INDEPENDENCE DAY: किन मायनों में कहें कि आज इंडिया वाकई आजाद है?

Published by August 12, 2016 | 6:01 pm
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लखनऊ: पता है 15 अगस्त आ गया है। 15 अगस्त समझते हैं ना स्वतंत्रता दिवस। वो दिन जब हमें अंग्रेजों के चंगुल से आजादी मिली थी। वो दिन जब हमने अपनी इच्छा से सांस लेना शुरू किया था। इस बार हम 69वां स्वतंत्रता दिवस मनाएंगे। राजधानी दिल्ली में इंडिया गेट पर बड़ी-बड़ी सलामियां दी जाएंगी। बड़े-बड़े वादों के पूरा होने के हवाले दिए जाएंगे। अचीवमेंट्स गिनाए जाएंगे कि देश ने कितनी तरक्की कर ली है, कौन-कौन से प्रोजेक्ट पूरे हुए हैं, पर आज देश की हालत देखने हुए दिल में ख्याल आता है कि क्या आज हमारा देश वाकई आजाद है?

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आपको याद होगा कि पुराने समय में हमारा देश सोने की चिड़िया कहलाता था। यहां की संस्कृति-सभ्यता दुनिया के कोने-कोने में अपनी महक बिखेरती थी। शायद यही कारण रहा होगा कि भारत माता पर अंग्रेजों की बुरी नीयत डोल गई और उन्होंने इसे गिद्धों की तरह नोचा। लेकिन भारत माता को बचाने के लिए देश में सुभाष, महात्मा गांधी, भगत सिंह और मंगल पांडे जैसे न जाने कितने ही वीर सपूत जटायु की तरह मां की रक्षा में आए और अंग्रेजों के चंगुल से बचाने में अपने प्राणों की आहुति दे दी। सभी जानते हैं कि हर स्वतंत्रता दिवस पर देश की महान विभूतियों को श्रद्दांजलि दी जाती है।

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पर क्या किसीने सोचा है कि ये श्रद्दांजलि उन लोगों के लिए पर्याप्त है। उन्होंने हमारे भविष्य को सुधारने के लिए अपनी जान गंवा दी पर हम सिर्फ उन्हें आज श्रद्दांजलि देने का ढोंग तो नहीं करते हैं। अब से फेसबुक से लेकर व्हाट्सएप्प सब पर लोगों की डीपी में तिरंगा तो दिखाई देगा। पर सड़क पर उसी झंडे को उठाने के लिए कोई भी आगे नहीं आता है। सोचने वाली बात है क्या देश उस दशा में है जैसा पूर्वज बनाना चाहते थे?

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कैसे मान लें कि आज हम और हमारा देश आजाद है? जहां आज भी बेरोजगारी के चलते युवा चोरी-चकारी करने को मजबूर हैं? सड़क किनारे चलते ढाबों पर नन्हें-नन्हें हाथों वाले मासूम से छोटू अपने घर के बड़े बनकर पैसे कमाने की कोशिश में लगे रहते हैं? जहां आज भी लड़कियां घरों से बाहर निकलने में डरती हैं? लैला-मजनू, हीर-रांझा और राधा-कृष्ण जैसे प्यार की मिशालों वाले देश में ऑनर किलिंग के नाम पर सिर्फ इसलिए मार दिया जाता है क्योंकि वे अलग जाति के होते हैं?

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आज भी गांव में रहने वाले लोगों को बिजली नहीं मिलती है। तो वहीं बुंदेलखंड जैसी जगहों पर लोग प्यासे मरने को मजबूर हैं। एकता और सौहार्द के लिए दुनिया भर में फेमस हमारे देश में अखलाक जैसे लोगों की हत्या हो जाती है। तो वहीं पूना जैसी जगहों पर बेक़सूर लोगों को सिर्फ इसलिए पीटा जाता है क्योंकि वे दलित हैं?

चांद पर पहुंचने के बावजूद यहां की बेटियों को आंखें खोलने से पहले ही मार दिया जाता है। सड़क पर घूमते भेड़िए कब इनके दुपट्टों को खींच लें, कब वो हैवानियत का शिकार हो जाएं, यह कोई नहीं जानता है। हाल ही में हुए बुलंदशहर में गैंगरेप ने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया। रिश्ते और संस्कारों से भरे इस देश में आज लोग रिश्तों की इज्जत की भी धज्जियां उड़ाने में पीछे नहीं रहते हैं।

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इंडिया में हमेशा से झूठी पुरुषवादी सोच के चलते महिलाओं को आज भी दबाया जाता है। इसी वजह से आज इस देश में एक पिता भी अपनी बेटी का शोषण करने का मौका नहीं छोड़ता है। बेटियों को झूठी शान के नाम पर मार देने वाले समाज में मां-बेटियां उस वक़्त ही मर जाती हैं, जब कोई उनका जाने वाला ही उनपर भूखे शेर की तरह टूट पड़ता है।

आज देश की हालत ऐसी हो गई है कि जान बचाने वाले ही यमराज बनकर खड़े हुए हैं। आए दिन डॉक्टरों की हड़ताल के चलते बेचारे मासूम से मरीज तड़प-तड़प कर अपनी जान गंवा देते हैं। इसका सबसे बड़ा हाल ही में लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में देखने को मिला, जहां डॉक्टर्स की हड़ताल के चलते एक नवजात ने दम तोड़ दिया।

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उस वक़्त की एक तस्वीर को देखकर इंसानियत भी रो उठती है। आपको जानकार हैरानी होगी कि उस दिन की स्ट्राइक के चलते करीब 16 मरीजों की मौत हो गई थी। मरीज दर्द से कराह रहे थे और डॉक्टर्स जरा भी ध्यान नहीं देते हुए हंसते हुए अपनी हड़ताल के नारे लगा रहे थे।

जिन लोगों को देश में व्यवस्था बनाए रखने के लिए चुना गया है, वही लोग अपनी और अपने खानदान की जेबें भरने में लगे हुए हैं। सुरक्षा के नाम पर नागरिकों को राह चलते गोलियां खाने को मिल रही हैं। तो वहीं मात्र 15 रुपए को लेकर लोग एक-दूसरे की जान लेने पर अमादा हैं। भ्रष्टाचार की तो राजनीति से लाकर शिक्षा हर क्षेत्र में बाढ़ आई हुई है। मेहनत से ज्यादा आज गर्म जेबों को मौका मिल रहा है, टैलेंट की कदर नहीं है।

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बेचारे किसान दिन-रात हल जोतकर पूरे देशवासियों का पेट भर रहे हैं। लेकिन उनकी खुद की थाली में सूखा पड़ा हुआ है। आए दिन खबर आती है कि किसान ने आत्महत्या कर ली? आज भी यहां अनपढ़ लोग लगभग उतने ही हैं, जितने पहले हुआ करते थे। अंग्रेजों के चंगुल से छूट चुके लोग आज भी लोग अपनी छोटी मानसिकता से नहीं उभर पाए हैं। अगर लड़की के साथ कुछ गलत होता है, तो लोग उसे सुनने के बजाय उसी के चाल-चलन को गलत ठहरा देते हैं।

आज के युवा टेक्नोलॉजी में इस कदर गुम हो गए हैं कि उन्हें अपने बड़ों का ख्याल ही नहीं रहता है। पेरेंट्स से ज्यादा वो टेक्नोलॉजी जैसे मोबाइल फोन, कंप्यूटर को अहमियत देते हैं। आज इंसानियत ख़त्म हो रही है। एक समय था, जब पड़ोसी की तबियात ख़राब होती थी, तो उसके आस-पास के कुछ घरों में खाना नहीं बनता था, लेकिन आज लोगों को अपने ही लोगों के बीमार होने की खबर फेसबुक और व्हाट्सएप्प से मिल रही है।

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अंग्रेजों से छूटे तो लोग अंधविश्वास, भ्रष्टाचार, भुखमरी, रेप जैसी घटनाओं के गुलाम हो गए हैं। आज भले ही लोग स्वतंत्रता दिवस मना रहे हों, पर ये शायद उनका वहम है कि वे आजाद हैं एक तरह से देखा जाए, तो इस तरह से जश्न मनाना, उनकी गलतफहमी कही जाएगी। अच्छा हुआ, आज गांधी और नेहरु जैसे लोग नहीं जिन्दा हैं, वरना देश की ऐसी हालत देखकर उन्हें जो दुःख पहुंचता, उसका कोई अंदाजा नहीं लगा सकता है।

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ये वही देश है, जिसे उन्होंने सालों-साल लड़ाई लड़कर आजाद करवाया था हमारा देश तरक्की कर रहा है, ऐसा लोग किस बेस पर कहते हुए फिरते हैं। लोगों की सोच नहीं बदली। गरीब आज भी दो वक़्त की रोटी नहीं जुटा पा रहा है और हम आजादी का जश्न मनाने चले हैं। जरुरत है आज के लोगों को आजादी के सही मायने समझने की जिस देश की एकता की मिसालें दुनिया भर में दी जाती हैं, वहीं के लोग जाति-धर्म के नाम पर एक-दूसरे का खून बहाने को आज तैयार हैं। ऐसे में भला लोग आजादी का जश्न कैसे मना सकते हैं।

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अगर लोग वाकई स्वतंत्रता दिवस को सार्थक करना चाहते हैं, तो जरुरत है मिलजुलकर भ्रष्टाचार, गरीबी, अशिक्षा, साम्प्रदायिकता को खत्म करने की ताकि देश को उसी तरह से सुंदर बनाया जा सके, जैसा देश के पूर्वजों का सपना था इन मायनों में जीत हासिल करने के बाद आजादी का जश्न मनाने का उत्साह कहीं बढ़कर होगा और तभी स्वतंत्रता दिवस की सार्थकता साबित होगी।