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KGB ने मरवा दिया राष्ट्रपति, रखी मुस्लिम आतंकवाद की बुनियाद, जानिए पूरी कुंडली  

Rishi

RishiBy Rishi

Published on 29 Aug 2018 11:50 AM GMT

KGB ने मरवा दिया राष्ट्रपति, रखी मुस्लिम आतंकवाद की बुनियाद, जानिए पूरी कुंडली  
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नई दिल्ली : आज हम आपको बताएंगे सोवियत संघ की सुरक्षा एजेंसी केजीबी यानी कोमितेत गोसुदर्स्त्वेन्नोय बेज़ोप्स्नोस्ति के बारे में। इसे सोवियत राज्य सुरक्षा समिति कहा जाता था। वर्ष 1991 में केजीबी प्रमुख ब्लादिमीर खिश्कोव ने बागियों की मदद की थी। लेकिन ये बगावत नाकाम रही और खिश्कोव को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। इसके बाद केजीबी को दो हिस्सों में बांट दिया गया।

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इसके बाद एफसीबी और एसवीआर का जन्म हुआ। एफसीबी के जिम्मे आंतरिक सुरक्षा और एसवीआर के जिम्मे विदेशी इंटेलिजेंस का काम दिया गया।

मास्को में एफएसबी का मुख्यालय लुबियंका नाम की इमारत में है। सोवियत संघ में केजीबी इसी इमारत में कैदियों से पूछताछ किया करती थी।

आपको बता दें रूस के पूर्व राष्ट्रपति और मौजूदा पीएम ब्लादिमीर पुतिन 16 साल तक केजीबी एजेंट रहे हैं।

आइए जानते हैं कब हुआ केजीबी का गठन

वर्ष 1953 से 1964 तक सोवियत संघ के राष्ट्रपति थे निकिता ख्रुश्चेव। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जब उन्होंने देश की सत्ता अपने हाथों में ली तो उन्हें इस बात का अंदाजा था कि अगर दुनिया को अपनी मुट्ठी में करना है तो ऐसी एजेंसी का गठन करना होगा जो किसी भी हद तक जाने को हमेशा तैयार रहे। जिसके एजेंट दुनिया में कहीं भी कभी भी काम को बिना अंजाम की परवाह किए निपटा सकें।

ख्रुश्चेव ने वर्ष 1954 में पीपुल्स कमीशैरियत फॉर इंटरनल अफेयर्स एजेंसी को समाप्त कर केजीबी का गठन किया। ख्रुश्चेव ने केजीबी को देश से भी अधिक ताकत दी थी, ताकि कोई उसके काम में दखल न दे सके। केजीबी के प्रमुख को चेयरमैन कहा जाता था। इसे पोलित ब्यूरो द्वारा चुना जाता था। चेयरमैन फर्स्ट डिप्टी चेयरमैन, डिप्टी चेयरमैन चुनता था। ये सभी एजेंसी के लिए जासूस चुनते थे। इसके दो तरह के एजेंट थे। पहले जो सरकारी नौकरी में होते थे और दुश्मन देशों में सोवियत संघ के लिए जासूसी करते और सोवियत एंबेसी में रहते थे। दूसरे वो जो नाम और पहचान बदल दुनिया भर में काम करते थे। इनकी जानकारी सिर्फ चेयरमैन को होती थी। देश में इनके सभी रिकार्ड मिटा दिए जाते थे।

केजीबी के एजेंट दुनिया के हर बड़े शहर में मौजूद होते थे। दुनिया के सभी बड़े राजनेता वो चाहे अपने देश में पक्ष हों या विपक्ष में उनकी निगरानी केजीबी के एजेंट हमेशा करते थे। ये वो दौर था जब सोवियत संघ में हर चौथा व्यक्ति केजीबी से जुड़ा था।

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अल्फा ग्रुप

इस ग्रुप में ऐसे सैनिक होते थे जो बेरहम, वहशी और खूंखार होते थे। इनका ब्रेनवाश ऐसे किया जाता था कि ये सिर्फ आदेशों का पालन करते थे। इनमें दया रहम या भावनाओं का कोई अंश नहीं होता था।

ये तो रही कुंडली अब बात करते हैं केजीबी के उन बड़े कांड के बारे में जिन्होंने दुनिया को बताया कि ये किस हद तक जा सकते थे

ऑपरेशन स्टॉर्म

27 दिसंबर 1979 शाम के लगभग सवा सात बज रहे थे। केजीबी चेयरमैन ने अल्फा ग्रुप को अफगानिस्तान के ताजबेग पैलेस में मौजूद राष्ट्रपति हफीजुल्लाह अमीन को मारने के आदेश दिए। मिशन को पूरा करने के लिए अल्फा ग्रुप के 24 और केजीबी के 30 स्पेशल एजेंट्स का समूह बनाया गया था। इनकी मदद के लिए सोवियत संघ सेना की मुस्लिम बटालियन के 520 और एयरब्रोन रेजीमेंट के 345 सैनिकों को भी इस मिशन में लगाया गया। इन सभी ने ताजबेग पैलेस के पास की सभी इमारतों को अपने कब्जे में ले लिया ताकि अफगान सेना या राष्ट्रपति के सुरक्षाकर्मी दखल दें तो उनको वहीँ ढेर कर दिया जाए। इसके बाद कम्युनिकेशन टावर को बम से उड़ा दिया गया और राष्ट्रपति अमीन को मौत के घाट उतार दिया गया।

एक को मौत के घाट उतारने के लिए ले ली 269 लोगों की बली

1 सितंबर 1983 को कोरियन एयरलाइंस के बोइंग 747 विमान ने न्यूयॉर्क से सियोल के लिए उड़ान भरी। इसमें 246 यात्रियों सहित 23 क्रू मेंबर्स मौजूद थे। इनके साथ विमान में सवार था अमेरिकी कांग्रेस का सदस्य लॉरेंस मैक्डोनल्ड। उड़ान भरने के कुछ देर बाद विमान रास्ता भटक गया और सोवियत सीमा में दाखिल हो गया। पायलट को लगा की उसने कुछ गलत कर दिया है और उसने अपनी रफ़्तार कम कर दी। कुछ ही समय बीता था की एक लड़ाकू विमान उसके पीछे आ खड़ा हुआ। विमान के पायलट ने अपनी गति बढ़ा दी ताकि वो लड़ाकू विमान की गोलियों से बच सके। बोइंग इस लड़ाकू विमान की पहुंच से निकलने ही वाला था, तभी लड़ाकू विमान के पायलट को कंट्रोल रूम से आदेश मिला की बोइंग को मार गिराए।

लड़ाकू विमान के पायलट ने ऐसा ही किया और एक के बाद एक मिसाइलें दागना शुरू कर दिया। बोइंग के परखच्चे उड़ा दिए गए। सभी 269 लोगों को मार दिया गया।

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कांग्रेस को दिया फंड !

भारत में उस समय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। ललित नारायण मिश्र कांग्रेस के लिए फंड का इंतजाम देखा करते थे। उस समय एक दिन पीएम आवास पर एक व्यक्ति ब्रीफकेस लेकर आया। आरोप है कि ये ब्रीफकेस नोटों से भरा हुआ था। ये पैसा ललित नारायण मिश्र के लिए आया था। मिश्र यह बात बख़ूबी जानते थे कि यह पैसा सोवियत संघ से आया है और इसे केजीबी ने भेजा था।

हंसते मुस्कराते पार की परमाणु कार्यक्रम की जानकारियां

मार्च 1945, गुलाबी सर्दीली सुबह। एक व्यक्ति ब्रीफकेस लिए ब्रिटेन के एक पार्क में बैठा था। कुछ समय बाद उसके पास एक युवा जोड़ा हंसते-मुस्कराते आता है। ब्रीफकेस वाला व्यक्ति जोड़े को देख अपने स्थान से उठ जाता है। लेकिन ब्रीफकेस वहीं रहता है। थोड़ी देर बाद ये प्रेमी युगल ब्रीफकेस उठा वहां से निकल जाता है। उस ब्रीफकेस में ब्रिटिश और अमेरिकी परमाणु कार्यक्रम की जानकारियां थीं। जो व्यक्ति पहले से बैठा था वो और प्रेमी युगल दोनों ही केजीबी के एजेंट थे। पहले से बैठा व्यक्ति ब्रिटेन में रहता था। जबकि प्रेमी युगल वहां पर्यटक के तौर पर आया था।

मुसलमानों को बना दिया अमेरिका और इजरायल का कट्टर दुश्मन

केजीबी अपने साम्राज्यवाद के सपने में अमेरिका और इजरायल को सबसे बड़ा दुश्मन मनाता था। वो चाहता था कि ये दोनों देश किसी ऐसे मसले में उलझ जाएं जो इन्हें दुनिया में विलेन बना दे। इसके लिए काफी समय तक तैयारी की गई और 1972 में केजीबी के चेयरमैन यूरी आंद्रोपोव ने अपने सैकड़ों एजेंट्स को मुस्लिम देशों में भेजा। ये एजेंट्स प्रोपेगंडा लिटरेचर द प्रोटोकॉल ऑफ द एल्डर्स ऑफ जियोन की हजारों प्रतियों के साथ इन देशों में आए। इसमें बताया गया था कि अमेरिका एक यहूदी देश है। इस लिटरेचर की हजारों प्रतियां हर माह इस्लामी देशों में बांटती थी।

इस प्रचार में यह भी बताया गया था कि अमेरिका और इजरायल मुस्लिम देशों पर कब्ज़ा कर उनका दोहन करना चाहते।

केजीबी ने मुस्लिम आतंकवाद की बुनियाद रखी

आंद्रापोव वर्ष 1967 में अरब-इजरायल के युद्ध से 6 दिन पहले केजीबी चेयरमैन बने थे। इस युद्ध में इजरायल ने सोवियत संघ के साथी देश सीरिया और मिस्र को हराया था था। इसके बाद आंद्रापोव ने इजरायल से बदला लेने और उसे तबाह करने का प्लान बनाया। इसके लिए केजीबी ने फिलिस्तीनी आतंकियों को प्लेन हाईजैक,बम विस्फोट करने और मिलेट्री ट्रेनिंग भी दिलवाई।

इसके बाद इन आतंकियों ने बड़े हमले किए। पहले 30 मई, 1972 को बेन गुरिआन एयरपोर्ट पर हमला हुआ। इसमें 22 की अकाल मौत हुई थी। 76 घायल हुए। उसके बाद 4 जुलाई, 1975 को येरुशलम में जिलोन स्क्वेयर पर बमबारी हुई थी। इसमें 15 लोगों की जान चली गई थी और 62 घायल हुए थे।

कैनेडी की हत्या में हाथ

22 नवंबर 1963 को राष्‍ट्रपति जॉन एफ कैनेडी को टेक्सास के डैलास शहर में उस वक्‍त गोली मार दी गई थी जब वह एक ओपन कार में लोगों के बीच जा रहे थे।

एफबीआई, वॉरेन कमीशन और हाउस सिलेक्ट कमिटी ऑन असैसिनेशन ने आधिकारिक तौर पर यह निष्कर्ष पेश किया की ऑस्वाल्ड एकमेव हत्यारा था।

सोवियत संघ के राष्ट्रपति निकिता ख्रुश्चेव का नाम भी आया सामने। कैनेडी की हत्‍या के बाद यह बात सामने आई कि उन्‍होंने अपनी केजीबी एजेंट के हाथों ये हत्या करवाई है। हालांकि जांच के अंत तक केजीबी के हाथ की पुष्टि नहीं हो सकी लेकिन चर्चाएं कभी बंद भी नहीं हुईं।

Rishi

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आशीष शर्मा ऋषि वेब और न्यूज चैनल के मंझे हुए पत्रकार हैं। आशीष को 13 साल का अनुभव है। ऋषि ने टोटल टीवी से अपनी पत्रकारीय पारी की शुरुआत की। इसके बाद वे साधना टीवी, टीवी 100 जैसे टीवी संस्थानों में रहे। इसके बाद वे न्यूज़ पोर्टल पर्दाफाश, द न्यूज़ में स्टेट हेड के पद पर कार्यरत थे। निर्मल बाबा, राधे मां और गोपाल कांडा पर की गई इनकी स्टोरीज ने काफी चर्चा बटोरी। यूपी में बसपा सरकार के दौरान हुए पैकफेड, ओटी घोटाला को ब्रेक कर चुके हैं। अफ़्रीकी खूनी हीरों से जुडी बड़ी खबर भी आम आदमी के सामने लाए हैं। यूपी की जेलों में चलने वाले माफिया गिरोहों पर की गयी उनकी ख़बर को काफी सराहा गया। कापी एडिटिंग और रिपोर्टिंग में दक्ष ऋषि अपनी विशेष शैली के लिए जाने जाते हैं।

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