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मानसरोवर और ये राक्षस झील क्या आप जानते हैं इसके बारे में सुनकर हैरान हो जाएंगे

राक्षस झील (Rakshas Tal) में नहाने से मना करने के पीछे एक वैज्ञानिक कारण भी बताया जाता है। कहा जाता है कि इसके पानी में कुछ खास तरह की प्राकृतकि गैसें मिली हुई हैं, जो पानी को थोड़ा जहरीला सा बनाती हैं। हो सकता है कि इसके पानी से आप मरें नहीं, लेकिन इसका आप पर कुछ नकारात्मक असर हो सकता है।

राम केवी

राम केवीBy राम केवी

Published on 9 May 2020 10:30 AM GMT

मानसरोवर और ये राक्षस झील क्या आप जानते हैं इसके बारे में सुनकर हैरान हो जाएंगे
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रामकृष्ण वाजपेयी

लिपूलेख-धाराचूला मार्ग शुरू होने के बाद मानसरोवर यात्रा काफी सुगम हो गई है। 80 किलोमीटर लंबे इस मार्ग का उद्घाटन रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने किया है। निसंदेह अब लोग मानसरोवर यात्रा पर अधिक संख्या में जाएंगे। लेकिन हम आज आपको यह बता रहे हैं कि क्या है कैलाश पर्वत, क्या है मानसरोवर और क्या है राक्षसताल। निश्चय ही ये जानकारी आपको हैरान कर देगी।

कैलाश पर्वत की चार दिशाओं का महत्व

हिमालय कैलाश पर्वत का हिन्दू शास्त्रों में बहुत महत्व है। इस पर्वत तीर्थ को अष्टापद, गणपर्वत और रजतगिरि भी कहते हैं। इस पर्वत की चारों दिशाओं में विभिन्न जानवरों के मुख है जिसमें से नदियों का उद्गम हुआ है। पूर्व में अश्वमुख है, पश्चिम में हाथी का मुख है, उत्तर में सिंह का मुख है, दक्षिण में मोर का मुख है।

कैलाश पर्वत की चार दिशाओं से चार नदियों का उद्गम हुआ है ब्रह्मपुत्र, सिंधू, सतलज व करनाली। इन नदियों से ही गंगा, सरस्वती सहित चीन की अन्य नदियां भी निकली है। कैलाश पर्वत की तलहटी में कल्पवृक्ष लगा है। कैलाश पर्वत के दक्षिण भाग को नीलम, पूर्व भाग को क्रिस्टल, पश्चिम को रूबी और उत्तर को स्वर्ण रूप में माना जाता है।

कैलाश पर्वत तिब्बत में स्थित एक पर्वत श्रेणी है। इसके पश्चिम तथा दक्षिण में मानसरोवर तथा राक्षस झील हैं।

मानसरोवर पूजनीय है

हिन्दू धर्म शास्त्रों में मानसरोवर पूजनीय है। कैलाश मानसरोवर से जुड़ें हजारों रहस्य पुराणों में भरे पड़े हैं। शिव पुराण, स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण आदि में कैलाश खंड नाम से अलग ही अध्याय है जहां मानसरोवर की महिमा का गुणगान किया गया है।

यहां तक कहा गया है कि यहां पहुंच कर ध्यान करने वाले को मोक्ष प्राप्त हो जाता है। भारतीय दार्शनिकों और साधकों का यह प्रमुख स्थल रहा है। यहां की जाने वाली तपस्या तुरंत ही मोक्ष प्रदान करने वाली होती है।

ऐसा माना जाता है कि महाराज मान्धाता ने मानसरोवर झील की खोज की और कई वर्षों तक इसके किनारे तपस्या की थी, जो कि इन पर्वतों की तलहटी में स्थित है।

इसके अलावा जैनियों की मान्यता है कि आदिनाथ ऋषभदेव का यह निर्वाण स्थल 'अष्टपद' है। कहते हैं ऋषभदेव ने आठ पग में कैलाश की परिक्रमा की थी।

क्या है अंतर राक्षस ताल (Rakshas Tal) और मानसरोवर में

जबकि राक्षस झील के बारे में यह धारणा है कि यह झील रावण से सम्बन्धित है, जिस कारणवश इसे रावणताल भी कहते हैं। जहाँ मानसरोवर का पानी मीठा है, वहाँ राक्षसताल का खारा है।

मानसरोवर में मछलियों और जलीय पौधों की भरमार है जबकि राक्षसताल के खारे पानी में यह नहीं पनप पाते। स्थानीय तिब्बती लोग इसके पानी को विषैला मानते हैं।

मानसरोवर गोल है और इसे सूरज का और दिन की रोशनी का प्रतीक माना जाता है जबकि राक्षसताल के आकार की तुलना अर्धचंद्र से की जाती है और इसे रात्रि का और अंधेरे का प्रतीक माना जाता है।

राक्षस ताल (Rakshas Tal) क्यों है निंदनीय

दरअसल मान्यताओं के अनुसार रावण ने इस राक्षस झील में डुबकी लगाईं थी और उसके मन पर बुरा असर हुआ था। कहते हैं कि रावण शिव की आराधना करने कैलाश पर गया था। वह पहले राक्षसताल के पास पहुंचा और वहीं बैठकर साधना करने लगा। साधना करने के बाद उसके मन में शिव से मिलने का विचार आया उनके पास जाने से पहले रावण ने इसी राक्षस ताल में स्नान किया। नहाकर शिव से मिलने जाते समय उसकी नजर पार्वती पर पड़ी। वह उनपर मोहित हो गया और शिव के पास पहुंच कर रावण ने उनकी स्तुति की।

शिवजी के रावण की भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए। और वर मांगने को कहा राक्षस झील में स्नान से चूंकि रावण की बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी तो उसने कहा, मुझे आपकी पत्नी चाहिए। बाद में पार्वती का असली स्वरूप देख रावण ने माफी मांगी। मान्यताओं के अनुसार उसकी बुद्धि इसलिए फिर गई, क्योंकि उसने राक्षसताल में डुबकी मारी थी।

राक्षस झील में नहाने से मना करने के पीछे एक वैज्ञानिक कारण भी बताया जाता है। कहा जाता है कि इसके पानी में कुछ खास तरह की प्राकृतकि गैसें मिली हुई हैं, जो पानी को थोड़ा जहरीला सा बनाती हैं। हो सकता है कि इसके पानी से आप मरें नहीं, लेकिन इसका आप पर कुछ नकारात्मक असर हो सकता है। इसलिए इस ताल में नहाना ठीक नहीं माना जाता है।

राम केवी

राम केवी

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