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इस कॉमेडियन की टुनटुन से थी दोस्ती, यहां से कपड़े खरीदकर करता था गिफ्ट

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shaliniBy shalini

Published on 13 May 2016 7:17 AM GMT

इस कॉमेडियन की टुनटुन से थी दोस्ती, यहां से कपड़े खरीदकर करता था गिफ्ट
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गोरखपुर: अपनी सरलता और शानदार हास्य से चार दशक तक दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले कॉमेडी किंग असित सेन का जन्म गोरखपुर में हुआ था। यहीं से उन्होंने बॉलीवुड का सफर शुरू किया। इसके पहले तक वह गोरखपुर में ही सेन फोटो स्टूडियो चलाया करते थे। उन्होंने 200 से अधिक बॉलीवुड फिल्मों में हास्य और चरित्र अभिनेता का किरदार निभाकर अलग पहचान बनाई। आज यानी 13 मई को उनका 99 वां जन्मदिन है।

दर्शकों को हंसाकर करते थे लोट-पोट

गोरखपुर से घोष कंपनी चौक से कोतवाली की ओर जाने वाली सड़क पर लाल कोठी में 13 मई 1917 को जब बेटे की किलकारियां गूंजी, तो किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि यह बच्चा बॉलीवुड में हंसीका बादशाह बनेगा। जी हां, उस बच्चे का नाम था असित सेन। उन्होंने चार दशक तक बॉलीवुड पर चरित्र अभिनेता के रूप में अपनी खास पहचान कायम की और अपनी अदाओं से उन्होंने जहां दर्शकों को लोट-पोट होने के लिए मजबूर किया।

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रोजी-रोटी के लिए खोला था फोटो स्‍टूडियो

अपने गंभीर किरदारों से उन्होंने लोगों के दिलों पर गहरी छाप भी छोड़ी। रोजी-रोटी को चलाने के लिए उन्होंने गोरखपुर में सेन फोटो स्टूडियो खोला। असित सेन के भतीजे प्रदीप सेन और बॉम्बे फोटो स्टूडियो के मालिक उनके जिगरी दोस्त मनोहर लाल के बेटे अशोक लाल बताते हैं कि उन्हें फोटोग्राफी का बहुत शौक था। इसलिए उन्होंने गोरखपुर में सेन फोटो स्टूडियो खोला। इस दौरान उन्होंने दुर्गाबाड़ी में चलने वाले कई बांग्ला नाटकों में रोल भी किया। घोष कंपनी चौक पर सेन बाबू का हाता आज भी उनके नाम से जाना जाता है। लेकिन वर्तमान में उस पर कई लोगों का अवैध कब्जा है।

बांगला भाषा को हिंदी में करते थे ट्रांसलेट

सन 1950 में वह कोलकाता अपने ससुराल गए थे। वहां पर उन्हें एक नाटक कंपनी में एक रोल मिल गया। वह जब प्ले हुआ, तो फ़िल्म निर्देशक विमल रॉय भी ऑडियंस में बैठे थे। असित सेन के अभिनय ने उन्हें खासा प्रभावित किया और वह उन्हें लेकर मुंबई चले गए। उस दौर में ज्यादातर कलाकार बाहर के होने की वजह से स्क्रिप्ट पर काम करना आसान नहीं था क्योंकि ज्यादातर स्क्रिप्ट बांग्ला भाषा में हुआ करती थी। मुंबई जाने के बाद असित सेन ने बांग्ला भाषा में लिखी स्क्रिप्ट को हिंदी में ट्रांसलेट करने का काम शुरू किया।

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बीस साल बाद में मिली पहचान

उसके बाद उन्हें बांग्ला भाषा की कुछ फिल्मों में काम मिला। उसके बाद उन्होंने बॉलीवुड की फिल्मों में किस्मत आजमाने की सोची। हालांकि शुरुआती दिनों में उन्हें खास सफलता नहीं मिली और उन्होंने फिल्मों में छोटे-छोटे रोल करना शुरु कर दिए। लेकिन फिल्म "20 साल बाद" में उनके अभिनय ने सफलता के झंडे गाड़ दिए। उसके बाद उन्‍होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. यहीं से असित सेन का करियर सातवें आसमान पर पहुंच गया।

200 से ज्‍यादा फिल्‍मों में किया काम

1964 में उनकी फिल्म परख आई, जिसमें उन्होंने भांजू बाबू का किरदार निभाया। 1962 में आई फिल्म "20 साल बाद" में उन्होंने गोपीचंद जासूस के किरदार को जीवंत कर दिया। 1963 में बनी चांद और सूरज, 1965 में भूत बंगला, 1967 में नौनिहाल, 1968 में ब्रह्मचारी, 1969 में यकीन और आराधना, प्यार का मौसम, 1970 में पूरब और पश्चिम, दुश्मन, मझली दीदी, बुड्ढा मिल गया जैसी फिल्मों में अभिनय किया। 1971 में मेरा गांव मेरा देश, आनंद, दूर का राही, अमर प्रेम जैसी यादगार फिल्मों में डथ्‍क 1972 में बॉन्बे टू गोवा, बालिका वधू, 1976 में बजरंग बली, 1977 में आनंद आश्रम सहित 200 से अधिक फिल्मों में अपने हास्य अभिनय और चरित्र किरदार का लोहा मनवाया। उन्होंने बांग्ला फिल्म अमानुष और आनंद आश्रम सहित अनुसंधान में भी काम किया।

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महानायक सहित कई बड़े एक्‍टर्स रहे इनके खास दोस्‍त

हास्य कलाकार टुनटुन, जीतेंद्र, राजेश खन्ना, संजीव कुमार और सदी के महानायक अमिताभ बच्चन से उनका खासा दोस्ताना रहा। यह सभी उनके काफी करीब रहे। इनके साथ उन्होंने कई यादगार फिल्मों में काम भी किया।

काफी मिलनसार थे कॉमेडी के ये बादशाह

इस बीच उनका गोरखपुर से नाता जुड़ा रहा। वह जब भी गोरखपुर आते, अपने दोस्त मनोहरलाल और मोहल्ले के लोगों के साथ जरूर बैठते और फिल्मों में किए गए अभिनय को लोगों के सामने प्रस्तुत कर खूब वाहवाही बटोरते। असित सेन से मिल चुके उनके मोहल्ले के डॉ. कृष्णकांत बर्मन बताते हैं कि वह काफी मिलनसार स्वभाव के थे और जब भी आते थे तो मोहल्ले में सब का हालचाल लेते थे।

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गोरखपुर से सस्‍ते कपड़े खरीद देते थे मुंबई के दोस्तों को गिफ्ट

सिलाई का काम करने वाले ताजुद्दीन बताते हैं कि असित सेन जब भी गोरखपुर आते थे, तो उनके पिता से कपड़े सिलवा कर ले जाते थे। उन्होंने बताया कि यहां गारमेंट्स सस्ते होने के कारण यहां से खरीद कर मुंबई के कई कलाकारों को गिफ्ट दिया करते थे।

बहुत पसंद थी जलेबी और बालूशाही

घोष कंपनी चौक पर हलवाई की दुकान चलाने वाले मुन्नू लाल जायसवाल बताते हैं कि वह जब भी गोरखपुर आते थे, तो उनकी दुकान पर जलेबी और बालूशाही खाने जरूर आते थेl उनका मिलनसार स्वभाव लोगों को उन तक खींच ले जाता थाl

पत्‍नी के देहांत से गए थे टूट

जब भी वह गोरखपुर में अपने घर पर होते, तो उनके घर के बरामदे में चौपाल लगा करती थीl सैकड़ों शुभचिंतक और उनके चाहने वाले उनसे मिलने के लिए आते थे। वह सबसे बड़े मिलनसार स्वभाव के साथ मिलते। फिल्मों में अपने अभिनय को वास्‍तविक तरीके से प्रस्तुत कर अपने सरल और सादगी भरे स्वभाव का परिचय देते थे। देहांत के पहले आखिरी बार वह 1989 में गोरखपुर आये थे। उनकी पत्नी का नाम श्रीमती मुकुल सेन था, जो कोलकाता की रहने वाली थीं। यहीं पर उनकी तबियत खराब हुई। वह पत्नी को इलाज के लिए बॉम्बे लेकर गए, लेकिन कुछ ही माह के बाद उनकी मौत हो गई। पत्नी की मौत के बाद वो पूरी तरह टूट गए और 18 सितम्बर 1993 को उनका भी निधन हो गया।

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