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ईश्वर ने गौसेवा के लिए ही इस धरती पर भेजा है : नन्द बाबा

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raghvendraBy raghvendra

Published on 18 Oct 2017 12:31 PM GMT

ईश्वर ने गौसेवा के लिए ही इस धरती पर भेजा है : नन्द बाबा
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संदीप अस्थाना

आजमगढ़। आजमगढ़ के नन्द बाबा आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। मामूली शिक्षा-दीक्षा ग्रहण करने के बाद अपनी जिन्दगी गौसेवा को समर्पित कर देने वाले इस नन्द बाबा से पढ़े-लिखे लोग भी धर्म, संस्कृति व अध्यात्म पर चर्चा करने से घबराते हैं। वे वेद-पुराण व उपनिषद में वर्णित चीजों का उद्घरण देते हुए लोगों से तर्क-वितर्क करते हैं। गौसेवा के महत्व को तो ऐसा समझाते हैं जैसे उनको ईश्वर ने गौसेवा के लिए ही इस धरती पर भेजा है। गाय के प्रति उनकी यह समर्पण भावना देखकर ही लोग उन्हें नन्द बाबा कहकर पुकारते हैं।

अति पिछड़े देवरांचल इलाके से है ताल्लुक

आजमगढ़ जिले के अति पिछड़े देवरांचल इलाके के सगड़ी तहसील अंतर्गत महराजगंज विकासखंड के हरखपुरा गांव के एक गरीब किसान परिवार में नन्द बाबा का जन्म हुआ। उनका असली नाम इनरू यादव पुत्र स्व.कल्पू यादव है। यह अलग बात है कि आज लोग उनका असल नाम भूल चुके हैं। इलाके का हर व्यक्ति उन्हें नन्द बाबा ही कहकर बुलाता है। असली नाम पूछने पर कुछ पुराने लोग ही बता पाते हैं जबकि नन्द बाबा के नाम पर इलाके का बच्चा-बच्चा हंसी खुशी उनके दरवाजे तक पहुंचा देता है।

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बचपन में ही ले लिया गौ-सेवा का संकल्प

नन्द बाबा के नाम से पहचाने जाने वाले इनरू यादव ने बचपन में ही गौसेवा का संकल्प ले लिया था। वर्ष 1972 में गांव के ही परिषदीय प्राथमिक विद्यालय से पांचवीं तक की शिक्षा ग्रहण करने के बाद उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। वे कहते हैं कि बचपन में ही उनके सपने में कृष्ण भगवान आए। सपने में उन्होंने कहा कि इनरू मेरे गायों की यह क्या हालत हो गयी है। आज उनकी सेवा करने वाला कोई नहीं है। तुम इन गायों की सेवा करो। बस सुबह नींद खुली तो इनरू ने अपने माता-पिता से कह दिया कि अब वह पढ़ाई-लिखाई नहीं करेंगे। दो-चार गाय खरीदकर दे दो। उनके दृढ़ संकल्प को देखते हुए पिता ने दो गाय खरीदकर उन्हें दे दी। बस दस बरस की उम्र से ही इन दो गायों के साथ उन्होंने गौसेवा शुरू कर दी।

गायों की सेवा में ही बीतता है पूरा समय

आजमगढ़ के इस नन्द बाबा के गायों की संख्या लगातार बढ़ती चली गयी। आज उनके पास 400 गायें हैं। उनका पूरा समय इन गायों की सेवा में ही बीत जाता है। सुबह सोकर उठते ही गौ-पूजा के साथ उनकी दिनचर्या की शुरू होती है। इसके बाद वे गायों को चारा-पानी देते हैं।

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जल्दी-जल्दी नित्यक्रिया व दातून आदि करने के बाद हल्का-फुल्का नाश्ता करते हैं और अपनी गायों को लेकर नदी किनारे चराने के लिए निकल जाते हैं। दोपहर में कुछ देर के लिए अपने बेटे व दोनों सहयोगी चरवाहों से गायों को देखने के लिए कहकर घर आते हैं और स्नान व भोजन करते हैं। इसके बाद फिर नदी किनारे अपनी गायों के पास पहुंच जाते हैं। उनके आने के बाद उनका बेटा व दोनों सहयोगी बारी-बारी से स्नान व भोजन करने के लिए जाते हैं।

गो पालन को नहीं दिया व्यवसायिक स्वरूप

इनरू यादव ने गो-पालन को कभी व्यावसायिक स्वरूप नहीं दिया। उनका गो-पालन बस केवल सेवा भावना से परिपूर्ण है। इनरू यादव का कहना है कि इंसान को गौ-सेवा करनी चाहिए क्योंकि गौ-सेवा ही सबसे बड़ी सेवा है। देवरांचल इलाके का कोई व्यक्ति बीमार होता है और दूध के लिए उनके पास आता है तो वह बिना पैसे लिये उसे महीनों दूध देते हैं।

कोई व्यक्ति अगर उनसे कुछ लेने की जिद करता है तो बड़ी मुश्किल से वे यही कहते हैं कि आप हमें क्या दोगे, जो लिया इन गायों से लिया, जो देना है इन गायों को दे दो। इन्हें ही चारा वगैरह खिला दो। ऐसे में लोग सीधे अपनी स्वेच्छा से अपनी सामथ्र्य के अनुसार गायों को चारा वगैरह अपने हाथ से खिला देते हैं। वे अपने इलाके के किसानों को खेतों में खाद के रूप में प्रयोग के लिए गोबर मुफ्त में देते हैं।

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संत जीवन देखकर पत्नी ने कर दिया परित्याग

इनरू यादव के संत जीवन को देखते हुए ही उनकी पत्नी ने नई उम्र में ही उनका परित्याग कर दिया। उस समय इनरू के एक मासूम बेटा ही था। इनरू ने अपनी पत्नी से कहा कि वह उन्हें छोडऩा चाहती है तो छोड़ दे मगर उनका बेटा उन्हें दे दे। पत्नी इसके लिए तैयार हो गयी। वह इनरू को उनका बेटा सौंपकर चली गयी। इनरू ने अपने बेटे को पाला-पोसा। आज इनरू का बेटा बड़ा हो चुका है। वह पढ़ा-लिखा तो नहीं मगर अपने पिता के साथ गौ-सेवा में उनका हाथ बंटाता है। वह भी अपने पिता की तरह धर्म, अध्यात्म व गौ-सेवा की बड़ी-बड़ी बातें करता है।

दर्जनों लोग प्रेरणा लेकर कर रहे गायों की सेवा

नन्द बाबा से प्रेरणा लेकर इलाके के तमाम लोग गौसेवा कर रहे हैं। इनरू यादव का यह गौप्रेम दूर-दूर तक चर्चा व प्रेरणा का विषय बना हुआ है। मौजूदा समय में लोग यह उदाहरण देते हैं कि गौसेवा करनी है तो इनरू की तरह की जाए। पशु तस्कर उनके सामने जाने से भी कांपते हैं। राजनीति करने वाले लोग इनरू के साथ अपनी एक फोटो भर खिंचवा लेना चाहते हैं। वह लोग उस फोटो को सोशल मीडिया पर वायरल करते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि लोग इनरू के साथ फोटो खिंचवाकर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं।

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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