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Lakhimpur Gulab Jamun: इस हाईवे पर मिलते हैं मशहूर गुलाब जामुन, गुजरते ही आ जाएगा मुंह में पानी

Gulab Jamun on Lakhimpur Highway: शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो जिसे गुलाब जामुन से परहेज़ हो। यूँ तो आमतौर पर गुलाब जामुन बनाने के लिए खोये में थोड़ा मैदा या सूजी को मिलाया जाता है।

Preeti Mishra
Written By Preeti Mishra
Updated on: 4 Aug 2022 9:10 AM GMT
gulab jamun
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gulab jamun (Image credit : social media)

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Gulab Jamun on Lakhimpur Highway: गुलाब जामुन का नाम सुनते ही ज़ुबान में पानी आ जाना लाज़मी है। शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो जिसे गुलाब जामुन से परहेज़ हो। यूँ तो आमतौर पर गुलाब जामुन बनाने के लिए खोये में थोड़ा मैदा या सूजी को मिलाया जाता है। लेकिन क्या आपको पता है लखीमपुर जिले का मैगलगंज गाँव के हाईवे पर बिकने वाली सिर्फ खोये से निर्मित गुलाब जामुन बहुत ही ज्यादा मशहूर हैं।

यहाँ से गुजरने वाले यात्रियों के अलावा स्थानीय लोग भी इसके बेहतरीन स्वाद के मुरीद हैं। लोग ख़ास कर इस जगह गुलाब जामुन का स्वाद चखने के भी उद्देश्य से आते हैं। लेकिन lockdown के समय यहाँ लगने वाली भीड़ में काफी कमी आयी है।

बता दें कि लखीमपुर जिले का मैगलगंज गाँव उत्तर प्रदेश के सबसे गुप्त रहस्यों में से एक है। मिट्टी के प्लेटों में पाइपिंग गर्म गुलाब जामुन बेचने वाली सौ से अधिक दुकानों के साथ आधा किलोमीटर का यह खंड दिल्ली-शाहजहांपुर-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग 24 पर चलने वाले मोटर चालकों के लिए अच्छी तरह से जाना जाता है। जिन लोगों ने इसका स्वाद एक बार भी चखा है उन्हें उसका अद्वितीय स्वाद आज तक जरूर याद होगा।

वास्तव में बता दें कि गांव से गुजरने वाले सभी यात्री और निजी वाहनों के बीच, मूल रूप से माइकलगंज नामक एक ऐसा अनुष्ठान है जहाँ रुकने, खाने और परिवार और दोस्तों के लिए कुछ पैक कराने के लिए लोग जरूर रुकते हैं।

हालांकि, नकदी संकट ने यहां के दुकानदारों पर अपनी छाया डाली है। उनमें से अधिकांश का दावा है कि जीवित स्मृति में पहली बार उनका व्यवसाय घटकर केवल आधा रह गया है। दुकानदारों का कहना है कि बस यात्री और मोटर चालक अभी भी गांव में रुकते हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर वैध नोटों की कमी के कारण खाली हाथ ही लौटते हैं। एक दुकानदार के मुताबिक़ जो लोग इसे खरीदते हैं वे भी इसे कम मात्रा में ही खरीद रहे हैं क्योंकि आजकल हर कोई कम बजट में जीना सीख रहा है।

उमेश कुमार बताते हैं कि यहां तक ​​​​कि खीरी, शाहजहांपुर और बरेली जिलों के आसपास के गांवों से स्थानीय ग्राहकों की भीड़ कम हो गई है। हम कभी-कभी कुछ बिक्री करते हैं, मुख्यतः क्रेडिट पर; लेकिन फिर हमें आपूर्ति खरीदने और बिक्री काउंटर पर ताजा गुलाब जामुन डालने के लिए नकदी की भी आवश्यकता होती है।

अजीबोगरीब बात तो यह है कि यहां की ज्यादातर दुकानों के अलग-अलग नाम नहीं हैं बल्कि सिर्फ 'मशहूर गुलाब जामुन की दुकान' के नाम से ही सभी दुकानों को जाना जाता है। उल्लेखनीय है कि इस परंपरा की शुरुआत कैसे हुई, यह कोई नहीं जानता, लेकिन कई दुकानदारों ने अपने पूर्वजों से यह सुना है कि कुछ स्थानीय हलवाई ने एक राजमार्ग के बीच में एक छोटा सा खोखा स्थापित किया था और साल 1941 में गुलाब जामुन बेचना शुरू कर दिया था।

कई दुकानदारों का कहना है कि आदमी ने लोगों का ध्यान केंद्रित किया। खरीदारों के बजाय उत्पादन की गुणवत्ता पर, जो एक बार उनकी प्रसिद्धि फैलने के बाद उनके पास आए। उनमें से कुछ का कहना है कि गुलाब जामुन बनाने के लिए खोये के साथ कुछ भी नहीं मिलाने के उनके रहस्य ने इसे ठीक कर दिया और आज के हलवाई अभी भी इस मूल नुस्खा का पालन करते हैं।

बरेली निवासी पीयूष सिंह, जो कुछ गुलाब जामुन पैक करने के लिए रुके थे, ने बताया, कि पहले के मुकाबले अब यहाँ भीड़ काफी कम हो गई है। ऐसे में स्थानीय प्रशासन को इन दुकानदारों की सुरक्षा के लिए कुछ जरूर करना चाहिए। क्योंकि हो सकता है कि वे राज्य में सबसे अच्छे गुलाबजामुन बनाते हैं।

Preeti Mishra

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