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दलाईलामा के लिए क्यों इतनी महत्वपूर्ण है फरवरी की ये 25 तारीख

तिब्बत सदियों तक एक स्वतंत्र देश रहा है। 19वीं सदी तक तिब्बत ने अपनी सत्ता स्थिर रखी। तिब्बत का इतिहास सातवीं शताब्दी से मिलता है। इतिहास यह भी बताता है कि तिब्बत का नेपाल के साथ कई बार युद्ध हुआ और ये जानकर आपको आश्चर्य होगा कि नेपाल ने तिब्बत को हराया।

राम केवी

राम केवीBy राम केवी

Published on 25 Feb 2020 12:03 PM GMT

दलाईलामा के लिए क्यों इतनी महत्वपूर्ण है फरवरी की ये 25 तारीख
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रामकृष्ण वाजपेयी

तिब्बत के धर्मगुरु दलाईलामा का नाम आप सब जानते होंगे लेकिन क्या आपको ये बात पता है कि चीन के सुरक्षा बलों से बचने के लिए पहली बार कब भारत आए थे और 25 फरवरी का दिन दलाईलामा के लिए कितनी अहमियत रखता है।

दलाईलामा तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष व धर्मगुरु हैं। वर्तमान में 14वें दलाईलामा भारत में तिब्बत की निर्वासित सरकार चला रहे हैं। अगले दलाईलामा के चयन से जुड़ी खबरें बीच बीच में आती रहती हैं।

तिब्बत सदियों तक एक स्वतंत्र देश रहा है। 19वीं सदी तक तिब्बत ने अपनी सत्ता स्थिर रखी। तिब्बत का इतिहास सातवीं शताब्दी से मिलता है। इतिहास यह भी बताता है कि तिब्बत का नेपाल के साथ कई बार युद्ध हुआ और ये जानकर आपको आश्चर्य होगा कि नेपाल ने तिब्बत को हराया। इसके बाद तिब्बत ने नेपाल से संधि की जिसके चलते तिब्बत को हर साल नेपाल को 5000 नेपाली रुपये हरज़ाना भरना पड़ता था।

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तिब्बत नेपाल की उगाही से छुटकारा पाना चाहता था। नेपाल से आजिज तिब्बत ने नेपाल के साथ युद्ध करने के लिए चीन से मदद माँगी। जो कि उसकी पहली और आखिरी ऐतिहासिक भूल बनी। तिब्बत को हड़पने के लिए तैयार बैठे चीन ने तत्काल मदद कर तिब्बत को नेपाल से छुटकारा तो दिला दिया, लेकिन इसके बाद 1906-07 में उसने तिब्बत पर पूरी तरह से अपना कब्जा जमा लिया और याटुंग ग्याड्से एवं गरटोक में अपनी चौकियाँ स्थापित कर दीं।

तो इसलिए इतनी खास है 25 तारीख

इसके बाद चीन ने तिब्बत में दमन चक्र चलाना शुरू किया। शांत और सौम्य स्वभाव के तिब्बत के बौद्ध एक बार फिर बुरी तरह फंस गए। क्योंकि चीन का विरोध कर पाने की उनकी ताकत थी ही नहीं। चीन के सुरक्षा बलों ने धीरे धीरे पूरे तिब्बत पर कब्जा करते हुए धर्म गुरु दलाईलामा को 12 फरवरी 1910 को बंदी बनाकर अपदस्थ कर दिया। इस बीच मौका मिलने पर 13वें दलाईलामा ने 25 फरवरी 1910 को गुलाम भारत में शरण ले ली। लेकिन इसके कुछ समय बाद 1912 में चीन में मांछु शासन का अंत होने पर तिब्बत ने अपने को पुन: स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया।

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लेकिन तिब्बत अभी पूरी तरह चीन के चंगुल से छूट भी नहीं पाया था कि 1913-14 में चीन, भारत एवं तिब्बत के प्रतिनिधियों की शिमला में बैठक हुई जिसमें इस राज्य को भागों में बांट दिया गया: इस विभाजन में तिब्बत के पूर्वी भाग को जिसमें वर्तमान चीन के चिंगहई एवं सिचुआन प्रांत हैं। इसे इनर तिब्बत कहा गया। और पश्चिमी भाग जो बौद्ध बहुल था वहां शासन की बागडोर दलाईलामा के हाथ में रही। इसे आउटर तिब्बत भी कहते हैं।

सन् 1933 में 13वें दलाई लामा की मृत्यु के बाद यह आउटर तिब्बत एक बार फिर चीन के घेरे में आने लगा। 14वें दलाई लामा ने 1940 में शासन सँभाला। 1951 तिब्बत साम्यवादी चीन के प्रशासन में एक स्वतंत्र राज्य बन गया। लेकिन दलाई लामा के अधिकारों में हस्तक्षेप और कटौती से असंतोष भड़क गया। लेकिन इसके बाद चीन के अत्याचारों, हत्याओं आदि दमन चक्र से किसी प्रकार बचकर दलाई लामा नेपाल पहुँचे और 1959 में भारत आ गए। तब से वह भारत में बैठकर तिब्बत से चीन को अलग करने की कोशिश कर रहे हैं। ये प्रयास अभी जारी हैं।

राम केवी

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