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हरिवंश राय बच्चन जन्मदिन विशेष: बैर बढ़ाते मन्दिर-मस्जिद, मेल कराती मधुशाला!

देश में आज जहां मंदिर-मस्जिद मुद्दा बना हुआ है। वहीं आज़ादी से पहले ही हरिवंश राय बच्चन ने अपनी कविताओं से इस समस्या का हल बड़े ही सरल अंदाज़ से निकाल दिया था।

Aditya Mishra

Aditya MishraBy Aditya Mishra

Published on 27 Nov 2018 6:25 AM GMT

हरिवंश राय बच्चन जन्मदिन विशेष: बैर बढ़ाते मन्दिर-मस्जिद, मेल कराती मधुशाला!
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लखनऊ: आज हरिवंश राय बच्चन का जन्मदिन (27 नवंबर 1907) है। अगर हरिवंश राय की बात हो और वहां पर उनकी कविताओं का जिक्र न हो ऐसा शायद ही कभी देखने को मिला होगा। देश में आज जहां मंदिर-मस्जिद मुद्दा बना हुआ है। वहीं आज़ादी से पहले ही हरिवंश राय बच्चन ने अपनी कविताओं से इस समस्या का हल बड़े ही सरल अंदाज़ से निकाल दिया था।

मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला, एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला, दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते, बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!। मधुशाला कविता ने उन्हें पूरी दुनिया में फेमस कर दिया था। आज भी लोग उनकी कविताओं कि वजह से उन्हें याद करते है। तो आइये जानते है बच्चन के जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें:-

जीवन का ऐसा दौर जब अकेले पड़ गये थे बच्चन

बालीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन के पिता हरिवंश राय बच्चन का जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के एक छोटे से गाँव बाबू पट्टी में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। यह जिला इलाहाबाद से 62 किलोमीटर की दूरी पर है। वर्ष 1926 में हरिवंश राय की शादी श्यामा से हुई थी जिनका टीबी की लंबी बीमारी के बाद वर्ष 1936 में निधन हो गया। इस बीच वे नितांत अकेले पड़ गए। वर्ष 1941 में बच्चन ने तेजी सूरी से शादी की। हरिवंश राय बच्चन के दो पुत्र अमिताभ बच्चन और अजिताभ हुए।

1935 में आई मधुशाला’ रचना से मिली पहचान

हरिवंश राय बच्चन को सबसे अधिक लोकप्रियता ‘मधुशाला’ से मिली। हरिवंश राय बच्चन की यह रचना 1935 में लिखी गई थी। हरिवंश राय बच्चन की लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह यह थी कि वे बहुत ही गंभीर मुद्दों को सरल अंदाज में बयां करते थे।

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हरिवंश राय को जब पहली बार मिले थे 101 रुपए

एक जानकारी के मुताबिक अपनी पहली काव्य रचना ‘मधुशाला’ के जरिए बच्चन साहब नामी कवि बन गए थे। उन्होंने ही कवियों के लिए मानदेय की परिपाटी की शुरुआत करवाई थी। पहले कवियों का सम्मेलन तो जरूर होता था, लेकिन उन्हें कोई पारिश्रमिक नहीं दिया जाता था।

साल 1954 में इलाहाबाद के पुराने शहर जानसेनगंज में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इसमें डॉ. हरिवंश राय बच्चन, गोपीकृष्ण गोपेश और उमाकांत मालवीय सरीखे कई लोकप्रिय कवि बुलाए गए थे। प्रोग्राम शाम को शुरू होना था। सभी कवि सम्मेलन में पहुंचे। हरिवंश राय बच्चन जी ने पहुंचते ही गुस्से में काव्य पाठ करने से मना कर दिया।

उनका कहना था। जब टेंट-माइक वाले को पैसे मिलते हैं तो कवि को क्यों नहीं? जबकि कवियों की वजह से ही महफिल सजती है, वरना कवि सम्मलेन का क्या मतलब 'उस दौरान बच्चन साहब की 'मधुशाला' से लेकर 'मधुकलश', 'मधुबाला' जैसी काव्य रचनाएं धूम मचा रही थी। उनकी बात मान ली गई। कवि सम्मेलन खत्म होने के बाद बच्चन साहब को आयोजक मंडल ने 101 रुपए दिए।

वहीं, उनके दोस्त कवि गोपीकृष्ण को 51 रुपए और उमाकांत मालवीय को 21 रुपए मानदेय मिला। बच्चन साहब ने अपनी ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है', 'बच्चे प्रत्याशा में होंगे', 'नीणों से झांक रहे होंगे' और 'पक्षियों पर भाता' रचनाओं से खूब वाहवाही बटोरी थी।

जब गांधीजी ने किया था हरिबंश राय का बचाव

अमिताभ बच्चन ने मार्च 2018 में अपने ब्लॉग में ब्रिटिश राज के उन दिनों को याद किया था, जब उनके पिता कवि हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला के लिए आलोचना हो रही थी। कुछ लोग आरोप लगा रहे थे कि हरिवंश शराब को ग्लैमराइज कर देश के यूथ को बर्बाद कर रहे हैं। अमिताभ ने लिखा था कि उस वक्त महात्मा गांधी मेरे पिता के बचाव में उतरे थे। गांधीजी ने कहा था कि कविता में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है।

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अमिताभ ने पिता के लिए ब्लॉग में लिखी थी ये बातें

अमिताभ बच्चन ने उस समय अपने ब्लॉग में लिखा था "मुधशाला, 85 साल पहले 1933 में लिखी गई। कविता कालजयी है और आज भी शानदार विचारों से लोगों को लाभ पहुंचा रही है। 1935 में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में जब कविता पहली बार पढ़ी गई तो लोगों ने खूब सराहा और कविता को कई बार दोहराने के लिए कहा।"

उन्होंने लिखा- "कविता की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए कुछ लोगों ने इसका दुष्प्रचार शुरू कर दिया। उन्होंने कविता को खुद का स्वार्थ सिद्ध करने के लिए लिखी एक नीरस रचना करार दिया। इसकी शिकायत महात्मा गांधी से भी की गई थी।

अमिताभ ने लिखा है कि लोगों ने गांधीजी से कहा, "एक युवा शराब के फायदे बढ़ा-चढ़ाकर बताकर देश के यूथ को पॉल्यूट (दूषित) कर रहा है। वह युवाओं को भ्रष्ट बना रहा है, उसे रोका जाए या गिरफ्तार किया जाए। इस दौरान एक युवक ने यह धमकी तक दी कि अगर हरिवंश राय बच्चन उसके शहर में गए तो वह उन्हें गोली मार देगा।"

राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे

वर्ष 1952 में हरिवंश राय बच्चन पढ़ने के लिए इंग्लैंड चले गए, जहां कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य/काव्य पर शोध किया। 1955 में कैम्ब्रिज से वापस आने के बाद आपकी भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त हो गई। हरिवंश राय बच्चन राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे और 1976 में आपको पद्मभूषण की उपाधि मिली। 'दो चट्टानें' (कविता-संग्रह) के लिए 1968 में साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिला था। हरिवंश राय बच्चन का 18 जनवरी, 2003 को मुंबई में निधन हो गया था।

मधुशाला के कुछ अंश आपके लिए....

1. धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला, मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला, पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका, कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।

2. सब मिट जाएँ, बना रहेगा सुन्दर साकी, यम काला, सूखें सब रस, बने रहेंगे, किन्तु, हलाहल औ' हाला, धूमधाम औ' चहल पहल के स्थान सभी सुनसान बनें, जगा करेगा अविरत मरघट, जगा करेगी मधुशाला।।

3. बिना पिये जो मधुशाला को बुरा कहे, वह मतवाला, पी लेने पर तो उसके मुह पर पड़ जाएगा ताला, दास द्रोहियों दोनों में है जीत सुरा की, प्याले की, विश्वविजयिनी बनकर जग में आई मेरी मधुशाला।।

4. सजें न मस्जिद और नमाज़ी कहता है अल्लाताला, सजधजकर, पर, साकी आता, बन ठनकर, पीनेवाला, शेख, कहाँ तुलना हो सकती मस्जिद की मदिरालय से चिर विधवा है मस्जिद तेरी, सदा सुहागिन मधुशाला।।

कोई भी हो शेख नमाज़ी या पंडित जपता माला, बैर भाव चाहे जितना हो मदिरा से रखनेवाला, एक बार बस मधुशाला के आगे से होकर निकले, देखूँ कैसे थाम न लेती दामन उसका मधुशाला!

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