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कोरोना के हवन कुंड में उच्च शिक्षा की आहुति को आतुर हैं ये मंत्री

परंपरागत भारतीय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन का पैरोकार बनने वाली पार्टी से मंत्री बनने के बावजूद उनका मंतब्य शिक्षा का बाजार बनाना है जिसमें बड़े पूंजीपति मंडी सजायेंगे और शिक्षक मजदूरों की भांति अपना ज्ञान बेचने के लिए चौराहों पर खड़े होंगे।

SK Gautam

SK GautamBy SK Gautam

Published on 18 April 2020 11:34 AM GMT

कोरोना के हवन कुंड में उच्च शिक्षा की आहुति को आतुर हैं ये मंत्री
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जौनपुर: उत्तर प्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा मंत्री, शिक्षा और शिक्षक दोनों के द्रोही हैं। अपने तुगलकी फरमानों से उन्होंने साबित किया है कि शैक्षणिक मूल्यों से उनका दूर दूर का कोई वास्ता नही है। परंपरागत भारतीय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन का पैरोकार बनने वाली पार्टी से मंत्री बनने के बावजूद उनका मंतब्य शिक्षा का बाजार बनाना है जिसमें बड़े पूंजीपति मंडी सजायेंगे और शिक्षक मजदूरों की भांति अपना ज्ञान बेचने के लिए चौराहों पर खड़े होंगे। शिक्षक और शिक्षा का इस तरह का अपमान शायद कभी नही हुआ जैसा आज के उच्च शिक्षा मंत्री दिनेश शर्मा द्वारा किया जा रहा है।

शिक्षा माफिया के दबाव में मंत्री महोदय

यह आरोप अनुदानित महाविद्यालय विश्वविद्यालय अनुमोदित शिक्षक संघ उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष डॉ विजय प्रताप तिवारी ने आरोप लगाते हुए कहा कि उच्च शिक्षा मंत्री डॉ दिनेश शर्मा शिक्षा द्रोही हो गये है। उन्होंने कहा कि शिक्षा माफिया, प्रबंधकों एवम बड़े संचालकों के दबाव में मंत्री महोदय अनुदानित महाविद्यालयों में संचालित स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमो को बंद करने का कुचक्र रच रहे हैं, उन्हें न तो इन पाठ्यक्रमों में शिक्षण कार्य कर रहे शिक्षकों के हित से कोई सरोकार है और न ही माननीय उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के आदेशों का।

माननीय उच्च न्यायालय द्वारा इन पाठ्यक्रमो में शिक्षण कार्य करने वाले प्राध्यापकों को न्यूनतम वेतन देने का आदेश कई बार दिया जा चुका है जिसके संदर्भ में अवमानना वाद योजित है इसमें भी माननीय मंत्री और उनके मंत्रालय द्वारा न्यायालय एवम शिक्षकों को गलत शपथ पत्रों द्वारा गुमराह किया जा रहा है। उनकी नजर में प्रबंधन का हित प्रमुख है , प्रबंधन के दबाव में मान्यता का मानक बदल सकते हैं, प्राचार्य की योग्यता कम कर सकते हैं सालोसाल बिना अध्यापक, बिना प्राचार्य चलने वाले धनिकों की संस्थाओं पर कार्यवाही का साहस नही जुटा पाते, शिक्षक उनकी नजर में कामचोर लगता है।

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महाविद्यालय को बाजार की वस्तु बना के छोड़ दिया

ऐसे समय मे जबकि पूरी दुनियां कोरोना महामारी के चपेट में है, हर मंत्री अपने विभाग के लोगों के संरक्षक के रूप में काम कर रहा है और उनके हितों का यथासंभव संरक्षण और संवर्धन करने के लिए प्रयासरत है। ऐसे में उच्च शिक्षा मंत्री द्वारा लाया गया 13 मार्च 2020 का शासनादेश जिसमे महाविद्यालय को बाजार की वस्तु बना के छोड़ दिया है। हर शिक्षक को, श्रमिक की तरह मंडी में खड़ा होना होगा बाजार में जिसकी जितनी मांग होगी उसे उतनी मजदूरी का भुगतान किया जाएगा।

एक ही महाविद्यालय में पढ़ानेवाले समान योग्यताधारी शिक्षक अलग अलग वेतन पाएंगे। मान्यता और डिग्री के नाम पर पैसा सरकार को दिया जाएगा, शिक्षक वेतन के लिए प्रबंधन के सम्मुख गिड़गिड़ायेगा। आज इस शासनादेश के माध्यम से शिक्षकों में फुट डालने की तैयारी हुई है कल इस प्रकार के सभी पाठ्यक्रमो को बंद कर दिया जायेगा।

शिक्षा मंत्री को अपने शिक्षकों पर विश्वास नही, बड़ी कम्पनियों के मशीनों पर ज्यादा भरोसा है, मंत्री को शायद याद नही कि व्यवस्था की सुदृढ़ता के लिए ईमानदारी और साफ नीयत की जरूरत होती है, उनकी स्मृति पटल से उनके ही नेता कल्याण सिंह विस्मृत हो गए हैं जिन्होंने सिर्फ नीयत बदल कर उत्तर प्रदेश की परीक्षा प्रणाली को इतना शुचितापूर्ण बना दिया था जिसकी आज भी नजीर दी जाती है।

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कंपनियों के साथ गठजोड़ का अवसर दिखता है

पूरे सत्र भर शिक्षा व्यवस्था से वास्ता न रखने वाला हमारा मंत्री अचानक परीक्षाओ के समय, बड़ी कम्पनियो के दबाव में सी सी टीवी कैमरा लगवाने लगता है, दुनिया ज्यों ही कोरोना से प्रभावित होती है उन्हें इसमें भी कंपनियों के साथ गठजोड़ का अवसर दिखता है, अपने प्रदेश की गरीबी, आर्थिक स्थिति की ओर से आंख मूंद, मंत्री ऑनलाइन पढ़ाई और ऑनलाइन परीक्षा का छल करने लगता है।

ये एक षडयंत्र है भारत की पुरातन शिक्षा प्रणाली पर और प्रयास है पूँजीवादी शिक्षा प्रणाली थोपने की। जिसमे शिक्षा , माफियाओ और पूंजीपतियों के नियंत्रण में होगी। शिक्षक, गुलामो की भांति उनकी चरण बन्दना करने को अभिशप्त होगा और प्रदेश के 95 प्रतिशत विद्यार्थी उच्च शिक्षा से बंचित हो जाएंगे।

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अपनी प्रेस विज्ञप्ति में डॉ तिवारी ने बताया है कि संघ, मंत्री के इस कुत्शित षडयंत्र की भर्त्सना करता है तथा 13 मार्च 2020 के भेदकारी, शोषणकारी शासनादेश को निरस्त करने , इन पाठ्यक्रमो में कार्यरत शिक्षकों को न्यूनतम वेतन प्रदान करने, तथा कोरोना आपदा सहायता के रूप में तत्काल कम से कम तीन महीने का वेतन सरकार द्वारा प्रदान करने की पुरजोर मांग करता है।

संघ की यह भी अपेक्षा है कि मंत्री महोदय हवा हवाई घोषणाओं की जगह प्रदेश की वास्तविकता पर नजर डालें उन्हें यह समझना होगा कि प्रदेश में अभी ऑनलाइन पढ़ाई, और परीक्षा, प्रदेश की सच्चाई से मेल नही खाती और शिक्षकों के शरीर से निचोड़े हुए लहू से ज्ञान दीप को नही जलाया जा सकता है ।

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