फाकडिंग में खेला सात हजार फुट पर वालीबॉल, ऊंचाईयां खुद बनीं इनकी ढाल

मैं गोविन्द पंत अपने दोस्तों के साथ

Govind Pant Raju
Govind Pant Raju

लखनऊ: फाकडिंग सोल खुम्बूघाटी का मध्य बिन्दु है। एक ओर यह लुकला और नामचे बाजार के बीच का अनिवार्य पड़ाव है तो दूसरी ओर यहां से पूर्वी और पश्चिमी पहाड़ियों में बसे गावों तक आया-जाया सकता है। इन सभी गावों में लोग सब्जियों और आलू की खेती करते हैं। थोड़ा बहुत पशुपालन भी होता है।

(राइटर दुनिया के पहले जर्नलिस्ट हैं, जो अंटार्कटिका  मिशन में शामिल हुए थे और उन्होंने वहां से रिपोर्टिंग की थी।)

ज्यादातर पुरूष युवा होते ही पर्वतारोहण के रोजगार से जुड़ने के लिए निकल जाते हैं। जो खुशकिस्मत होते हैं। वो एवरेस्ट तक जाकर सकुशल वापस लौट आते हैं। मगर जो नहीं होते वे या तो फ्रॅास बाइट का शिकार होकर अथवा एवरेस्ट की श्वेत हिम चादर में वहीं दफन होकर रह जाते हैं। बहुत कम ऐसे होते हैं जिन्हें एवरेस्ट बार-बार अवसर देता है।

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इस पूरी घाटी के शेरपा लोग बेहद दमखम वाले हैं। काम के प्रति हद से ज्यादा समर्पित और वफादार। सैकड़ों सालों से हिमालय के साथ चल रहे उनके सहजीवन ने उन्हें हिमालय की तमाम दुरूह राहों का सहज यात्री बना दिया है और वे खुद को हर तरह से ऊंचाई, ठंड तथा अन्य सब प्रतिकूल परिस्थितियों के खिलाफ पूरी तरह ढाल कर हिमालय के सर्वश्रेष्ठ बासिन्दों के रूप में साबित कर चुके हैं। वे लोग बेहद नम्र और ईमानदार माने जाते हैं।

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शराब उनके सामाजिक जीवन का एक जरूरी हिस्सा तो है मगर पर्वतारोहण के दौरान शेरपा लोग शराब के प्रति भी बेहद अनुशासित माने जाते हैं। अपने सरल स्वभाव और विश्वसनीयता के चलते वे आसानी से दोस्त बन जाते हैं और यही वजह है कि एक बार पर्वतारोहण अभियान में उनका जिन लोगों से सम्पर्क हो जाता है वे फिर हमेशा के लिए उनके साथी बन जाते हैं। सैकड़ों शेरपा ऐसे हैं जिनको उनके पश्चिमी साथी अपने अन्य अभियानों के लिए ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, जर्मनी, स्विटरजरलैण्ड आदि देशों में भी बुलाते हैं। सैकड़ों शेरपा ऐसे हैं जो स्वयं भी अमेरिका व पश्चिमी देशों में जाकर बस गए हैं या उनके बच्चे वहां रह रहे हैं।

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इस तरह के प्रवास ने इस घाटी को बड़ी पहचान दी है। लेकिन बहुत से लोगों के बाहर चले जाने से सैकड़ों साल से इसी इलाके में शांति के साथ कष्टपूर्ण जीवन बिता रहे समाज में बाहर निकलने की छटपटाहट बढ़ती जा रही है और जो बाहरी दुनिया तक नहीं जा पाता वह कम से कम काठमाण्डू ही जाकर बस जाना चाहता है। नतीजा यह है कि बहुत से गांवों में अब आधे से ज्यादा घर खाली हो चुके हैं। फिर भी फरवरी से जून मध्य और सितम्बर अन्त से मध्य नवम्बर तक चलने वाला एवरेस्ट सीजन पूरी घाटी की आर्थिक स्थिति को इतना पुर्नजीवित कर देता है कि वह अगले सीजन के लिए खुद को तैयार कर ही लेती है।

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फाकडिंग में बहुत सारे टी हाऊस हैं। स्थानीय जरूरत के सामान से लेकर पर्वतारोहियों की जरूरत के सामान तक की बहुत सी चीजें यहां मिल जाती हैं। फाकडिंग में हरी सब्जियां भी उगती हैं और पर्वतारोहियों में उनकी मांग भी रहती है। चिकन के नाम पर ज्यादातर डिब्बा बंद मांस इस्तेमाल होता है। स्थानीय लोग याक के ताजा मांस का भी इस्तेमाल करते हैं। याक उनके लिए बहुउपयोगी पशु है। दूध, मांस, ऊन, से लेकर भारवाहक तक। एवरेस्ट के आरोहियों को यहां रहने के लिए शानदार लकड़ी के बने टी हाऊसों में छोटे-छोटे केबिन मिल जाते हैं। इनमें से कुछ में शौचालय की भी सुविधा रहती है।

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जबकि कुछ के साथ अटैज्ड टॉयलेट नहीं होते। ईंधन महंगा होने के कारण यहां गर्म पानी एक महंगा सौदा है। सामान्य चाय अगर 120 नेपाली रूपए में मिलती है तो एक कप गर्म पानी 100 रूपए में। नहाने के लिए एक बाल्टी गर्म पानी साढ़े चार सौ से कम में नहीं मिलता। पानी के दाम सुन कर फाकडिंग में गर्म पानी के शॉवर का मजा लेने का हमारा जोश फुर्र हो गया था और चाय आदि पी कर कुछ थकान मिटाने के बाद हम गांव की ओर निकल पड़े।

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फाकडिंग की वह शाम हमें इस मायने में बड़ी अलग लगी कि वहां जीवन में आनन्द का एक अजब ठहराव हमने देखा। पत्थरों से बनी सड़क के दोनों ओर घर थे, जिनके निचले तल्ले ज्यादातर दुकानों के रूप में थे। दुकानें खुली थीं मगर ग्राहक न होने के कारण दुकानदार महिलाएं या युवक अपने अपने साथियों से हास परिहास में मगन थे। बाजार के निचले हिस्से में एक छोटा सा मैदान था जिसमें दो टीमें वॉलीबॉल खेल रही थीं।

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सात हजार फुट पर वॉलीबॉल खेलने के लिए बड़े दम की जरूरत होती है तभी तो कुछ देर हाथ आजमाने की इच्छा से वहां अरूण सिंघल को जल्द ही मैदान से बाहर आ जाना पड़ा। मैं राजेन्द्र के साथ दूर तक निकल गया और हम बड़ी देर तक नीचे बहती दूधकोशी के पानी की अठखेलियां देखते रहे और सोचते रहे कि प्रकृति ने यहां भौतिक अभावों के बाद भी इंसान पर कितनी नियामतें लुटाईं हैं। इस बीच बूंदा-बांदी शुरू हो गई और हमें प्रकृति के करिश्मों का आनन्द छोड़ कर वापस लौटना पड़ा।

गोविन्द पंत राजू