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क्यों मनाया जाता है दीपों का त्योहार, जानिए इनका इतिहास

priyankajoshi

priyankajoshiBy priyankajoshi

Published on 28 Oct 2016 2:37 PM GMT

क्यों मनाया जाता है दीपों का त्योहार, जानिए इनका इतिहास
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लखनऊ : दीपावली दीपों और खुशियों का त्योहार है। यह भारत के साथ-साथ विदेशों में भी मनाया जाता है। यह बात तो सभी को मालूम है कि यह पर्व भगवान राम ने असुरराज रावण को मारकर विजय प्राप्त की थी, जिस कारण यह मनाया जाने लगा।

इसके अलावा दीपावली से जुड़ी ऐसी कई मान्यताएं और भी हैं जिसके आधार पर यह पर्व बड़ी हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है। तभी से दीपावली का त्योहार मनाने की परंपरा चली आ रही हैं। आज हम आपको दिवाली के इतिहास और इसके महत्व के बारे में बताने जा रहे है।

आगे की स्लाइड्स में जानिए दीवाली से जुड़ी मान्यताएं...

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लक्ष्मी पूजन

त्रेतायुग में भगवान राम रावण को हराकर और चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या वापस लौटे थे। उस रात कार्तिक मास की अमावस्या थी। ऐसे माहौल में अयोध्यावासियों ने भगवान राम के स्वागत में पूरी अयोध्या को दीपों के प्रकाश से जगमग कर दिया था। तभी से इस पर्व को मनाया जा रहा है।

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अत्याचारी नरकासुर का वध

दक्षिण में उस त्योहार को असम का एक शक्तिशाली राजा नरकासुर विजय की स्‍मृति में मनाया जाता है। कृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर का वध दीपावली के एक दिन पहले चतुर्दशी को किया था। अगले दिन इसी खुशी में अमावस्या को गोकुलवासियों ने दीप जलाकर खुशियां मनाई थीं।

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हिरण्यकश्यप वध

दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रहलाद की विष्णु भक्ति से अप्रसन्न थे। अपने पुत्र को मारने के कई प्रयास विफल रहें। कार्तिक अमावस्या के सायंकाल का समय था। विष्णु भक्त प्रहलाद खम्भे से बंधा हुआ था। जब दैत्यराज ने खड्ग से प्रहार किया तो भयंकर गर्जना के साथ खम्भा टूटा और भगवान नरसिंह का प्रादुर्भाव हुआ। भगवान नरसिंह ने केवल अपने नख से दैत्यराज का वध कर डाला। दैत्यराज की मृत्यु पर प्रजा ने घी के दिए जलाकर दीवाली मनाई थी।

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समुद्रमंथन से लक्ष्मी और कुबेर का प्रकट होना : इस दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी और धन्वंतरि प्रकट हुए। एक पौराणिक मान्यता है कि दीपावली के दिन ही माता लक्ष्मी दूध के सागर, जिसे केसर सागर के नाम से जाना जाता है, से उत्पन्न हुई थीं। माता ने सम्पूर्ण जगत के प्राणियों को सुख-समृद्धि का वरदान दिया और उनका उत्थान किया। इसलिए दीपावली के दिन माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि श्रद्धा-भक्ति के साथ पूजन करने से माता लक्ष्मी अपने भक्तजनों पर प्रसन्न होती हैं और उन्हें धन-वैभव से परिपूर्ण कर मनवांछित फल प्रदान करती हैं।

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महाकाली पूजा : राक्षसों का वध करने के लिए मां देवी ने महाकाली का रूप धारण किया था। राक्षसों का वध करने के बाद भी जब महाकाली का क्रोध कम नहीं हुआ। तब भगवान शिव स्वयं उनके चरणों में लेट गए थे। भगवान शिव के शरीर स्पर्श मात्र से ही देवी महाकाली का क्रोध समाप्त हो गया। इसी की याद में उनके शांत रूप लक्ष्मी की पूजा की शुरुआत हुई। इसी रात इनके रौद्ररूप काली की पूजा का भी विधान है।

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युद्धिधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ : महाराज धर्मराज युद्धिधिष्ठिर ने इसी दिन राजसूय यज्ञ किया था। अतएव दीप जलाकर खुशियां मनाई थीं।

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सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में पकी हुई मिट्टी के दीपक प्राप्त हुए हैं। 500 ईसा वर्ष पूर्व की मोहनजोदड़ो सभ्यता की खुदाई में प्राप्त भवनों में दीपकों को रखने हेतु ताख बनाए गए थे और मुख्य द्वार को प्रकाशित करने हेतु आलों की शृंखला थी। मोहनजोदड़ो सभ्यता के प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति के अनुसार उस समय भी दीपावली मनाई जाती थी। उस मूर्ति में मातृ-देवी के दोनों ओर दीप जलते दिखाई देते हैं।

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बौद्ध धर्म की दीपावली :

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध जब 17 साल बाद अनुयायियों के साथ अपने गृह नगर कपिल वस्तु लौटे तो उनके स्वागत में लाखों दीप जलाकर दीपावली मनाई थी। इसके साथ ही महात्मा बुद्ध ने अपने प्रथम प्रवचन के दौरान 'अप्पों दीपो भव´ का उपदेश देकर दीपावली को नया रुप प्रदान किया गया था।

जैन धर्म की दीपावली

जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर ने भी दीपावली के दिन ही बिहार के पावापुरी में अपना शरीर त्याग दिया। महावीर-निर्वाण संवत्‌इसके दूसरे दिन से शुरू होता है। इसलिए अनेक प्रांतों में इसे वर्ष के आरंभ की शुरुआत मानते हैं। दीपोत्सव का वर्णन प्राचीन जैन ग्रंथों में मिलता है। कल्पसूत्र में कहा गया है कि महावीर-निर्वाण के साथ जो अन्तर्ज्योति सदा के लिए बुझ गई है, आओ हम उसकी क्षतिपूर्ति के लिए बहिर्ज्योति के प्रतीक दीप जलाएं।

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सिखों की दीपावली

सिखों के लिए भी दीवाली महत्व हैं क्योंकि इसी दिन ही अमृतसर में 1577 में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था। इसके अलावा 1618 में दीवाली के दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिंद सिंह जी को बादशाह जहांगीर की कैद से रिहा किया गया था।

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मौर्य साम्राज्य की की दीपावली

ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में रचित कौटिल्‍य के अर्थशास्त्र के अनुसार आमजन कार्तिक अमावस्या के अवसर पर मंदिरों और घाटों पर बड़े पैमाने पर दीप जलाकर दीपदान महोत्सव मनाते थे। साथ ही मशालें लेकर नाचते थे और पशुओं खासकर भैंसों और सांडो की सवारी निकालते थे।

गुप्त वंश की दीपावली

मौर्य वंश के पतन के बाद गुप्त वंश की दीपावली- सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय ने ईसा से 269 वर्ष पूर्व दीपावली के ही दिन तीन लाख शकों व हूणों को युद्ध में खदेड़ कर परास्त किया था। जिसकी खुशी में उनके राज्य के लोगों ने असंख्य दीप जला कर जश्न मनाया था। सम्राट समुद्र गुप्त, अशोकादित्य, प्रियदरर्शन ने अपनी दिग्विजय की घोषणा दीपावली के ही दिन की थी।

सम्राट विक्रमादित्य की दीपावली

57 ईपूविक्रम संवत के प्रवर्तक चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक दीपावली के दिन हुआ था। इसलिए दीप जलाकर खुशियां मनाई गईं।

आर्य समाज की स्‍थापना

इस दिन आर्य समाज के संस्‍थापक महर्षि दयानंद ने भारतीय संस्कृति के महान जननायक बनकर दीपावली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया था। इसके अलावा मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में दौलतखाने के सामने 40 गज ऊंचे बांस पर एक बड़ा दीप जलाकर लटकाया जाता है। वहीं शाह आलम द्वितीय के समय में पूरे शाही महल को दीपों से सजाया जाता था। इस अवसर पर हिंदू और मुसलमान दोनों मिलकर पूरे हर्षोल्‍लास के साथ त्‍योहार मनाते थे।

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इन्होंने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत नई दिल्ली में एनडीटीवी से की। इसके अलावा हिंदुस्तान लखनऊ में भी इटर्नशिप किया। वर्तमान में वेब पोर्टल न्यूज़ ट्रैक में दो साल से उप संपादक के पद पर कार्यरत है।

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