महामारी का कहर: कुपोषित बच्चों को खतरा, रहना होगा सावधान

जिले में कोरोना संक्रमण कुपोषित बच्चों पर कहर बनकर टूटने का भयावह खतरा है। इसका प्रमुख कारण है कि कुपोषित बच्चों में रोग प्रति रोधक क्षमता कम होती है। कोरोना, रोग प्रतिरोधक की कमी वालों के लिए मौत का परकाला माना जाता है।

रिपोर्ट- शरद चंद्र मिश्रा

बांदा: जिले में कोरोना संक्रमण कुपोषित बच्चों पर कहर बनकर टूटने का भयावह खतरा है। इसका प्रमुख कारण है कि कुपोषित बच्चों में रोग प्रति रोधक क्षमता कम होती है। कोरोना, रोग प्रतिरोधक की कमी वालों के लिए मौत का परकाला माना जाता है। इस तथ्य कि पुष्टि विशेषज्ञ चिकित्सक भी करतें हैं। बांदा जिले का यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि कुपोषण का कलंक अब तक नहीं खत्म हो पाया।

न तो सिस्टम इसके प्रति गंभीर है और न ही उसे अपनी जिम्मेदारी का एहसास है। हर साल सुपोषण सप्ताह तो चला दिया जाता है लेकिन इसका कितने लोगों को क्या लाभ मिला इसे जानने की फुर्सत किसी को नहीं होती। वर्तमान में 40 हजार से ज्यादा बच्चे कुपोषण से जंग लड़ रहे हैं।

यह भी पढ़ें: भारतीय मूल का ये वित्त मंत्री जो संभाल रहा ब्रिटेन की बागडोर, जानें इनके बारे में

कागजी आंकड़े बाजी का ही शिकार होता है सुपोषण सप्ताह

कुपोषण मिटाने के लिए चलाया जाने वाला सुपोषण सप्ताह कागजी आंकड़े बाजी का ही ज्यादा शिकार हो जाता है और अधिकारियों की जेबें पोषित हो जाती हैं! स्थानीय स्तर पर कोई प्रयास नहीं दिखाई देता। न तो जागरूकता के लिए ईमानदारी से काम। कुपोषित बच्चों का कोई पुरसा हाल व्यवस्थित नहीं है! बात उनके इलाज की करें तो जिला अस्पताल में बने पोषण पुनर्वास केंद्र में कुछ देखभाल जरूर होती है लेकिन समुचित व्यवस्थाएं न होने के कारण जरूरत के हिसाब से इलाज नहीं मिल पाता।

इन पर बना है कोरोना का ग्रहण

कुपोषण मिटाने के लिए गर्भवती महिलाओं को प्रोटीन और आयरन की गोलियां देने का प्रावधान है। हर तीन माह बाद गर्भवती महिलाओं को चेकअप कराना होता है लेकिन न तो इन तक दवाएं पहुंच रही हैं न ही इन्हें चेकअप के लिए जागरूक किया जा रहा है। इन सब पर कोरोना का ग्रहण है।

यह भी पढ़ें: दुनियाभर को तगड़ा झटका, ऑक्सफोर्ड वैज्ञानिक ने वैक्सीन को लेकर कहा ये

भ्रष्टाचार के चलते बच्चों को नहीं मिल रहा बच्चों को पोषाहार

कहने के लिये तो बच्चों के संतुलित आहार के लिए आंगनबाड़ी केंद्रों पर हर माह पोषाहार की व्यवस्था है। इसमें सभी तरह के विटामिन होते हैं। हालांकि कथित भ्रष्टाचार की बदौलत ये पोषाहार दुधारू जानवरों के पेट में चला जाता है।

कुपोषित बच्चों की 33,316 से भी ज्यादा

जिले में कुपोषण की स्थिति पर नजर डालें तों 23 लाख के जिले कुल आबादी में सरकारी आकड़ों के अनुसार 33,316 कुपोषित बच्चों की संख्या है, इसमें 10,369 बच्चे अति कुपोषण का शिकार हैं। जिला कार्यकम अधिकारी इशरत जहां का दावा है कि कुपोषित बच्चों के लिए बाल विकास परियोजना से कार्यक्रम चलता है। पोषाहार भी बांटा जाता है।

जिलाधिकारी का कहना कुछ और हकीकत कुछ और

कोरोना संक्रमण में कुपोषित बच्चों का बचाव कि व्यवस्था के बारे में जिलाधिकारी अमित सिंह बंसल से हमने सवाल दागे तो उनका जवाब था कि कोरोना मरीजों की निगरानी में ड्यूटी पर लगी आशा कार्यकर्ताओं को निर्देश हैं कि कुपोषित बच्चों को चिन्हित करें और उन्हें अस्पताल पहुंचायें ताकि उनकी देखभाल हो सके। हर सप्ताह समीक्षा भी होगी। लेकिन फिलहाल तो ग्राउंड लेविल पर आदेशों का पालन हवा- हवाई ही दिखाई देती है!

यह भी पढ़ें: घर पहुंचकर भी बेगाने हुए मजदूर, जगह नहीं तो खेत में ही बना लिया एकान्तवास

देश दुनिया की और खबरों को तेजी से जानने के लिए बनें रहें न्यूजट्रैक के साथ। हमें फेसबुक पर फॉलों करने के लिए @newstrack और ट्विटर पर फॉलो करने के लिए @newstrackmedia पर क्लिक करें।