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मौत के बाद अगर हो ये काम तो फिर से जी उठेंगे इंसान

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sudhanshuBy sudhanshu

Published on 13 July 2018 2:20 PM GMT

मौत के बाद अगर हो ये काम तो फिर से जी उठेंगे इंसान
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नई दिल्ली: मरना कोई नहीं चाहता। लेकिन सबको एक दिन इस दुनिया को अलविदा कहना पड़ता है। लेकिन अब एक ऐसी तकनीक पर काम हो रहा है, जिसकी सफलता के बाद इंसान के मरने के सालों बाद भी उसे दोबारा जिंदा किया जा सकेगा।

अगर ऐसा हुआ तो आप सालों पहले मर चुके अपने अजीज को दोबारा जिंदा करवा सकते हैं। हालांकि अभी इस तकनीक की रिसर्च के लिए अमेरिका के 350 लोगों ने मरने के बाद अपना शरीर सौंपना का करार किया है। इन लोगों पर मेडिकल साइंस की इस तकनीक का प्रयोग किया जाएगा। इस तकनीक को क्रायोनिक्‍स टेक्‍नोलॉजी का नाम दिया गया है।

माइनस 150 डिग्री में रखी जाएगी बॉडी

इंसान को मरने के बाद जिंदा करने के लिए कुछ खास जतन करने होंगे। सबसे बड़ी चुनौती बॉडी को सुरक्षित रखने की होगी। बॉडी को जीरो से माइनस 150 डिग्री टेंपरेचर में ही रखना होगा। खास बात ये होगी कि इसमें जिस इंसान के शरीर को मरने के बाद संरक्षित करना होगा, उसे एक रजिस्‍ट्रेशन करवाना होगा।

जब रजिस्‍टर्ड इंसान की मौत हो जाएगी तो उसे कंपनी की लैब में लाया जाएगा। इसके बाद उसकी बॉडी को आइसपैक की मदद से ठंडा किया जाएगा। मौत के बाद बहुत तेजी से बॉडी को ठंडा कर जमाना प्राथमिकता होगी। इससे शरीर की कोशिकाएं और खास तौर पर मस्तिष्क की कोशिकाएं, ऑक्सीजन की कमी से टूट कर खराब न हों।

बॉडी का सारा ब्‍लड निकाला जाएगा

शरीर को ठंडा करने के बाद सारा रक्त निकाला जाएगा। इतना ही नहीं शरीर के अंगों के बचाव के लिए उसके हिमीकरण की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। रक्त निकालने के बाद शरीर में धमनियों के जरिए हिमीकरण रोधी द्रव डाला जाएगा। इसके बाद खोपड़ी मे छोटे-छोटे छेद किए जाते हैं। शरीर में जो हिमीकरण रोधी द्रव डाला जाता है उसे ‘क्रायो-प्रोटेक्टेंट’ केमिकल कहते हैं। जब ये केमिकल शरीर के अंदर पहुंच जाता है तो अंगों में बर्फ नहीं जमने पाती है। अगर शरीर में बर्फ जम गई तो कोशिकाओं की दीवार नष्ट हो जाएगी और शरीर संरक्षित होने से पहले ही नष्ट हो जाएगा।

इसके बाद शव को स्लीपिंग बैग में डाल कर लिक्विड नाइट्रोजन मे माइनस 196 टेंपरेचर पर सेल में रख दिया जाएगा। इस प्रक्रिया से शरीर को सौ सालों तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

हिम गिलहरी हो चुकी है जीवित

ये परीक्षण हिम गिलहरी पर खरा उतरा है। इसके अलावा इस तकनीक की सफलता में आर्कटिक क्षेत्र की जमीनी गिलहरी के अलावा कछुए की कुछ प्रजातियां भी शामिल हैं। वहीं हिम क्षेत्र आर्काटिका ऊनी कंबल कीड़ा भी क्रायोजेनिक तकनीक से सालों बाद फिर से जिंदा हो उठता है।

ऐसे में इस बात पर संभावना जता कर काम किया जा रहा है कि जब इतने ही समय में हिम गिलहरी जीवित हो उठती है तो इंसान क्यों नहीं। हालांकि इस बात को साबित होने में भी सौ से ज्यादा साल लगेंगे क्योंकि फिलहाल अमेरिका में 150 से अधिक लोगों ने अपने मृत शरीर को तरल नाइट्रोजन से ठंडा कर रखवाया है। पूरे शरीर को हिमीकरण के जरिए जमा कर सुरक्षित रखने में करीब 1,60,000 डॉलर ख़र्च अनुमानित किया गया है।

वर्तमान में अमेरिका की क्रायोनिक्स इंस्टीट्यूट, अल्कार फ़ाउंडेशन और क्रायोरस नामक कंपनियां इसके परीक्षण में लगी हैं।

साइंटिस्‍ट ने मां के ऊपर किया था प्रयोग

वर्ष 2011 में वैज्ञानिक राबर्ट एटींगर ने अपनी मां के शरीर को दोबारा जिंदा करने की उम्‍मीद से संरक्षित किया था। इतना ही नहीं उन्‍होंने अपनी दोनों पत्नियों की मौत के बाद भी उनके शरीर को संरक्षित करवाया है। इतना ही नहीं इस काम के लिए उन्‍होंने मरने के बाद अपनी बॉडी को भी संरक्षित करने की सहमति दी थी। ये वही राबर्ट एटींगर हैं जिन्होंने वर्ष 1964 अमरता की संभावना का घोषणापत्र जारी किया था। “द प्रास्पेक्ट आफ़ इम्मोर्टलीटी नामक घोषणापत्र में क्रायोजेनिक तकनीक के जरिए मानव के फिर से जीवन पाने की संभावनाओं पर पूरी थ्योरी लिखी गई है। जब उन्‍होंने ये थ्‍योरी लिखी तो मात्र 64 पेज में रिसर्च वर्क सीमित था, जिस पर काम करते हुए साइंटिस्‍टों ने 200 पेज के करीब रिसर्च कर डाली है। ऐसे में भविष्‍य में अपने अजीज मित्रों को दोबारा जिंदा करवाना शायद संभव हो सके।

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