आप की जीत तय, भाजपा बढ़ाएगी हैसियत

चुनावी सर्वे और एग्जिट पोल यह तो साफ तौर पर बताते हैं कि आम आदमी पार्टी की स्पष्ट बहुमत की सरकार बनेगी। रिपोर्ट के मुताबिक आप को 40 से 52 सीटें तक मिल सकती हैं। कांग्रेस का आंकड़ा 0-3 के बीच कुछ भी हो सकता है।

Published by SK Gautam Published: February 8, 2020 | 6:28 pm
Modified: February 9, 2020 | 3:57 pm

योगेश मिश्र

लखनऊ। दिल्ली चुनाव के नतीजे आम आदमी पार्टी के लिए फिर से सरकार बनाने का अवसर लेकर आएंगे। यह बात चुनाव प्रचार के दौरान और मतदान के दिन एग्जिट पोल में भी सामने आई है। लेकिन दिल्ली का चुनाव इतने उतार-चढ़ाव के दौर से गुजरा है, उसमें इतने नाटकीय मोड़ आये हैं कि कौन, कितनी सीट पाएगा इसका अंदाज लगा पाना बेहद मुश्किल है। वह इसलिए भी क्योंकि दिल्ली चुनाव को प्रभावित करने वाले 6-7 महत्वपूर्ण फैक्टर में से चुनाव कौन से फैक्टर कितना प्रभावी हुआ इसका अनुमान लगा पाना मुश्किल है।

सर्वे सत्तारूढ़ दल के लिए डरावनी तस्वीर पेश करता है

चुनावी सर्वे और एग्जिट पोल यह तो साफ तौर पर बताते हैं कि आम आदमी पार्टी की स्पष्ट बहुमत की सरकार बनेगी। रिपोर्ट के मुताबिक आप को 46 से 54 सीटें तक मिल सकती हैं। कांग्रेस का आंकड़ा 0-3 के बीच कुछ भी हो सकता है। बीजेपी को 16 से 25 सीटें हाथ लग सकती हैं। यह तो एग्जिट पोल और सर्वे का औसत है। लेकिन सर्वे केंद्र में सत्तारूढ़ दल के लिए डरावनी तस्वीर पेश करता है कि उसके लिए 16 सीटें पाना भी मुश्किल होगा। आपको 54 सीटों के आस-पास और कांग्रेस को शून्य से तीन सीटें तक मिल सकती हैं। भाजपा को अधिकतम 38 फीसदी के आसपास वोट मिल सकते हैं, जबकि आप के खाते में 56 फीसदी वोट आने का अनुमान है।

 

 

 

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विपक्ष को मुख्यमंत्री के रूप में एक चेहरा देना होता है

इस चुनाव में भाजपा के पिछड़ने की वजह अपने लिए एजेंडा और चेहरा तय नहीं कर पाना रहा। किसी भी चुनाव में अगर सत्तारूढ़ दल के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान नहीं है तब उसे अपदस्थ करने के लिए विपक्ष को मुख्यमंत्री के रूप में एक चेहरा देना होता है, जिसमें भाजपा कामयाब नहीं हुई। उत्तर प्रदेश में भी भाजपा बिना कोई चेहरा सामने रख के चुनाव लड़ी थी पर वहां तत्कालीन समाजवादी पार्टी के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान था। लेकिन दिल्ली में आप के खिलाफ ऐसा माहौल नहीं है। जबकि भाजपा के पास डॉ. हर्षवर्धन और विजय गोयल जैसे चेहरे थे। फिर भी वह मनोज तिवारी को आजमाती रही।

आप पार्टी ने फ्री बिजली, पानी का जो वादा पूरा कर दिखाया था। भाजपा ने भी उसी दिशा में कदम बढ़ाकर आप की फील्ड पर खेलने की गलती की। हालांकि बाद में शाहीन बाग और राष्ट्रवाद को उन्होंने एजेंडे में लिया लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। आप यह समझाने में कामयाब रही कि तीन तलाक, राममंदिर और 370 केंद्र सरकार के हिस्से हैं। उसका कोई लेना-देना विधानसभा चुनाव से नहीं है।

 

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उत्तर प्रदेश और बिहार से दिल्ली में बसे लोगों की तादाद तकरीबन 32 फीसदी

भाजपा ने पंजाबी और व्यापारी वोट पर ध्यान नही दिया। अकाली दल के आगे-पीछे के स्टैंड से सिख भी भाजपा के साथ मजबूती से नहीं आ पाए। उत्तर प्रदेश और बिहार से आकर दिल्ली में बसे लोगों की तादाद तकरीबन 32 फीसदी है। लेकिन आप ने इन इलाके के दस लोगों को टिकट देकर यूपी-बिहार का कोई बड़ा चेहरा विधानसभा में साथ न होने की खूब ठीक से भरपाई कर दी। 12 सीटें सुरक्षित हैं। ओखला, बलिमारन, मटिया महल, चांदनी चौक, सीलमपुर और मुस्तफाबाद आदि सात ऐसी सीटें हैं जो मुस्लिम बाहुल्य हैं। इन सीटों पर भी भाजपा ने ध्यान नहीं दिया। दिल्ली में मुख्यतः पंजाबी, वैश्य, पूर्वांचली, दलित और मुस्लिम की रिहायश है। भाजपा का कॉडर आप की वालेन्टियर से पिछड़ गया।

 

परसेप्शन को तोड़ने के लिए भाजपा ने कम समय दिया

इस चुनाव में परसेप्शन का बड़ा महत्व रहा। आप फिर सत्ता में आ रही है यह परसेप्शन बनाने में केजरीवाल कामयाब हुए। इसके लिए वह लंबे समय से मोहल्ला क्लीनिक, सरकारी स्कूलों की हालत सुधारने के साथ ही साथ दो सौ यूनिट तक मुफ्त बिजली, पूरी तरह मुफ्त पानी, और पानी का बकाया बिल माफ, महिलाओं को डीटीसी के बसों में मुफ्त यात्रा मुहैया कराकर फिर लौटने की दिशा में निरंतर काम कर रही थी। पर इस परसेप्शन को तोड़ने के लिए भाजपा ने कम समय दिया। यही नहीं, भाजपा के किसी भी राज्य सरकार के पास केजरीवाल को जवाब देने लायक कोई नीति नहीं थी।

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दिल्ली विधानसभा चुनाव के पिछले आंकड़े ये कहते हैं

2015 के विधानसभा चुनाव में आप को 67 सीटें और 54.3 फीसदी वोट मिले थे। जबकि भाजपा को 3 सीटों के साथ 32.3 फीसदी वोट हाथ लगे थे। कांग्रेस को वोट तो 9.7 फीसदी मिले थे पर एक भी सीट हाथ नहीं लगी। इसके पहले के 2013 के विधानसभा चुनाव में आप को 29.5 फीसदी वोट और 34 सीटें मिलीं। भाजपा को 34 फीसदी वोट और 28 सीटें। कांग्रेस को 24.6 फीसदी वोट और 8 सीटें हाथ लगी।

2014 के लोकसभा चुनाव में आप को 32.9 फीसदी वोट तो मिले लेकिन खाता भी नहीं खुला। यही नहीं, कांग्रेस को भी 15.2 फीसदी वोट मिले और उसका भी खाता नहीं खुला। भाजपा ने 46.4 फीसदी वोट पाकर सभी सात की सातों सीटें हथिया ली।

2019 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने सातों सीटें जीतीं। लेकिन उसका वोट बढ़कर 56.6 फीसदी हो गया। आप और कांग्रेस का खाता नहीं खुला। लेकिन इन्हें क्रमशः 18 और 22.5 फीसदी वोट मिले।

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