली कांग्रेस के विधायक अगर इधर से उधर हुए तो सोलंकी या गोहिल दोनों में से किसी एक की राज्यसभा पहुंचने की संभावनाओं को खतरा हो सकता है। इस तरह भाजपा ने राजस्थान और गुजरात दोनों ही राज्यों में एक-एक अतिरिक्त उम्मीदवार उतारकर कांग्रेस के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है।