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जब ट्रेन के डिब्बे से फेंके गए, रंगभेद के बने शिकार, तब बापू ने फुटबॉल को बनाया हथियार

बापू को ये खेल इसलिए भी पसंद था कि ये टीम गेम है । जबतक पूरी टीम का प्रदर्शन अच्छा नहीं हो इस खेल में जीत मुश्किल हो जाती है । उन्हें लगता था कि टीम वर्क को बढ़ावा देने के लिए ये बेजोड़ खेल है ।कानून की पढाई पूरी करने के बाद प्रैकि्टस के दौरान उन्होंनें फुटबाल को अच्छी तरह समझा चूकि ये मध्यम और गरीब लोगों का खेल था इसलिए इसे देखने के लिए काफी भीड़ जुटती थी ।

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priyankajoshiBy priyankajoshi

Published on 30 Sep 2016 12:48 PM GMT

जब ट्रेन के डिब्बे से फेंके गए, रंगभेद के बने शिकार, तब बापू ने फुटबॉल को बनाया हथियार
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लखनउ: देश की आजादी के लिए जीवन भर संघर्ष करने के बाद भारतीय करेंसी पर मुस्कुराते महात्मा गांधी का किसी खेल से भी प्यार हो सकता है ,ये लोगों के लिए आश्चर्य की बात हो सकती है लेकिन ये सच हे कि मोहनदास करमचंद गांधी की फुटबाल खेल के प्रति दीवानगी हद से ज्यादा थी।

इतना ही नहीं उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में कानून की पढ़ाई के दौरान इस खेल को नस्लभेद के खिलाफ अपना हथियार बनाया था । मोहनदास करमचंद गांधी दक्षिण अफ्रीका कानून की पढ़ाई करने गए थे। जहां उन्हें रंगभ्रेद का दंश झेलना पड़ा था। टिकट होने के बावजूद उन्हें ट्रेन के डिब्बे से फेंक दिया गया, क्योंकि उस डिब्बे में अंग्रेज सफर कर रहे थे ।

आगे की स्लाइड में जाने बापू कैसे जुड़े फुटबॉल से ...

अंग्रेजी शासन वाले देशों में क्रिकेट ही लोकप्रिय था। यही हाल दक्षिण अफ्रीका का भी था। इसे सिर्फ अंग्रेज ही खेला करते थे। अन्य लोगों को तो मैदान में जाने की भी मनाही थी। फुटबाल गरीब या मध्यम वर्ग के लोग खेला करते थे। बस बापू ने इस मौके का फायदा उठाया और फुटबॉल को अपना अस्त्र बना लिया ।

आगे की स्लाइड्स में देखिये बापू की कुछ और फोटोज ...

बापू को ये खेल इसलिए भी पसंद था कि ये टीम गेम है । जबतक पूरी टीम का प्रदर्शन अच्छा नहीं हो इस खेल में जीत मुश्किल हो जाती है । उन्हें लगता था कि टीम वर्क को बढ़ावा देने के लिए ये बेजोड़ खेल है ।कानून की पढाई पूरी करने के बाद प्रैकि्टस के दौरान उन्होंनें फुटबाल को अच्छी तरह समझा ।चूकि ये मध्यम और गरीब लोगों का खेल था इसलिए इसे देखने के लिए काफी भीड़ जुटती थी ।

आगे की स्लाइड्स में देखिये गांधीजी की अनदेखी फोटोज ...

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भीड़ को देखते ही गांधी जी ने इससे लोगों को जोड़ने की बात सोची । उन्होंने डरबन,प्रिटोरिया और जोहान्सबर्ग में तीन क्लब बनाए । संभवत ये तीन क्लब ऐसे थे जिसे गोरे नहीं चलाते थे । इत तीन क्लबों के मैच में दर्शक भी अच्छी खासी संख्या में आते थे ।बापू इनके मैचों में खेलते तो नहीं थे लेकिन मौजूद हमेशा रहते थे । वो मैच के दौरान नस्ल भेद के खिलाफ पंप्लेट बांटा करते । मैच से होने वाली कमाई उन गरीब और मध्यम लोगों के परिवार के बीच बांटी जाती थी जो नस्लभेद का शिकार हुए थे । गांधी जी का मानना था कि किसी खेल पर खिलाड़ियों की त्वचा के रंग का कोई असर नहीं होता।

आगे की स्लाइड्स में देखिये गांधीजी की अनदेखी फोटोज ...

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बापू ने दक्षिण अफ्रीकन एसोसिएशन ऑफ हिंदू फुटबाल का भी गठन किया था । भारत लौटने के बाद उनका आजादी के आंदोलन के कारण फुटबॉल से नाता टूट गया ।

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इन्होंने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत नई दिल्ली में एनडीटीवी से की। इसके अलावा हिंदुस्तान लखनऊ में भी इटर्नशिप किया। वर्तमान में वेब पोर्टल न्यूज़ ट्रैक में दो साल से उप संपादक के पद पर कार्यरत है।

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