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Mother’s Day 2020: वो मां नहीं, फिर भी उसमें वही ममता, जो कराती है जिम्मेदारियों का एहसास

वो  मां नहीं है क्योंकि मां तो मां होती है। उसकी जगह कोई नहीं ले सकता। फिर भी वो मां से कम भी तो नहीं है। उनके साथ भी तो जुड़ा है मां शब्द ,जिसमें पूरी कायनात समा जाए,  वो मां शब्द जिसके साथ जो भी जुड़ जाए, वो शख्स पूरा हो जाता है। तो फिर हम इन्हें क्यों ना कहें हम मां, ये भी तो है सासू मां।

suman
Updated on: 7 May 2020 4:41 PM GMT
Mother’s Day 2020: वो मां नहीं, फिर भी उसमें वही ममता, जो कराती है जिम्मेदारियों का एहसास
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लखनऊ: वो मां नहीं है क्योंकि मां तो मां होती है। उसकी जगह कोई नहीं ले सकता। फिर भी वो मां से कम भी तो नहीं है। उनके साथ भी तो जुड़ा है मां शब्द ,जिसमें पूरी कायनात समा जाए, वो मां शब्द जिसके साथ जो भी जुड़ जाए, वो शख्स पूरा हो जाता है। तो फिर हम इन्हें क्यों ना कहें हम मां, ये भी तो है सासू मां। इनके साथ भी तो मां शब्द जुड़ा है।

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चाहे वो कोई भी लड़की हो, उसके जीवन में दो मांएं होती है एक जननी हमारी मां और दूसरी स्त्रीत्व का बोध कराने वाली सासू मां। जो मायके के अल्हड़पन से निकालकर हमें अपने तजुर्बों से जिंदगी की जिम्मेदारियों का बोध कराती है। वो सासू मां होती है। मायके की गलियों को छोड़ने के बाद उनके साथ हम लड़कियां ताउम्र गुजारते हैं। चाहे जितनी भी नोक-झोंक हो, इस रिश्ते में, लेकिन जो सास-बहू का प्यार होता है वो भी अनोखा ही होता है। इस प्यार भरे के रिश्ते की शुरुआत लड़कियों की शादी के बाद होती है।

थोड़ी तकरार और कड़वाहट औ नासमझी के बाद जब ये रिश्ता मधुर होता है, तब उसमें सासू मां और मां जी, अम्मा ना जाने कितने शब्द जुड जाते हैं। सासू मां का तरीका भले अलग हो पर वो निभाती एक मां का ही फर्ज है। कुछ बहुओं की जुबानी जो इस मदर्स डे कोरोना की वजह से या तो इस दिन अपने सासुमां के साथ होंगी या उनसे दूर किसी दूसरे शहर में। इस मदर्स डे जाने कब उनके लिए सास मां बन गई रियल में...

दिल्ली की रहने वाली अनुराधा सिंह पेशे से एक शिक्षक और प्रिंसिपल है जो खुद को स्कूल का संचालन करती है। वो कई वर्षों से अपने ज्ञान के मंदिर में बच्चों का मार्गदर्शन तो कर रही है। साथ वो यह कहती है खुद उनका मार्गदर्शन उनकी मां करती है, लेकिन केवल मां कहे तो गलत होगा, साथ में सासुमां भी है। सासुमां का उनकी जीवन में खास स्थान है। क्योंकि उनका मानना है कि शादी के बाद तो उन्होंने ही संभाला है। वो कहती है कि कौन कहता है कि बहू बेटी नहीं होती, और सास कभी मां नहीं हो सकती, वो कहती है कि उन्होंने देखा है मां जैसी मूरत वाली अपनी सासूमां को।

जयपुर की रहने वाली अंकिता पारिक बनस्थली विद्यापीठ में कार्यरत है। अंकिता का कहना है कि शादी के बाद सुना था जीवन में बहुत बदलाव आते हैं, लेकिन वो खुद को लकी मानती है कि उनके जीवन में शादी के बाद जो बदलाव आए है वो खूबसूरत है। जिन्हें संजो के रखा जा सकता है। वो कहती है कि शादी के बाद उन्हें ना सिर्फ हसबैंड बढिया मिले है, बल्कि मायके की तरह ससुराल भी मिला है। ससुर के रुप में पिता और सास के रुप में मां मिली है। उनकी सास बहुत अच्छी है। और उनके साथ रहना उन्हे बहुत अच्छा लगता है। वो उन्हे बेटी की तरह मानती है। और बहुत कुछ सिखाया है। उनका कहना है कि उनकी सास उनके जीवन की गुरु और मां की तरह ही मां है जो अपने स्नेह के आंचल की छांव हमेशा उन्हें देती है।

बिहार की रहने वाली शिवानी की शादी पिछले साल ही हुई है। शिवानी का कहना है कि मां से बिछड़ते वक्त बहुत तकलीफ हो रही थी, लेकिन जब ससुराल पहुंची तो सांस के रुप में मां ही मिली। वो कहती है कि एक साल में उसकी सास ने कभी बहू वाला एहसास नहीं करवाया है। हमेशा बेटी की तरह ही रखती है। और हर चीज के गलत और सही परिणाम को बताती है। कभी समझाती भी है तो सास कम मां ज्यादा लगती है। जैसे मां कभी गुस्सा तो कभी प्यार जताती है वैसी ही है मेरी सासूमां।

लखनऊ से पुष्पलता कहती हैं कि जब शादी के बाद मायके की दहलीज लांघकर वो ससुराल आई, तो मन में डर और सास की अलग छवि थी। लेकिन सारे डर और भय उनके साथ रहते- रहते चले गए। 15-16 सालों में कब वो सास से अम्मा या ये कहे मां बन गई, पता ही नहीं चला। जब वो ससुराल आई थी, तो उन्हें खाना बनाना नहीं आता था, पूजा-पाठ का ज्ञान नहीं था। सब कुछ सिखाने में उनकी मदद उनकी सास कमलावती जी ने की। जो घर संभालने में उनकी मदद करती रही और आज उनके कारण ही वे बखूबी अपनी जिम्मेदारियों को निभा रही हैं। आज भी वो लाल साड़ी देखती हैं, तो उनके आंखों में आंसू छलक आते हैं। जो बहुत ही प्यार उनकी सास ने उनके लिए खरीदी थी। साड़ियां तो बहुत हैं, पर उसमें जो सासू मां का स्नेह भरा स्पर्श है, वो बात सब में नहीं।

कई बहुओं का कहना है कि शादी के बाद उनकी जिंदगी में सास का अहम रोल है। उनकी जिंदगी में सास कभी मां बनकर, तो कभी सहेली के रूप में उनका साथ दिया। यही नहीं, जब जरूरत पड़ी तो टीचर का किरदार भी बखूबी निभाया।

गरिमा बंसल की जिंदगी में भी उनकी मां की तरह ही उनकी सास का अहम रोल है। उनका कहना है कि उन्हें ससुराल में बेटी का दर्जा दिया गया है। उनके सास-ससुर ने खुद अपनी लाइफ के डिसीजन लेने का हक तक दे रखा है। खाना बनाने से लेकर घर का हर छोटा बड़ा काम उन्होंने अपनी सासू मां से ही सीखा है।

रांची से पल्लवी पाठक मिश्रा कहती है कि मां नाम ही काफी है प्यार और दुलार जताने के लिए। फिर वो मां हो या सासू मां। हर लड़की जब अपना घर छोड़ ससुराल जाती है, जहां उसे कई रिश्ते मिलते हैं, उनमें एक रिश्ता सास से भी जुड़ता है और आगे चलकर यही रिश्ता कब मां में बदल जाता है, पता नहीं चलता है। तब सासू मां भी रुह में बस जाती हैं। पल्लवी कहती हैं कि वैसे तो शादी के बाद सास के साथ रहना कम हुआ पर जब भी साथ रही रिश्ता मजबूत ही हुआ। प्रेग्नेंसी के समय सासू मां ने मां की तरह ही ख्याल रखा, उस वक्त उन्होंने जो किया, वो एक मां ही कर सकती है। कुछ इस तरह स्वीट है मेरी सासू मां।

विनिता सिंह का कहना है कि जब वो ससुराल आई थी तो पराया-पराया एहसास होता था। जैसे लगता था, ये घर उनका नहीं है। पर धीरे-धीरे ससुराल के सब लोग अपने हो गए , उनमें ही अब उनकी खुशियां है। खास कर उनकी सास, जो बहुत स्ट्रॉन्ग है। हर परिस्थिति में डटकर मुकाबला करती हैं और वही गुण उन्हें भी दिया। एक वाकया याद करते हुए विनिता कहती हैं कि एक बार वैष्णों देवी का ट्रिप था उसी बीच उनकी सासू मां को चोट लग गई, फिर भी वो वैष्णों देवी दर्शन के लिए गईं, लेकिन अपनी वजह से किसी को परेशान नहीं किया। जब भी कभी वो मायूस होती है सासू मां का हाथ उनके सिर पर होता है। आई लव यू माई मदर इन लॉ।

राखी सक्सेना का कहना है कि आज एक अच्छी बहू, पत्नी और मां हैं वो। ये सब सिर्फ और सिर्फ उनकी सास की वजह से ही संभव है। मां की तरह प्यार भी करती है और डांटती भी है। रिश्तों की समझ और उन्हें निभाने का तरीका तो उन्होंने ही बताया है।

राजाजीपुरम, लखनऊ की चारु चंद्रा का कहना है कि ससुराल में सिर पर जिसका हाथ है। जिम्मेदारियों को साझा करने वाला एक कंधा है, वो उनकी सास का है। बहुत सपोर्टिव हैं, मां की कमी नहीं खलने देती।

लखनऊ की निधि कहती है कि उन्हें म्यूजिक से प्रेम है और ये बात उनकी सास को बहुत अच्छी लगती है। उनकी संगीत साधना में उनकी मदद करती हैं। बिना अपनी सास के सहयोग के वो जॉब नहीं कर पाती। इसलिए तो वो मदर्स डे पर चाहे मायके रहे या ससुराल मां की कमी नहीं होती है। उनका स्नेह सदैव हम पर बना रहे, उनके लिए निधि कुछ यू बयां करती है अपने शब्द- मां की कथा अनादि है, अध्याय नहीं, मेरी दो माएं हैं जिनका कोई पर्याय नहीं।

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काकोरी की रहने वाली निधि और साधना का कहना है कि जब वो ससुराल आई थी, तब उन्हें घर-परिवार की जिम्मेदारियां क्या होती हैं? इसका सही से आभास नहीं था। इन लोगों के अल्हड़पन को इनकी सासू मां ने बड़े प्यार से संजीदापन में बदला है। एक अच्छी बहू बनाने में उनकी सासू मां का बहुत योगदान है।

इन लोगों का कहना है कि उनकी सास ने ही उन्हें खाना बनाना सिखाया। मेरी कमियों को भी दूसरों के सामने ढका है। इनकी सास इनकी अच्छी दोस्त हैं।

उन्नाव की शालिनी मिश्रा शादी के बाद जब लखनऊ आई तो उन्हें सब कुछ अजनबी लग रहा था। अजीब सी फीलिंग आ रही थी। इसमें एक आवाज थी, जिसने उन्हें अपने होने का एहसास दिलाया वो कोई और नहीं उनकी सास थी, जिसे वो प्यार से मम्मी जी कहती हैं। शालिनी कहती है उनकी सास की हर बात जिंदादिल है। प्रेम का सागर हैं वो। हर समय उन्होंने एक की तरह निभाया है साथ। वो जॉब करती हैं इसमें उनकी सास का ही सहयोग है। बहुत प्यार से वो बच्चों को संभालती है। जिससे बेफिक्र हो, वो बाहर जा पाती हैं।

शालिनी एक वाकया याद करते हुए कहती हैं कि एक बार घर में कटहल की सब्जी बन रही थी सास ने पूछा, कटहल की सब्जी खाती हो? तो उन्हें ये बात दिल को छू ली कि उनकी पसंद भी ससुराल में मायने रखती है। उनका कहना है कि मेरी सासू मां की तरह ही हर लड़की उनकी जैसी सास मिले।

दिल्ली से वर्तिका कहती है कि उनकी सास नहीं बल्कि मां हैं। ये रिश्ता शादी के बाद जुड़ा, पर अब बहुत गहरा है। शादी से पहले डर लगता था इस रिश्ते से। पर अब नहीं। मेरी गलतियों पर सास ने कभी डांटा नहीं बल्कि प्यार से समझाया है। हमेशा सपोर्ट किया। कभी ताना नही मारा तो हुई ना मां वाली सब बात। इस लिए तो है मेरी सासू मां लवली लवली।

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