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सोने का मुल्क! खाने में पीने में हंसने में रोने में और मदिरा में भी सोना

बर्मा या म्यांमार के शहरों के ऊपर से गुजरें तो पूरी जमीन के ऊपर सुनहरी चादर सी तनी नजर आती है। सुनहरे स्तूप, मंदिर और पगोडा ही नजर आते हैं। फिर चाहे शहरों की व्यस्त सड़कें हों या फिर गांव के शांत इलाके।

Vidushi Mishra

Vidushi MishraBy Vidushi Mishra

Published on 11 April 2019 7:51 AM GMT

सोने का मुल्क! खाने में पीने में हंसने में रोने में और मदिरा में भी सोना
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म्यांमार की 90% आबादी बौद्ध है। बौद्ध धर्म में सोने को बहुत अहमियत दी जाती है। क्योंकि सोने को सूरज का प्रतीक माना जाता है, और सूरज ज्ञान और बुद्धि की नुमाइंदगी करता है।

इतिहास

11वीं से 13वीं सदी के बीच पगान साम्राज्य के दौर में यहां दस हजार से ज्यादा मंदिर हुआ करते थे।

इसी दौर में बौद्ध धर्म का विस्तार पूरे म्यांमार में हो रहा था। हालांकि बौद्ध धर्म ने बर्मा की धरती पर दो हजार साल पहले ही कदम रख दिए थे।

मांडले के पेशेवर गाइड सिथु हतुन कहते हैं, कि बर्मा की संस्कृति में सोने की बहुत अहमियत है।

हमारे पूर्वी पड़ोसी देश म्यांमार को कभी बर्मा कहा जाता था। आसमान से जमीन पर उतरें, तो कदम-कदम सुनहरे बौद्ध मंदिर दिखाई देंगे।यहाँ के सबसे बड़े मंदिर तो पहाड़ों पर ही स्थित हैं।

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वहीं, छोटे-छोटे मंदिर पुराने पेड़ों के नीचे या लोगों के घरों के सामने बने दिखते हैं। हर तरफ सोना ही सोना नजर आता है।इरावदी नदी इस स्वर्णभूमि के दिल से गुजरती है। इसके किनारे ही असली बर्मा या म्यांमार हैं।

पहाड़ों पर बने विशाल बौद्ध मंदिर, बूंदों से भरे बादल, दूर-दूर तक फैले जंगल और किनारों पर स्थित छोटे-बड़े मकान ऐसे लगते हैं, मानो किसी फिल्म का सेट हो।

यहाँ पर बौद्ध धर्म का बोलबाला है। सुबह के वक़्त बौद्ध भिक्षु और पादरी गलियों में घूमते हुए दान में खाना मिलने की उम्मीद करते हैं।

दान करना, भारत की ही तरह बर्मा में भी एक अहम परंपरा है। लोग अनजान शख्स को भी खाने-खिलाने में यक़ीन रखते हैं।चाय-पानी तो कराते ही है। खाना भी खाकर जाने की ज़िद करते हैं।बर्मा के लोग सिर्फ देना जानते हैं। कुछ लेना नहीं।

सात सौ से ज़्यादा स्वर्ण मंदिर

मांडले बिजनेस फोरम के मुताबिक, मांडले के आस-पास की पहाड़ियों पर ही सात सौ से ज्यादा स्वर्ण मंदिर हैं।

इन्हें इरावदी नदी की लहरों पर तैरते हुए देखा जा सकता है। बगान नाम के शहर के इर्द-गिर्द तो 2200 से ज्यादा मंदिरों और पगोडा के खंडहर बिखरे हुए हैं।

यहाँ अभी भी परंपरागत तरीके से ही सोने को तरह-तरह के रंग-रूप में ढाला जाता है। इस बात का खास खयाल रखा जाता है, कि सोना पूरी तरह से 24 कैरेट गोल्ड का हो।

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बांस की पत्तियों के बीच में सोने को रखकर सौ से दो सौ परतें तैयार की जाती हैं।फिर इन्हें ढाई किलो के हथौड़ों से करीब 6 घंटे तक पीटा जाता है। ताकि ये सही आकार ले सकें। फिर इन्हें पतले-छोटे एक एक इंच के टुकड़ों में काटा जाता है। सोने की ये पत्तियां मंदिरों में चढ़ाई जाती हैं। सोने का इस्तेमाल परंपरागत दवाओं में भी होता है।

शराब में भी सोना

यही नहीं, यहाँ की स्थानीय शराब में भी सोने के ये पत्तर डाले जाते हैं। स्थानीय शराब को ‘व्हाइट व्हिस्की’ के नाम से जानते हैं।

इनकी बोतलों में सोने के पतले पत्तर डाल कर हिलाया जाता है। फिर इस सोने मिली शराब को गिलास में डालकर लोग उसका लुत्फ लेते हैं।

श्रद्धा और रीति-रिवाज

बर्मा के लोग मंदिरों को सोने से सजाकर बुद्ध को अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं।

मांडले शहर में बर्मा का सबसे पवित्र मंदिर महामुनि पाया स्थित है। यहाँ पर सुबह चार बजे से ही भारी भीड़ जुट जाती है। यहाँ सुनहरे बुद्ध विराजमान हैं। लोग स्थानीय बाजार से सोने के पत्तर खरीदकर भगवान बुद्ध को अर्पित करते हैं।

सिथु कहते हैं, कि, 'हम भगवान बुद्ध को ज्यादा से ज्यादा सोना अर्पित करना चाहते हैं। उनके ढेरों मंदिर और पगोड़ा बनवाना चाहते हैं। फिर उन मंदिरों को अपनी पवित्र जमीन पर मिलने वाले सोने से सजाना चाहते हैं।' खास मौकों पर बनने वाले चावल और सब्जियों में भी सोने के टुकड़े डाले जाते हैं।

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लड़कियां सोने से श्रृंगार करने के अलावा केले और सोने के बने हुए फेस मास्क से चेहरे भी चमकाती हैं।माना ये जाता है कि सोना त्वचा के अंदर जाता है तो उससे मुस्कान बेहतर होती है।

म्यांमार में सोना मिलता भी खूब है। मांडले शहर के पास ही सोने की कई खदाने हैं। इसके अलावा इरावदी और चिंदविन नदियों की तलछट में भी सोना मिलता है।बालू से सोने को अलग करने के लिए पारे का इस्तेमाल होता है। पर, इस पारे की वजह से मछलियां मर जाती हैं। बालू के अवैध खनन से भी इरावदी नदी को भारी नुकसान पहुंच रहा है। हालांकि स्थानीय स्तर पर नदी, बालू और जंगलों के संरक्षण का काम भी हो रहा है।

सुनारों की बस्ती

मांडले शहर के पुराने हिस्से में सुनारों की बस्ती है। वहाँ पर बहुत से लोग दिन भर सोने की कुटाई का काम करते रहते हैं।भयंकर गर्मी और उमस में भी इनका काम रुकता नहीं है। ज्यादातर लोग कई पीढ़ियों से यही काम करते आए हैं।

सोने की कुटाई का काम मर्द करते हैं और औरतें, तैयार पत्तरों को टुकड़ों में काटने का काम करती हैं। सोने के उन टुकड़ों को बांस के कागज में लपेट कर बेचा जाता है। लकड़ी के टुकड़ों पर नक़्क़ाशी के लिए भी सोने का इस्तेमाल होता है।

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म्यांमार ने सियासी अस्थिरता के लंबे दौर देखे हैं। इसलिए यहाँ सोने को करेंसी के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है।

मौजूदा रोहिंग्या संकट की वजह से एक बार फिर से सोने की अहमियत बढ़ गई है।

बर्मा के लोग बैंकों में बचत खातों की जगह सोना खरीदने को वरीयता देते हैं। छोटे से छोटे कस्बे में सोने की दुकानें मिल जाती हैं।

1948 में अंग्रेजों से आजाद होने के बाद से ही देश की अर्थव्यवस्था अस्थिरता और बाकी दुनिया से अलगाव के दौर से गुजरती रही है। इसीलिए सोने में निवेश को लोग आज भी सब से सुरक्षित मानते हैं।

सैन्य शासन के दौरान म्यांमार का ताल्लुक़ बाकी दुनिया से बहुत ही कम रहा था। अभी हाल ही में अंतरराष्ट्रीय पाबंदियां हटी हैं।

Vidushi Mishra

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