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बाबरी विध्वंस: कारसेवकों के उग्र तेवर, फिर भी नरम थे कल्याण, ठुकराया था अनुरोध

1992 में 6 दिसंबर की तारीख केवल अयोध्या  ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी दिन उम्र कारसेवकों ने अयोध्या में विवादित ढांचा तोड़ दिया था। जिस समय यह घटना हुई उस समय उत्तर प्रदेश की कमान मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के हाथों में थी।

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MonikaBy Monika

Published on 6 Dec 2020 4:37 AM GMT

बाबरी विध्वंस: कारसेवकों के उग्र तेवर, फिर भी नरम थे कल्याण, ठुकराया था अनुरोध
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6 दिसंबर, 1992: कारसेवकों के उग्र तेवर, फिर भी नरम थे कल्याण, ठुकरा था यह अनुरोध
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लखनऊ: 1992 में 6 दिसंबर की तारीख केवल अयोध्या ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी दिन उम्र कारसेवकों ने अयोध्या में विवादित ढांचा तोड़ दिया था। जिस समय यह घटना हुई उस समय उत्तर प्रदेश की कमान मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के हाथों में थी। विवादित ढांचा तोड़े जाने के बाद कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था।

6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में कारसेवकों के उग्र तेवर को देखते हुए फैजाबाद जिला प्रशासन की ओर से फायरिंग की अनुमति मांगी गई थी मगर तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने जिला प्रशासन का यह अनुरोध ठुकरा दिया था। कल्याण सिंह का अभी भी यह कहना है कि मुझे अपने उस फैसले पर गर्व है क्योंकि मैंने कारसेवकों को पुलिस की गोलियों का निशाना नहीं बनने दिया।

ढांचा टूटने से ही निकला समाधान का रास्ता

अब सुप्रीम कोर्ट की ओर से अयोध्या विवाद का निपटारा किया जा चुका है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों अयोध्या में भव्य राम मंदिर के लिए भूमि पूजन के बाद निर्माण का काम भी शुरू हो चुका है।

भूमि पूजन के मौके पर भी कल्याण सिंह ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा था कि अब सभी को यह बात मान लेनी चाहिए कि यदि अयोध्या में विवादित ढांचा मौजूद रहता तो इस विवाद के समाधान का रास्ता कभी भी नहीं निकल पाता। कल्याण सिंह का मानना है कि अयोध्या में विवादित ढांचा ढह जाने से ही मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो सका है।

गुलामी की निशानी, जनता को नहीं भाई

जब कारसेवकों ने 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचे को तोड़ डाला तो कल्याण सिंह ने कहा था कि सच्चाई तो यह है कि गुलामी की निशानी, जनता को नहीं भाई। आने वाला इतिहास ही इस बात का फैसला करेगा कि यह सही हुआ या गलत। उन्होंने यह भी कहा था कि मैं कौन होता हूं इस कदम को सही या गलत बताने वाला। इस बात का फैसला तो इतिहास ही करेगा।

28 साल पहले दी गई अपने इस प्रतिक्रिया के बाद अब कल्याण सिंह का मानना है कि यदि कारसेवकों ने 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचे को न तोड़ा होता तो शायद कभी भी इस विवाद को सुलझाने की कोशिशों में तेजी न आ पाती।

उन्होंने कहा कि अब सबको यह बात मान लेनी चाहिए कि विवादित ढांचे को तोड़े जाने से ही मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो सका। यदि विवादित ढांचे का वजूद बना रहता तो कभी भी इस विवाद का निपटारा नहीं हो पाता।

कल्याण सिंह को फैसले पर गर्व

पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह हमेशा इस बात को कहते रहे हैं कि उन्हें 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों पर गोली न चलाने के फैसले पर गर्व है। उनका कहना है कि 1992 में 6 दिसंबर को फैजाबाद के जिला प्रशासन ने मुझे मौके पर स्थिति विस्फोटक होने की जानकारी दी थी।

जिला प्रशासन का कहना था कि बहुत ज्यादा भीड़ होने के कारण सुरक्षाबलों की टुकड़ियां साकेत महाविद्यालय से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। अब गोली चला कर ही उम्र कारसेवकों को काबू में किया जा सकता है।

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ऐसी स्थिति में भी कल्याण सिंह ने पूरी दृढ़ता के साथ किसी भी हालात में कारसेवकों पर गोली न चलाने का आदेश दिया था। कल्याण सिंह का आज भी मानना है कि उन्हें अपने फैसले पर गर्व है क्योंकि कोई राम भक्त दूसरे राम भक्तों के खून से अपना हाथ नहीं र॔ग सकता।

अब बस यही इच्छा रह गई बाकी

अस्वस्थ होने के कारण भूमि पूजन के मौके पर अयोध्या नहीं जा सके कल्याण सिंह का कहा था कि मेरी बस एक ही इच्छा बाकी रह गई है कि मैं प्रभु राम के जन्म स्थान पर भव्य राम मंदिर का दर्शन कर सकूं। राम के जन्म स्थान की भव्यता का दर्शन करने के बाद ही मैं चैन से मरना चाहता हूं।

28 साल बाद बरी हुए आरोपी

28 साल तक चले बाबरी विध्वंस के केस में आखिरकार सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने गत दिनों सभी 32 आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि बाबरी मस्जिद को किसी साजिश के तहत नहीं गिराया गया बल्कि यह घटना अचानक हुई थी।

अदालत की ओर से बरी होने वाले 32 आरोपियों में भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती, महंत नृत्य गोपाल दास, विनय कटियार, चंपत राय और साक्षी महाराज शामिल हैं।

अयोध्या मुद्दे का सियासत पर सबसे बड़ा असर

अयोध्या ऐसा मुद्दा है जिसने पिछले साढ़े तीन दशकों के दौरान देश की सियासत को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। सही बात तो यह है कि इस अकेले मुद्दे ने देश की राजनीति और राजनीतिक दलों की ताकत में बड़ा अंतर पैदा कर दिया। कोर्ट के फैसले के बाद अब भाजपा, संघ और विहिप पर से बाबरी विध्वंस की साजिश का दाग भी मिट गया है।

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अयोध्या मुद्दे ने देश की सियासत को किस हद तक प्रभावित किया है, इसे इसी से समझा जा सकता है कि भाजपा शून्य से शिखर पर पहुंच गई है जबकि उसकी विरोधी पार्टियां कांग्रेस और कम्युनिस्ट की ताकत लगातार कमजोर होती जा रही है। भाजपा को अयोध्या के मुद्दे ने ऐसी संजीवनी बूटी दी है कि अब वह देश की सबसे बड़ी सियासी ताकत बन चुकी है।

अंशुमान तिवारी

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