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ना डालो नदी में पैसे, महंगी पड़ेगी आस्था, डावांडोल होगी अर्थव्यवस्था

Newstrack
Updated on: 6 Jun 2016 9:12 AM GMT
ना डालो नदी में पैसे, महंगी पड़ेगी आस्था, डावांडोल होगी अर्थव्यवस्था
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लखनऊ: देश में एक चलन है कि जब रेलगाड़िया नदी से गुजरती हैं तो यात्री उसमें सिक्के डाल दिया करते हैं । खासकर ब्रह्मपुत्र, गंगा और यमुना नदी में ये ज्यादा होता है । अगर रोज के सिक्को के हिसाब से गणना की जाए तो ये रकम कम से कम लाखों में होती है।

सोचने वाली बात ये है कि इस तरह हर रोज भारतीय मुद्रा ऐसे फेंक दी जाती। जरा सोचिए इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान पहुंचता होगा ? इसकी सही गणना कोई अर्थशास्त्री ही कर सकता है। लेकिन इसका एक वैज्ञानिक पहलू भी है ।

इससे कई बीमारियों का आगाज

भारतीय जल आयोग के अनुसार वर्तमान सिक्के 83% लोहा और 17 % क्रोमियम के बने होते हैं। क्रोमियम एक जहरीली धातु है। क्रोमियम दो अवस्था में पाया जाता है, एक Cr (III) और दूसरी Cr (IV)। पहली अवस्था जहरीली नहीं मानी गई, बल्कि क्रोमियम (IV) की दूसरी अवस्था 0.05% प्रति लीटर से ज्यादा हमारे लिए जहरीली है। जो सीधे कैंसर जैसी असाध्य बीमारी को जन्म देती है।

कोई भी नदी अपने आप में बहुमूल्य खजाना छुपाए रखती है । एक दो रूपये के सिक्के से कैसे उसका भला हो सकता है ? सिक्के फेंकने का चलन तांबे के सिक्के से है। औरंगजेब के जमाने में दूषित पानी से बीमारियां फैली थी।

आस्था के नाम पर नुकसान

बादशाह ने ऐलान करवाया कि हर व्यक्ति को अपने आसपास के जल के स्रोत या जलाशयों में तांबे के सिक्के फेंकेगा, क्योंकि तांबा जल को शुद्ध करने वाली सबसे अच्छी धातु है। सिक्के नदी में फेंकने से किसी तरह का उपकार नहीं, बल्कि इससे जल प्रदूषण और बीमारियों को बढ़ावा ही मिलेगा। आस्था के नाम पर भारतीय मुद्रा को भी नुकसान हो रहा है ।

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