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किसानों के मसीहा माने जाते थे चौधरी अजीत सिंह, विरासत में मिली राजनीति

राष्ट्रीय लोकदल सुप्रीमो व पूर्व केंद्रीय मंत्री अजित सिंह का 82 साल की उम्र में निधन हो गया है।

Chaudhary Ajit Singh
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फोटो— चौधरी अजीत सिंह (साभार— सोशल मीडिया)

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बागपत। राष्ट्रीय लोकदल सुप्रीमो व पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरीअजित सिंह का 82 साल की उम्र में निधन हो गया है। अजित सिंह कोविड संक्रमित थे और वह पिछले 22 अप्रैल से बीमार चल रहे थे हालत बिगड़ने पर पिछले दिनों उन्हें गरुग्राम के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जहां उन्होंने आज अंतिम सांस ली। बागपत ही नहीं अपितु मेरठ, बिजनौर, मथुरा, मुज़फ्फरनगर, शामली आसपास सभी जनपदों में जैसे ही ये खबर फैली तो घरों में मातम सा छा गया। लोग गमगीन हो गए और रोने लगे। अजित सिंह किसानों के एक बड़े नेता थे। जिन्होंने किसानों मजदूरों के लिए कई लड़ाइयां लड़ी थी। बताया जा रहा है कि अजित सिंह के फेफड़ों में कोरोना संक्रमण बढ़ने के कारण उनकी हालत नाजुक हो गयी थीं और वह वेंटिलेटर पर थे।

अजित सिंह देश के पूर्व प्रधानमंत्री और किसान नेता चौधरी चरण सिंह के पुत्र थे । पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चौधरी अजित सिंह की जाट परिवारों में काफी पैठ रही, इसीलिए वे जाटों के बड़े नेता माने जाते थे। वह कई बार केंद्रीय मंत्री भी रहे हैं। अजित सिंह उड्डयन मंत्री और कृषि मंत्री रहे है। अजित सिंह के निधन पर देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत कई बड़े नेताओं ने भी शोक प्रकट किया है।

चौधरी अजीत सिंह का जन्म 12 फरवरी, 1939 को मेरठ में हुआ था। अजीत सिंह लखनऊ विश्वविद्यालय और आईआईटी खड़गपुर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से शिक्षा ग्रहण कर चुके हैं। सत्रह वर्ष अमरीका में काम करने के बाद चौधरी अजीत सिंह वर्ष 1980 में अपने पिता द्वारा स्थापित लोकदल को सक्रिय करने के उद्देश्य से भारत लौटे थे। इनकी पत्नी का नाम राधिका सिंह था। अजीत सिंह के पुत्र जयंत चौधरी भी एक राजनीतिज्ञ हैं। जो राष्ट्रीय लोकदल पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।

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बता दें कि एक किसान प्रधानमंत्री के रूप में देश का प्रतिनिधित्व करने वाले पूर्व पीएम चौधरी चरण सिंह ने बागपत के सहारे ही इतिहास रचा था। वेस्‍ट यूपी से शुरू हुई इस सियासत की नई कहानी में कई ऐसे पड़ाव आए जब देश में किसानों के हक़ की आवाज के आगे राजनीति के धुरंधरों को भी घुटने टेकने पड़े। तभी से बागपत चौधरी का गढ़ कहा जाने लगा। चौधरी चरण सिंह के बाद उनकी राजनीतिक विरासत उनके बेटे अजीत सिंह को मिली। अजित सिंह बागपत लोकसभा सीट से सात बार सांसद चुने गए। उनके सियासी सफर की शुरुआत वर्ष 1986 में शुरू हुई थी। वर्ष 1967 में बागपत लोकसभा सीट बनी व 1977 से लेकर अब तक दो अवसरों को छोड़ दें तो बागपत लोकसभा सीट पर चौधरी चरण सिंह के परिवार का ही कब्जा रहा।

किसानों के मसीहा के तौर पर जाने जाने वाले चौधरी चरण सिंह यहां से 3 बार सांसद चुने गए। रालोद मुखिया चौधरी अजीत सिंह सात बार यहां से संसद पहुंचे। भाजपा के टिकट पर वर्ष 1998 में चुनाव लड़े सोमपाल शास्त्री ने चौधरी अजीत सिंह को पहली शिकस्त दी। वर्ष 2014 से पहले हुए मुजफ्फरनगर दंगे ने रालोद का जाट-मुस्लिम गणित बिगाड़ दिया और 2014 के लोकसभा चुनाव में मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर और भाजपा से चुनाव लड़े डा. सत्यपाल सिंह ने चौधरी अजीत का अभेद्य दुर्ग बागपत को फतह कर लिया। इस बार चौधरी अजीत सिंह चुनाव ही नहीं हारे बल्कि तीसरे नंबर पर रहे।

बता दें कि बागपत लोकसभा सीट पर सबसे पहले चुनाव वर्ष 1967- 71 में हुआ था। वर्ष 1967 में जब वोटिंग हुई थी तो लोगों में काफी उत्साह था और बागपत लोकसभा सीट पर उतरे प्रत्याशियों को लेकर अलग ही माहौल था। उस समय भारतीय जन संघ की ओर से रघुवीर सिंह शास्त्री यहां से सांसद चुने गए थे। उसके बाद वर्ष 1971 में चुनाव हुआ इसमें कांग्रेस के रामचंद्र विकल ने 51 फीसदी वोट से जीत का परचम लहराया था। इस चुनाव में भारतीय क्रांति दल की ओर से रघुवीर सिंह हार गए थे। उन्हें 36.4 प्रतिशत वोट मिले थे। वर्ष 1977 के लोकसभा चुनाव में चौधरी चरण सिंह चुनाव मैदान में उतरे और जबरदस्त समर्थन हासिल करते हुए 63.47 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। जबकि उनके सामने कांग्रेस के रामचंद्र विकल को महज 36.53 प्रतिशत वोट मिले थे।

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वर्ष 1980 की लोकसभा चुनाव में फिर से चौधरी चरण सिंह सांसद बने। हालांकि इस बार जनता पार्टी की ओर से वह मैदान में उतरे थे और 65.1 फीसदी वोट हासिल किए थे। उन्होंने फिर से कांग्रेस के रामचंद्र विकल को मात दी थी। रामचंद्र विकल को 31.88 फीसदी वोट मिले थे। यानी चौधरी चरण सिंह एक तरफा चुनाव जीत गए थे। उसके बाद वर्ष 1984 में चौधरी चरण सिंह जीत की हैट्रिक लगाई और 53.72 फीसदी वोट हासिल की, जबकि उनके विपक्ष में कांग्रेस के महेश चंद थे, जिन्हें 35.56 फीसदी ही वोट मिले थे। वर्ष 1989 में लोकसभा सीट से चौधरी अजीत सिंह जनता दल की ओर से मैदान में उतरे और जबरदस्त समर्थन हासिल करते हुए 70.32 फीसदी वोट हासिल की। जबकि उनके विपक्ष में कांग्रेस के महेश शर्मा रहे जिन्हें 27.32 फीसदी वोट मिले। उसके बाद वर्ष 1991 में जनता दल से फिर अजीत सिंह ने 61.08 फीसदी वोट हासिल करते हुए जीत दर्ज की। इस बार उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी जिले सिंह को मात दी थी।

कांग्रेस को महज 19.8 फीसदी वोट मिले थे। इस चुनाव में भाजपा की ओर से रणवीर सिंह ने चुनाव लड़ा था और महज 15.32 फीसदी ही वोट मिले थे। वर्ष 1996 में भारतीय किसान कामगार पार्टी की ओर से चौधरी अजीत सिंह ने जीत हासिल की। इस चुनाव में उन्हें 32.71 फीसदी वोट मिले थे। जबकि दूसरे स्थान पर सपा के मुखिया गुर्जर को 22.64 फीसदी वोट ही मिल पाए थे। भाजपा के वीर सेन सरोहा को 14.16 फीसदी ही वोट मिले थे। बसपा प्रत्याशी को महज 8.45 फीसदी वोट हासिल हुए थे। वर्ष 1998 में चौधरी परिवार को यह जोर का झटका लगा और जो भाजपा कभी तीसरे स्थान से ऊपर नहीं आई थी वह पहले स्थान पर पहुंच गई।

भाजपा की ओर से मैदान में उतरे सोमपाल शास्त्री ने जीत हासिल की उन्हें 37 फीसदी वोट मिले थे, जबकि चौधरी अजीत सिंह को 30.75 फीसदी वोट मिले थे। सपा के मैराजुद्दीन को 18.82 फीसदी वोट मिले थे। बसपा को 11.06 फीसदी वोट मिले थे। उसके बाद देश में वर्ष 1999 में लोकसभा चुनाव हुए और रालोद की ओर से मैदान में उतरे चौधरी अजीत सिंह को भारी समर्थन मिला और जीत दर्ज की। इस चुनाव में भाजपा के सोमपाल शास्त्री को 35 फीसदी वोट मिले थे। इस चुनाव में यह भी कहा गया था चौधरी साहब पिछली बार चुनाव में गए थे जिस कारण जनता की सहानुभूति उन्हें मिल गई थी और जीत हासिल हुई थी। उसके बाद वर्ष 2004 में सपा के साथ गठबंधन करके रालोद मुखिया चौधरी अजीत सिंह चुनावी मैदान में उतरे और जीत हासिल की। दूसरे स्थान पर बसपा से औलाद अली रहे जबकि तीसरे स्थान पर भाजपा से सत्यपाल सिंह मलिक रहे।

वर्ष 2009 का चुनाव चौधरी अजीत सिंह ने भाजपा के साथ गठबंधन कर लड़ा था। इस चुनाव में भी उन्होंने जीत हासिल की थी। दूसरे स्थान पर बसपा के मुकेश शर्मा और तीसरे स्थान पर कांग्रेस के सोमपाल रहे थे। जबकि चौथे स्थान पर साहब सिंह रहे थे। वर्ष 2014 के चुनाव में भाजपा ने पलटी मारी और चौधरी सिंह के जीत का अभियान रोक दिया। भाजपा की ओर से मैदान में उतरे मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह ने चौधरी अजीत सिंह को हरा दिया। डॉ. सत्यपाल सिंह को 42.15 फीसदी वोट मिले थे जबकि दूसरे स्थान पर सपा के गुलाम मोहम्मद रहे थे। उन्हें 21.26 फीसदी वोट मिले थे। तीसरे स्थान पर रालोद मुखिया चौधरी अजीत सिंह रहे थे उन्हें 19.86 फीसदी वोट मिले थे। बसपा के प्रशांत चौधरी को 14.11 फीसदी वोट मिले थे, वह चौथे स्थान पर रहे थे। बागपत लोकसभा सीट के करीब 52 साल के सियासी इतिहास में भाजपा का कमल यहां केवल तीन बार खिला है। कांग्रेस भी यहां जीत दर्ज कर चुकी है। सपा व बसपा को अभी तक यहां से जीत का स्वाद चखने को नहीं मिला है। वर्ष 2019 में अजित सिंह के बेटे और लोकदल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी भी डॉ. सत्यपाल सिंह से चुनाव हार गए।

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Raghvendra Prasad Mishra

Raghvendra Prasad Mishra

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