कारसेवकों पर हुई फायरिंग के वह लम्हे

2 नवंबर,1990। अयोध्या के इतिहास में यह दिन निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलाकर उनकी हत्या करने के लिए याद किया जाता है। इस दिन अयोध्या की सड़कों, मन्दिरों और छावनियों में उन कारसेवकों के खून की बूंदे गिरी थीं जिन्हें अर्धसैनिक बलों ने गोली मारी थी।

राजेंद्र कुमार

लखनऊ: 2 नवंबर,1990। अयोध्या के इतिहास में यह दिन निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलाकर उनकी हत्या करने के लिए याद किया जाता है। इस दिन अयोध्या की सड़कों, मन्दिरों और छावनियों में उन कारसेवकों के खून की बूंदे गिरी थीं जिन्हें अर्धसैनिक बलों ने गोली मारी थी। इनमें अयोध्या के निवासी और अन्य राज्यों से आये कारसेवक भी थे। उन पर उस वक्त वरिष्ठ अफसरों के मौखिक निर्देश पर अर्धसैनिक बलों ने फायरिंग की जब हजारों कारसेवकों के साथ वो हनुमान गढ़ी के पास पुलिस सुरक्षा चौकी के समीप सड़क पर बैठे हुए रामधुन गा रहे थे। बाद में फायरिंग के निर्देश को डीएम फ़ैजाबाद ने लिखित आदेश में बदला था।

आज इस घटना के बारे में सोचता हूँ तो लगता है कि 30 अक्टूबर 1990 को कारसेवकों के पुलिस बन्दोबस्त को ध्वस्त कर राममंदिर के गुंबद तक पहुचने की घटना से फैजाबाद-अयोध्या के आला अफसर तिलमिला गए थे। ऐसे में 2 नवंबर की सुबह जब नौ बजे ही जब कारसेवक सड़क पर इस तरह से सत्याग्रह करने लगे तो प्रशासनिक अफसरों को नागवार लगा। प्रशासन ने रामजन्म परिसर से एक किलोमीटर दूर तक का क्षेत्र सील किया हुआ था।

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हनुमानगढ़ी के पास पुलिस सुरक्षा चौकी बनायी गई थी, ताकि कारसेवक विवादित धर्मस्थल की तरफ जाने का प्रयास ना करें। लेकिन जब इसी चौकी के पास सरयू से स्नान कर आये हजारों कारसेवकों सड़क पर सत्याग्रह करने लगे। अपने अफसरों की ताकत का अहसास कराने के लिए करीब दस बजे के आसपास सुरक्षाबलों ने इन्हें (कारसेवकों) खदेड़ने की कोशिश की तो कारसेवक सड़क पर बैठ गए। आधे घंटे तक चले इस सिलसिले को तोड़ने के लिए आईजी जोन ने एसएसपी सुभाष जोशी को कहा कि वह सड़क पर बैठे कारसेवकों को वहां से हटायें। मीडियाकर्मियों के सामने दिए गए इस निर्देश को सुनने ही हम सब भी पुलिस के सामने से हट कर एक मकान की छत पर चले गए। जहां से हमें नीचे का नजारा दिख रहा था।

इसके बाद ही पुलिस और सीआरपीएफ के जवानों ने आँसूगैस और लाठीचार्ज कर कारसेवकों को भगाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। कारसेवक सड़क पर दीवार बनाकर खड़े सुरक्षाकर्मियों धकियाते हुए आगे बढ़ने का प्रयास करने लगे, जैसा उन्होंने रामजन्म भूमि मंदिर तक पहुंचने के लिए 30 अक्टूबर को किया था। इस प्रयास को विफल करने के लिए बिना किसी चेतावनी के अर्ध सैनिक बलों ने लाठीचार्ज करते हुए कारसेवकों पर गोलियां चलानी शुरू करा दी। देखते ही देखते हनुमान गढ़ी चौराहे के समीप समूचा तुलसी चौराहा पर कई घायल कारसेवक दर्द से तड़पते हुए दिखे पड़े। रामबाग में भी घायल कारसेवक जमीन पर पड़े दिखे।

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लाल कोठी के समीप कोठारी बंधू शरद और रामकुमार कोठारी भी सुरक्षाबलों की गोली का निशाना बने। कोलकता से आये इन दोनों भाइयों ने 30 अक्टूबर को विवादित धर्मस्थल के गुंबद पर झंडा फहराया था। सड़क पर गिरे पड़े तमाम घायल कारसेवकों को उनके ही साथी उठाकर मणिराम छावनी ले गए जहां से उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया।

चंद मिनटों के इस गोलीकांड ने कारसेवकों की भीड़ को तो आन-फनान में हटा दिया, पर अयोध्या के इतिहास में एक काला दिन और दर्ज कर दिया। फायरिंग की इस घटना की कई अखबारों ने बढ़चढ़ कर रिपोर्टिंग ही थी। तब बजरंग दल के नेता रहे विनय कटियार ने दावा किया था कि अयोध्या में जलियावालां जैसा कांड आज हुआ है, कटियार ने फायरिंग में मारे गए 40 लोगों की एक सूची भी पत्रकारों को दी थी। इस घटना से आहत अयोध्यावासियों ने भी उसी शाम पुलिस के एक्शन का विरोध किया। यही नहीं 2 नवंबर की शाम अयोध्या के किसी भी मंदिर में शाम को आरती नही की गई और ना ही भगवान को भोग लगाया गया था।

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इस घटना के विरोध में उमा भारती ने तो अपने सर के बाल तक कटवा दिए थे। 4 नवंबर 1990 को शरद और रामकुमार कोठारी का सरयू के घाट पर अंतिम संस्कार किया गया था। उनके अंतिम संस्कार में अयोध्या और फ़ैजाबाद के हजारों लोग उमड़ पड़े थे। तब दोनों भाइयों के लिए अमर रहे के नारे गूंज थे। आज उन्हें तथा उनकी ही तरह 30 अक्टूबर 1990 और 2 नवंबर 1990 को भव्य राममंदिर निर्माण के लिए जान गंवाने वाले कारसेवकों की किसी को याद नहीं हैं। बीजेपी के वह बड़े नेता भी उन्हें भूल चुके हैं, जो उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए थे।