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गृह मंत्रालय के पास ‘चौरीचौरा कांड’ के शहीदों की जानकारी नहीं, ऐसे सच आया सामने

4 फरवरी 1922 के जिस चौरीचौरा कांड के चलते राष्ट्रपति महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था। जिस कांड में 23 पुलिस कर्मियों को क्रान्तिकारियों में थाने में फूंक दिया था। उस घटना को लेकर भारत सरकार के गृह मंत्रालय के पास कोई जानकारी नहीं है।

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NewstrackBy Newstrack

Published on 28 Dec 2020 4:09 AM GMT

गृह मंत्रालय के पास ‘चौरीचौरा कांड’ के शहीदों की जानकारी नहीं, ऐसे सच आया सामने
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मंत्रालय के पास ‘चौराचौरा कांड’ के शहीदों की जानकारी नहीं
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गोरखपुर: 4 फरवरी 1922 के जिस चौरीचौरा कांड के चलते राष्ट्रपति महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था। जिस कांड में 23 पुलिस कर्मियों को क्रान्तिकारियों में थाने में फूंक दिया था। उस घटना को लेकर भारत सरकार के गृह मंत्रालय के पास कोई जानकारी नहीं है। आरटीआई कार्यकर्ता कालीशंकर के सवाल पर गृह मंत्रालय की तरफ से जवाब मिला है कि उनके वहां कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।

आरटीआई कार्यकर्ता ने भारत सरकार के गृह मंत्रालय से सूचना के अधिकार के तहत 1922 में चौरीचौरा कांड से संबन्धित प्रमाणित दस्तावेज की जानकारी मांगी थी। इसके अलावा आंदोलन के कुल कितने लोगों की फांसी हुई थी, उनके नाम, पता का भी ब्यौरा मांगा था। जानकारी मांगी गई थी कि इस कांड में कितने लोगों को आजीवन सजा व काला पानी की सजा हुई। उनका भी नाम व पता, कांड में फंसी की सजा मिले कितने लोगों को शहीद का दर्जा दिए जाने के बाबत भी सवाल पूछे गए थे।

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भारत सरकार के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी मीनू बत्रा ने कहा है यदि इस उत्तर सूचना से संतुष्ट नहीं है, तो सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के प्राविधानों के अनुसार उत्तर प्राप्त होने के 30 दिन के भीतर अपील प्राधिकारी मनीष तिवारी, संयुक्त सचिव (एफएफआर) गृह मंत्रालय के पास अपील कर सकते है। आरटीआई कार्यकर्ता कालीशंकर का कहना है कि शहीदों के परिवारों को उचित सम्मान दिलाने व अपनी इस मातृभूमि को राष्ट्रीय स्तर पर विकास मॉडल के रूप में स्थान दिलाने के लिए संकल्पित है। इसी उद्देश्य के तहत सूचना मांगी थी। लेकिन भारत सरकार के गृह मंत्रालय के पास चौरीचौरा कांड से सम्बंधित कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। वह पूरी जानकारी के लिए अपील करेंगे।-

आरटीआई कार्यकर्ता कालीशंकर

क्रान्तिकारियों ने थाने में फूंक दिया था 23 पुलिसवालों को

थानेदार गुप्तेश्वर सिंह, उप निरिक्षक सशस्त्र पुलिस बल पृथ्वी पाल सिंह, हेड कांस्टेबल वशीर खां, कपिलदेव सिंह, लखई सिंह, रघुवीर सिंह, विषेशर राम यादव, मुहम्मद अली, हसन खां, गदाबख्श खां, जमा खां, मगरू चौबे, रामबली पाण्डेय, कपिल देव, इन्द्रासन सिंह, रामलखन सिंह, मर्दाना खां, जगदेव सिंह, जगई सिंह, और उस दिन वेतन लेने थाने पर आए चौकीदार बजीर, घिंसई,जथई व कतवारू राम की मौत हुई थी।

इन्हें दी गई थी फांसी

अब्दुल्ला, भगवान, विक्रम, दुदही, काली चरण, लाल मुहम्मद, लौटी, मादेव, मेघू अली, नजर अली, रघुवीर, रामलगन, रामरूप, रूदाली, सहदेव, सम्पत पुत्र मोहन, संपत, श्याम सुंदर व सीताराम को घटना के लिए दोषी मानते हुए फांसी दी गई थी

गांधी जी के वापस ले लिया था असहयोग आंदोलन

गोरखपुर जिला कांग्रेस कमेटी के उपसभापति प. दशरथ प्रसाद द्विवेदी ने घटना की सूचना गांधी जी को चिट्ठी लिखकर दी थी। इस घटना को हिंसक मानते हुए गांधी जी ने अपना असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया था।

पंडित मदनमोहन मालवीय ने 151 को बचाया था फांसी की सजा से

चौरीचौरा काण्ड के लिए पुलिस ने सैकड़ों लोगों को अभियुक्त बनाया। गोरखपुर सत्र न्यायालय के न्यायाधीश मिस्टर एचई होल्मस ने 9 जनवरी 1923 को 418 पेज के निर्णय में 172 अभियुक्तों को सजाए मौत का फैसला सुनाया। दो को दो साल की कारावास और 47 को संदेह के लाभ में दोषमुक्त कर दिया। इस फैसले के खिलाफ जिला कांग्रेस कमेटी गोरखपुर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अभियुक्तों की तरफ से अपील दाखिल की जिसका क्रमांक 51 सन 1923 था। इस अपील की पैरवी पं. मदन मोहन मालवीय ने की।

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मुख्य न्यायाधीश सर ग्रिमउड पीयर्स तथा न्यायमूर्ति पीगट ने सुनवाई शुरू की। 30 अप्रैल 1923 को फैसला आया जिसके तहत 19 अभियुक्तों को मृत्यु दण्ड, 16 को काला पानी, इसके अलावा बचे लोगों को आठ, पांच व दो साल की सजा दी गई। तीन को दंगा भड़काने के लिए दो साल की सजा तथा 38 को छोड़ दिया गया।

गोरखपुर से पूर्णिमा श्रीवास्तव

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