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जानें क्‍यों हुआ था राज्‍यसभा का गठन, क्‍या है इसकी चुनावी प्रक्रिया?

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Published on 8 Jun 2016 9:59 AM GMT

जानें क्‍यों हुआ था राज्‍यसभा का गठन, क्‍या है इसकी चुनावी प्रक्रिया?
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लखनऊ:देश के 15 राज्यों में राज्यसभा की 57 सीटों के लिए 11 जून को द्विवार्षिक चुनाव हो रहे हैं। यूपी,मध्य प्रदेश,झारखण्ड,राजस्थान,उत्तराखंड, कर्नाटक में 25 सीटों के लिए निर्धारित संख्या से ज्यादा उम्मीदवार होने से वोटिंग होगी जबकि बिहार समेत बाकी 9 राज्यों में 32 सीटों पर निर्वाचन हो गया है।

यूपी में राज्यसभा की 11 सीटों और विधान परिषद् की 13 सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं जहां राज्यसभा के लिए कुल 12 उम्मीदवार मैदान में हैं। सपा के 7, बसपा के 2 और भाजपा के 1 उम्मीदवार की जीत लगभग तय है। कांग्रेस के पास यूपी में केवल 29 वोट हैं और उसने कपिल सिब्बल को अपना उम्मीदवार बनाया है पर निर्दलीय प्रीति महापात्रा के चुनाव में कूदने से उनका चुनावी समीकरण गड़बड़ा गया है। कर्नाटक में राज्‍यसभा सीट के चुनाव के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त की स्टिंग आने के बाद चुनावी माहौल गर्म हो गया है।

राज्यसभा की संवैधानिक व्यवस्था

संविधान सभा के निर्णय के अनुसार देश में राज्यसभा के गठन की घोषणा 23 अगस्त 1954 को की गई थी। वाइस प्रेसिडेंट को इसका सभापति बनाया गया। राज्यसभा का गठन संघीय व्यवस्था में राज्यों के हितों की रक्षा करने के लिए किया गया है। इसके सदस्यों की संख्या लोकसभा से कम रखी गयी है। राज्यसभा में विशेषज्ञों की नियुक्ति की वजह से इसे उच्च सदन या पुनरीक्षण सदन भी कहा जाता है जो लोकसभा से पारित प्रस्तावों की सही तरीके से जांच कर सके। इसके सदस्य मंत्रिपरिषद में भी शामिल किए जाते हैं।

राज्यसभा का स्वरूप

संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार राज्‍यसभा में 250 सदस्‍य होते हैं जिनमे 12 सदस्‍य प्रेसिडेंट द्वारा नामित किए जाते हैं। बाकी 238 लोग जनसंख्या के आधार पर राज्यों से चुने जाते हैं। संविधान के अनुच्छेद 84 के तहत राज्यसभा का सदस्य होने के लिए न्यूनतम आयु 30 साल रखी गई है। जबकि लोकसभा सदस्य होने के लिए कम से कम 25 साल का होना जरूरी है। संविधान के अनुच्छेद 102 में दिवालिया और कुछ अन्य वर्ग के लोगों को राज्यसभा सदस्य बनने के लिए अयोग्य घोषित किया गया है। जन प्रतिनिधित्व क़ानून की धारा 154 के अनुसार राज्‍यसभा सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। हर 2 साल में इसके एक तिहाई सदस्‍य सेवानिवृत्त हो जाते हैं इसलिए राज्‍यसभा कभी भंग नहीं होती।

राज्यसभा निर्वाचन की चुनावी प्रक्रिया

राज्य सभा में सदस्यों का चुनाव विधान सभा के सदस्य करते हैं। इसमें विधान परिषद् के सदस्य वोट नहीं डाल सकते। नामांकन करने के लिए कम से कम दस प्रस्तावक का होना जरूरी है। सदस्‍यों का चुनाव खाली सीटों और विधानसभा की सदस्य संख्या के आधार पर होता है। इसके अनुसार राज्य की कुल विधानसभा सीटों को राज्यसभा की सदस्य संख्या में एक जोड़ कर उसे विभाजित किया जाता है फिर उसमें 1 जोड़ दिया जाता है। उदाहरण के तोर पर यूपी में कुल 403 विधायक हैं और 11 राज्यसभा सीट हैं जिन्हें 12 ( 11 + 1) से विभाजित करके फिर उसमे 1 जोड़ने पर 34 की संख्या आती है जो वहां चुनाव जीतने के लिए न्यूनतम वोटों की संख्या होगी।

विधायक वरीयता के अनुसार वोट देते हैं। पहली वरीयता के न्यूनतम वोट जिसे मिल जाते हैं वह विजयी होता है। इसके बाद अन्य सदस्यों के लिए वोटिंग होती है तो सबसे कम वोट पाने वाले उम्मीदवार के वोटों को दूसरी वरीयता के अनुसार अन्य उम्मीदवारों को ट्रान्सफर कर दिया जाता है। यह सिलसिला तब तक चलता है जब तक उम्मीदवार विजयी नहीं हो जाए। इसीलिए चुनाव होने की स्थिति में विधायकों द्वारा अन्य वरीयता के मतों का महत्व बहुत बढ़ जाता है।

राज्यसभा चुनाव पर विवादों की छाया

संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर ने यह स्पष्ट किया था कि राज्यसभा के लिए सदस्य को उसी राज्य का निवासी होना आवश्यक होगा लेकिन ये मामला जब सुप्रीम कोर्ट में गया तो इस तर्क को नहीं माना गया। अब बाहरी लोग भी दूसरे राज्यों में जाकर राज्यसभा का चुनाव लड़कर सांसद बन जाते हैं, जिससे स्थानीय नेताओं में ख़ासा असंतोष रहता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2006 में दिए गए निर्णय के अनुसार राज्य सभा चुनाव में दलबदल विरोधी क़ानून के प्रावधान लागू नहीं होते जिस वजह से राजनीतिक दल विधायकों पर व्हिप नहीं जारी कर सकते।

इसी वजह से इसी साल मार्च में असम में बीजेपी और बोडो पीपुल्स फ्रंट के विधायक की क्रॉस वोटिंग से कांग्रेस ने राज्यसभा की दोनों सीट जीत ली थी। अभी होने वाले राज्यसभा चुनाओं में भी विधायकों की खरीद-फरोख्त का सिलसिला जारी रहने की आशंका है ।

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