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इमरजेंसी का गोंडा कनेक्शन, और फखरुद्दीन जिन्होंने दी इसे मंजूरी

आज से 45 वर्ष पहले 26 जून 1975 की सुबह जब भारत की करीब 65 करोड़ आबादी को पता चला कि आपातकाल घोषित करते हुए देश में आपातकाल लग गया है,

Roshni Khan

Roshni KhanBy Roshni Khan

Published on 25 Jun 2020 6:07 AM GMT

इमरजेंसी का गोंडा कनेक्शन, और फखरुद्दीन जिन्होंने दी इसे मंजूरी
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तेज प्रताप सिंह

गोंडा(यूपी) : आज से 45 वर्ष पहले 26 जून 1975 की सुबह जब भारत की करीब 65 करोड़ आबादी को पता चला कि आपातकाल घोषित करते हुए देश में आपातकाल लग गया है, तो जनता स्तब्ध रह गयी थी। यह राष्ट्रपति शासन 21 महीने तक लागू रहा तथा इस दौरान करीब 01 लाख 11 हजार सरकार विरोधियों को ज़ेल मंे डाल दिया गया। देश में पहली बार इमरजेंसी लागू करने वाले भारत के राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की शुरुआती शिक्षा गोंडा के राजकीय हाईस्कूल में हुई थी और वह वर्ष 1918 में कक्षा आठ की परीक्षा में फेल हो गए थे। इस स्कूल के बारे में आज भी कहावत प्रचलित है कि यहां का फेल होने वाला छात्र भी देश का राष्ट्रपति बन गया।

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राष्ट्रपति शासन का कारण

मामला 1971 में हुए लोकसभा चुनाव का था, जिसमें श्रीमती इन्दिरा गांधी ने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी व संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राज नारायन को पराजित किया था। लेकिन चुनाव परिणाम आने के चार साल बाद राज नारायण ने हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। उनकी दलील थी कि इंदिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग किया, तय सीमा से अधिक खर्च किए और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए ग़लत तरीकों का इस्तेमाल किया है।

उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा आरोपों को सही ठहराया और उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राज नारायण मामले में निर्णय देते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनावी कदाचार का दोषी करार देते हुए चुनाव रद्द कर दिया था। न्यायमूर्ति जग मोहन लाल सिन्हा ने 12 जून 1975 को अपने ऐतिहासिक निर्णय में श्रीमती गांधी की जीत को अवैध करार दिया और उन्हें 06 वर्ष के लिये चुने हुए पद पर आसीन होने से रोक लगा दी। इस निर्णय से भारत में एक राजनीतिक संकट खड़ा हो गया और इन्दिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी जो 1975 से 1977 तक रहा।

घटना क्रम

वर्ष 1971 में रायबरेली में इंदिरा गांधी के हाथों हारने के बाद राज नारायण ने मामला न्यायालय में दाखिल कराया था। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी पर वोटरों को घूस देने, सरकारी मशीनरी का गलत इस्तेमाल, सरकारी संसाधनों का गलत इस्तेमाल जैसे 14 आरोप लगे थे। 12 जून 1975 जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने फैसला सुनाया और निर्वाचन रद्द कर दिया। 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश बरकरार रखा लेकिन इंदिरा को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहने की इजाजत दी। 25 जून 1975 को जय प्रकाश नारायण ने इंदिरा के इस्तीफा देने तक देश भर में रोज प्रदर्शन करने का आह्वाहन किया।

25 जून 1975 को आधी रात में अध्यादेश पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद सरकार ने 26 जून को आपात काल लागू कर दिया। आपातकाल लगने के बाद फखरुद्दीन अली अहमद विपक्ष के निशाने पर थे क्योंकि उन्होंने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर आपात काल से सम्बन्धित अध्यादेश पर हस्ताक्षर किया था। डा. फखरुद्दीन अली अहमद भारत के 5वें राष्ट्रपति के रूप में अपने 05 वर्षों का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के दौरे से लौटने के बाद उन्हें दिल का दौरा पड़ा और 11 फरवरी 1977 को 71 वर्ष की अवस्था में उन्होंने राष्ट्रपति भवन नई दिल्ली में अंतिम सांस ली।

जब कक्षा आठ में हुए फेल

फखरुद्दीन अली अहमद की प्रारंभिक शिक्षा की नींव गोंडा मंे ही पड़ी थी। यही वजह है कि इनकी जयंती पर लोग उन्हंे शिद्दत से याद करते हैं। पूर्व प्रधानाचार्य राम सोझ सिंह बताते हैं कि फखरुद्दीन अली अहमद राजकीय इण्टर कालेज में प्रतिवर्ष कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। फखरुद्दीन अली अहमद भारत के एक ऐसे सफल राजनेता भी थे, जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की स्थाई छाप छोड़ी। यद्यपि कि यहां के राजकीय हाईस्कूल में वह वर्ष 1918 में कक्षा आठ की परीक्षा में फेल हो गए थे। लेकिन गोंडा वासियांे को भी गर्व है कि फखरुद्दीन ने शहर मंे स्थित सरकारी हाईस्कूल मंे तालीम हासिल की थी और सियासत मंे भी बुलंदी हासिल कर देश का नाम रोशन किया।

फेल होना बना मील का पत्थर

फखरुद्दीन अली अहमद का जन्म 27 मई 1905 को पुरानी दिल्ली के हौज काजी इलाके में हुआ था। फखरुद्दीन अली अहमद के पिता कर्नल जुल्नार अली इंडियन मेडिकल सर्विस में थे और मां लोहारु (हरियाणा) के नवाब की बेटी थीं। कर्नल जुल्नार अली असम (गोलाघाट) के एक प्रतिष्ठित और धनी परिवार के थे। ले. कर्नल जुल्नार अली अहमद गोंडा में सिविल सर्जन के पद पर तैनात थे। फखरुद्दीन अली अहमद की प्रारंभिक शिक्षा गोंडा जिले के राजकीय हाई स्कूल (अब फखरुद्दीन अली अहमद राजकीय इण्टर कालेज) में हुई थी। वर्ष 1915 में उनका दाखिला कक्षा पांच में हुआ था। लेकिन वे 1918 में कक्षा आठ की परीक्षा में फेल हो गए थे। कालेज के प्रधानाचार्य अरुण कुमार तिवारी बताते हैं कि वर्ष 1848 में स्थापित विद्यालय में उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार वर्ष 1916 में कक्षा छह, वर्ष 1917 में कक्षा सात की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वह 1918 में कक्षा आठ की परीक्षा में फेल हो गए थे। साल 1974 में जब वह देश के राष्ट्रपति बने तो इस विद्यालय का नाम बदलकर फखरुद्दीन अली अहमद राजकीय इण्टर कालेज कर दिया गया।

कहा जाता है कि पढ़ाई के प्रति लापरवाह रहे फखरुद्दीन अली अहमद को फेल होने पर करारा झटका लगा और तभी से वह पढ़ाई के प्रति गंभीर हो गए। दिल्ली में गवर्नमेंट हाई स्कूल से मैट्रिक की शिक्षा पूरी करने के बाद वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए 1923 में इंग्लैंड चले गए। जहां उन्होंने सेंट कैथरीन कालेज कैम्ब्रिज से उच्च शिक्षा प्राप्त की। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद जब वे लंदन से लौटे तो वर्ष 1928 में लाहौर के (अब पाकिस्तान में) हाईकोर्ट में वकालत करने लगे।

यूगोस्लाविया में मिली डाक्टरेट की उपाधि

फखरुद्दीन अली अहमद बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनकी रुचि उस समय के लोकप्रिय खेलों और अन्य पाठ्येतर गतिविधियों में भी थी। टेनिस, फुटबाल, क्रिकेट और गोल्फ के खिलाड़ी होने के कारण वे असम फुटबाल एसोसिएशन और असम क्रिकेट संघ के कई बार अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए थे। वे असम खेल परिषद् के उपाध्यक्ष भी रहे। वर्ष 1961 में दिल्ली गोल्फ क्लब और दिल्ली जिमखाना क्लब के सदस्य बने। वर्ष 1967 में फखरुद्दीन अली अहमद अखिल भारतीय क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष चुने गए। राष्ट्रपति के तौर पर यूगोस्लाविया यात्रा के दौरान वर्ष 1975 में कोसोवो के प्रिस्टीना विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डाक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया था।

पं. नेहरु ने बनाया कांग्रेस का सदस्य

दिल्ली के सेंट कैथरीन कालेज में पढ़ाई के दौरान 1925 में उनकी मुलाकात पं. जवाहर लाल नेहरू से हुई। नेहरू के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने 1930 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का सदस्य बनकर आजादी के आंदोलन में भागीदारी की। कांग्रेस की सदस्यता हासिल करने के चंद वर्षाें के भीतर वे असम कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्य बने। फिर 1935 में असम विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए और 1938 में गोपीनाथ बोरदोलाई की सरकार में राजस्व तथा श्रम मंत्रालय संभाला। इसी दौरान उन्होंने चाय-बगानों की जमीन पर टैक्स आयद किया, जिसकी सराहना की जाती है। लेकिन इसके विरोध में उस वक्त हड़ताल भी हो गई थी।

भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के दौरान उनकी गिरफ्तारी हुई और साढ़े तीन साल तक जेल में रहे। इससे पहले 1939 में विश्व युद्ध शुरु होने के वक्त अंग्रेजी राज से हुए संघर्ष के दौरान उनकी थोड़े दिनों के लिए गिरफ्तारी हुई थी। जेल से रिहाई के बाद वे अखिल भारतीय कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्य बनाए गए और असम के एडवोकेट जनरल भी नियुक्त हुए। पं. जवाहर लाल नेहरु ने ही उन्हें कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नामित किया।

एडवोकेट जनरल और मंत्री बने

1946 में असम में बनी बारदोलाई सरकार के लिए चूंकि उनका निर्वाचन नहीं हो सका था और मंत्री नहीं बनाया जा सकता था इसएि उन्हें एडवोकेट जनरल बना दिया गया। एडवोकेट जनरल के रुप में कार्यकाल समाप्त हुआ तो 1952 में राज्यसभा के लिए चुन लिए गए। 1957 में असम की विधानसभा के लिए चुने गए और मंत्री बने फिर 1962 की असम विधानसभा में भी मंत्री का ओहदा संभाला। नेहरु परिवार से नजदीकी का एक बड़ा प्रमाण यह भी है कि 1966 में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो उन्हें कैबिनेट मंत्री (सिंचाई और बिजली) बनाया गया। फिर उन्हें शिक्षा मंत्रालय दिया गया। 03 जुलाई, 1974 को राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।

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राष्ट्रपति हुए तो की वफादारी

17 अगस्त 1974 को राष्ट्रपति पद का चुनाव हुआ तो नतीजा सबको पता था। फखरुद्दीन अली अहमद के मुकाबले उनके खिलाफ आठ विपक्षी दलों ने अपना साझे का उम्मीदवार गोवा के आजादी के संग्राम में शामिल रहे समाजवादी नेता त्रिदिब चौधरी के रूप में खड़ा किया। 20 अगस्त को मतों की गिनती हुई तो त्रिदिब चौधरी को 01 लाख 89 हजार और फखरुद्दीन अली अहमद को 07 लाख 65 हजार वोट मिले थे। इससे बड़ी वफादारी क्या होगी कि आपातकाल की घोषणा के लिए जो शब्द इंदिरा गांधी की तरफ से भेजे गए उसका एक शब्द बदले बगैर भारत के प्रथम व्यक्ति माने जाने वाले राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने हस्ताक्षर कर दिए। तभी से उन्हें आपातकाल के जनक के रुप में याद किया जाता है।

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