प्रियंका की सियासत बनी इनके लिए सिरदर्द

घोरावल के मूर्तिया गांव में 17 जुलाई के दोपहर दो पक्षों में जमीनी रंजिश को लेकर आपसी विवाद में हुई मौत पर विपक्षियों को सियासत करने मौका मिल गया है। इसके पहले गोरखपुर में 2017 में अगस्त के प्रथम सप्ताह में बीआरडी मेडिकल कालेज में हुई बच्चों की मौत के बाद विपक्ष ने मुद्दा बनाना चाहा था लेकिन बाद में सच सबके सामने आया और विपक्ष चारों खाने चित हुआ।

धनंजय सिंह

लखनऊ: किसी का सुहाग लुट गया तो किसी के बुढ़ापे की लाठी टूट गई,लेकिन सियासत करने वालों को उनके दर्द की चिंता कम अपने वोट बैंक को सहेजने की चिंता ज्यादा दिखायी दे रही है। पीड़ा तो वही जानते हैं, जिनके घर से शव निकले और पूरे गांव की आंखें पथरा गयीं।

ये भी देखें : फ़िरोज़ाबाद: बिजली कनेक्सन काटने पहुंचे विधुत विभाग के अभियंता की दबंगों ने की पिटाई

घोरावल के मूर्तिया गांव में 17 जुलाई के दोपहर दो पक्षों में जमीनी रंजिश को लेकर आपसी विवाद में हुई मौत पर विपक्षियों को सियासत करने मौका मिल गया है। इसके पहले गोरखपुर में 2017 में अगस्त के प्रथम सप्ताह में बीआरडी मेडिकल कालेज में हुई बच्चों की मौत के बाद विपक्ष ने मुद्दा बनाना चाहा था लेकिन बाद में सच सबके सामने आया और विपक्ष चारों खाने चित हुआ।

प्रियंका वाड्रा का बढ़ता कद बसपा सुप्रीमो मायावती के लिए सिरदर्द बन गया है

इस बार सोनभद्र में हुई मौतों पर सियासत करने में कांग्रेस की महासचिव प्रियंका वाड्रा आगे रहीं। लेकिन उनका बढ़ता कद बसपा सुप्रीमो मायावती के लिए सिरदर्द बन गया है।

यूपी की राजनीति में मृतप्राय कांग्रेस में जान फूंकने के लिए आयी प्रियंका वाड्रा ने बड़ी चालाकी से गरीबों के आंसू पोछने के बहाने अपनी राजनीति को चमकाने के लिए दो दिन से सूर्खियां बटोरती रहीं। यह भविष्य में कितना फायदेमंद होगा यह तो आने वाला समय बताएगा, फिलहाल इस राजनीति ने यूपी में प्रमुख दो विपक्षियों सपा और बसपा को पीछे धकेल दिया है।

ये भी देखें : यहां भगवान शिव ने ध्‍यान भंग होते तीसरे नेत्र से कामदेव को कर दिया था भस्म

पीड़ितों को बड़ा संबल मिल जाता है कि उसके साथ दुख की इस घड़ी में कोई खड़ा है

इस जमीन की रंजिश पर राजनीति करने का मौका भी भाजपा ने दिया है। इस बार भी वैसी ही गलती की गयी, जैसे गोरखपुर में बच्चों की हो रही मौतों के बाद की गई थी। उस समय भी सत्ता पक्ष का कोई मंत्री वहां नहीं पहुंचा था। दरअसल किसी के जाने से कोई जिंदा नहीं हो सकता, लेकिन पीड़ितों को बड़ा संबल मिल जाता है कि उसके साथ दुख की इस घड़ी में कोई खड़ा है। प्रशासन भी सतर्क हो जाता है।