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शिकस्त की खाई को पाटने के लिए हो रही रैली, 2014 में स्मृति 90 हज़ार वोट से थीं हारी

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Published on 10 Oct 2017 4:36 AM GMT

शिकस्त की खाई को पाटने के लिए हो रही रैली, 2014 में स्मृति 90 हज़ार वोट से थीं हारी
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अमेठी: कांग्रेस और गांधी परिवार के गढ़ अमेठी के कौहार में पहली बार भगवा रंग में शराबोर बीजेपी का लंबा चौड़ा मंच सजेगा। कहने को ये मंच अमेठी में मोदी सरकार के विकास की योजनाओं के बयार बहाने के लिए सज रहा है, पर इस तीर से दूसरा निशाना साधने की तैयारी है। लोगों के क़यास के मुताबिक़ 2014 में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की यहां 90 हज़ार से हुई शिकस्त की खाई को भी पाटने की क़वायद तेज़ है।

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शायद यही वजह है कि कौहार में भगवा रंग में सजे लंबे चौड़े मंच पर रैली की अध्यक्षता खुद श्रीमती ईरानी करेंगी और मेहमानों के रूप में आए वक्ताओं की फेहरिस्त में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ बीजेपी के दीगर ज़िम्मेदार और मंत्री माइक पर गरजेगें। वहीं ख़ास बात ये होगी कि पहली बार यूपी के सीएम और यूपी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष अमेठी के लोगों से सीधे तौर पर रुबरु होकर उनमें नई जान फूकेंगे।

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2019 तक अमेठी नहीं छोड़ेगीं ईरानी

आपको बता दें कि अभी इस बात के कोई पुख्ता प्रमाण तो नहीं मिले हैं, इसका सटीक उत्तर तो अमेठी में भगवा रंग से सजे मंच पर बीजेपी के कद्दावर नेता ही देंगे। अगर खुलकर नहीं तो ढके छुपे जुमलों में ही सही मिलेगा। वैसे कुछ हद तक रैली के एक दिन पहले अपने दो दिवसीय दौरे पर पहुंची केंद्रीय मंत्री के क्षेत्र में दौरे और अंत में मीडिया से की गई उनकी बात में जवाब मिला भी है। जिसे देख और सुन कहा जा सकता है कि फिलहाल 2019 तक श्रीमती ईरानी अमेठी को छोड़ने वाली नहीं हैं।

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बिफर पड़ी थी केंद्रीय मंत्री

गौरतलब रहे कि सोमवार को दो दिवसीय दौरे पर अमेठी पहुंची केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने सबसे पहले अपने लाव-लश्कर के साथ रायबरेली ज़िले के सलोन विधानसभा का रुख किया। इसके बाद उन्होंने अमेठी में अपने करीबी नेता की मां के स्वास्थ्य की ख़बर लेने की औपचारिकता निभाते हुए सीधे जगदीशपुर के सेल की तरफ़ रवाना हो गई। यहां घंटे भर ठहर कर वो रैली स्थल पर पहुंची थीं, जहां कुछेक कमियां देखकर श्रीमती ईरानी डीएम और एसपी पर बिफर पड़ी थीं।

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स्मृति ने अमेठी के विकास पर यूं किया था तंज़

इसके बाद मीडिया से रुबरु होते हुए उन्होंने खुले शब्दों में कह दिया था कि "अमेठी की जनता को वो ये सुनिश्चित कराना चाहती हैं कि जनता को राहुल जी के दर्शन ज़्यादा हुए लेकिन विकास की तस्वीर बदली नहीं।"

वहीं ईरानी ने ये भी कहा था कि वो इसलिए कि सबने अपना समय दिया कि राहुल क्षेत्र में विकास करेंगे, "किंतु राहुल के नेतृत्व में मात्र एक लोकसभा का विकास न होने की वजह से और कांग्रेस की अनदेखी अपमान की वजह से आज मूलतः कांग्रेसी का अमेठी का नेतृत्व करने वाले राहुल का साथ छोड़ रहे हैं।"

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इन 3 विधानसभाओं पर स्मृति का है फोकस, जानें क्यों?

आपको बता दें कि फिर सभी कामों को निबटा कर वो सलोन में बीजेपी नेता दलजीत सिंह के घर पर गई और यहां रात का भोजन लिया। गौर करने वाली बात ये है कि सोमवार को उन्होंने ज़्यादातर वक़्त सलोन और उसके बाद जगदीशपुर को दिया। इसके पूर्व भी अपने दौरों में श्रीमती ईरानी घूम-फिरकर सलोन, तिलोई और जगदीशपुर में ही अधिक समय गुज़ार रहीं है।

उससे भी अधिक ध्यान देने वाला पहलू ये है कि जिन बड़े प्रोजेक को वो अमेठी में ला रहीं हैं उसकी बुनियाद तिलोई आदि इलाकों में ही पड़ रही है। बानगी के तौर पर बीते वर्ष अक्टूबर माह में तिलोई के जायस एरीये में राजीव गांधी पेट्रोलियम संस्थान को ही ले लिया जाए। ऐसे ही बहुतेरी विकास योजनाएं हैं।

मुस्लिम वोटों को साधने के लिए मोहसिन रज़ा को दिया अमेठी का प्रभार

दरअसल जानकार बताते हैं इसका मूल कारण ये है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कम समय में भी उन्होंने अमेठी के युवराज राहुल गांधी के मुकाबले में 3 लाख के क़रीब वोट हासिल किए थे। जिसमें अमेठी, गौरीगंज से उनको काफी अच्छा रिस्पांस मिला था, उनका जो वीक ज़ोन था वो तिलोई और जगदीशपुर रहा इसलिए इस बार उनका यहां फोकस ज़्यादा है। उसकी बड़ी वजह ये है के ये विधानसभा इलाके मुस्लिम बाहुल्य हैं, जिसको कैप्चर करने के लिए बीजेपी ने मोहसिन रज़ा को अमेठी का प्रभारी बनाकर इस वोट को बीजेपी के पाले में खैंचने का जिम्मा सौंपा है।

युवाओं में राहुल-प्रियंका के गिरता तो स्मृति का बढ़ता ग्लैमर

यहां बता दें कि बीजेपी की इस रैली से ठीक पहले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का दौरा भले ही रूटीन दौरा माना जा रहा हो, लेकिन सच तो ये है के वो कुछ हद तक स्थित को भांप गए थे और इसीलिए आनन-फानन में अमेठी आए। पहली अहम वजह ये कि जिस अमेठी में गांधी परिवार ख़ास तौर पर राहुल-प्रियंका ग्लैमर था उसमें अब काफी कमी आ चुकी है।

पुराने और बूढे हो चलें लोग भले ही आज भी इन्हें तवज्जो देते हों लेकिन के युवाओं में राहुल के मुकाबले स्मृति का ग्लैमर अधिक छा चुका है। खुद इस चीज़ को 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की स्टार प्रचारक प्रियंका गाँधी ने क़रीब से भी देखा, और यही वजह रही के इलेक्शन से दो दिन पहले तक उन्होंने भाई को जिताने के लिए अमेठी में पड़ाव डालकर पहले के चुनाव की अपेक्षा कई गुना ज़्यादा नुक्कड़ सभाएं की तो कहीं जाकर राहुल को 4 लाख के ऊपर वोट मिलें। इस पर गहन मंत्रणा करके 2019 के लिए बीजेपी खासकर स्मृति अभी से सारे जतन कर रही है, और ऐसे में कांग्रेस का पार पाना अब और भी मुश्किल दिखता है।

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