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पुुरी की तरह काशी में लगा रथयात्रा का मेला, उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

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Published on 6 July 2016 10:36 AM GMT

पुुरी की तरह काशी में लगा रथयात्रा का मेला, उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
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वाराणसीः काशी के लख्खा मेलें में शुमार तीन दिवसीय रथयात्रा मेले का शुभारम्भ हो गया है। रथारूढ़ जगन्नाथ प्रभु भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ नगर भ्रमण को निकले। लगभग 235 साल पुरानी यह रथयात्रा मेला अपने आप में कई परंपराओं को समेटे हुए है। पुुरी के बाद काशी में शुरू ये रथयात्रा का विशेष महत्व माना जाता हैं और इसे मिनी पुुरी रथयात्रा मेला भी कहा जाता है।

हर साल की तरह इस साल भी भगवान जगन्नाथ दर्शन देने आ चुके है। इसके उपलक्ष में आज भगवान जगन्नाथ का रथ उनके ससुराल यानि वाराणसी के रथयात्रा इलाके में पहुंच गया है। सुबह 5 बजे ही लोग हजारो की संख्या में भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने के लिए पहुंचे।

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दो सौ साल पुराना है इतिहास

काशी के इस रथयात्रा मेले का इतिहास सवा दो सौ साल पुराना हैं। सन् 1790 में गुजरात के पूरी मंदिर से स्वामी तेजोनिधि आए और आकर गंगा किनारे रहने लगे। एक रात स्वामी को भगवान् जगन्नाथ का स्वप्न आया की उनकी पूजा महादेव की नगरी में भी होनी चाहिए। स्वामी तेजोनिधि ने 1802 में महादेव की नगरी में रथयात्रा मेले की शुरुआत की। इस मेले को रथयात्रा मेले के नाम से जाना गया। ख़ास बात ये है की पूरी में भगवान् अपने मासी के घर जाते है तो यहां अपनी ससुराल जाते हैं। पुरानी मान्यता के अनुसार भगवान् पूरी में रथयात्रा मेले में शामिल होने झूले से जाते है लेकिन यहां पालकी से जाते हैं इसलिए यहां लोग इसे ससुराल जाना मानते हैं।

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उमड़ती है लाखों की भीड़

महादेव के इस नगरी में विष्णु अवतार भगवान् जगन्नाथ का स्वागत बड़े ही धूमधाम से होता हैं। तीन दिन की इस रथयात्रा में लाखो की भीड़ उमड़ती हैं। मान्यता हैं की भगवान विष्णु के अवतार हैं जो फल भगवान विष्णु के दर्शन से प्राप्त होता हैं वही फल भगवान जगन्नाथ से भी मिलता है और इसी फल की कामना के लिए दूर दूर से लोग आकर इस मेले में भगवान् जगन्नाथ का दर्शन करते हैं। तीन दिन तक चलने वाले इस मेले में लाखों की भीड़ लगती हैं।

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