तो नौकरशाही का ये घिनौता चेहरा है सोनभद्र नरसंहार के पीछे

सोनभद्र के उम्भा गांव की कहानी सिर्फ जमीन पर कब्जे की नहीं है। यह कहानी प्रदेश भर में सरकारी जमीन को हथियाने का काम करने वाले तमाम गिरोहों के ‘सोनभद्र के कारनामे’ की कलई खोलती है।

सुनील तिवारी

सोनभद्र: सोनभद्र के उम्भा गांव की कहानी सिर्फ जमीन पर कब्जे की नहीं है। यह कहानी प्रदेश भर में सरकारी जमीन को हथियाने का काम करने वाले तमाम गिरोहों के ‘सोनभद्र के कारनामे’ की कलई खोलती है।

उम्भा गांव के जिस सौ बीघा जमीन पर सपही गांव के प्रधान यज्ञदत्त गुज्जर और उनके गुर्गों ने दस गोंड आदिवासियों को मौत के मुंह में सुला दिया।

यूपी की नौकरशाही से है पुराना कनेक्शन

वह जमीन नौकरशाही के उस कारनामे को बयान करती है जिसमें सरकारी दस्तावेजों को खुर्द बुर्द करके राजस्व महकमे के मार्फत सरकारी जमीन पर अपना नाम दर्ज कराने के मामले सूबे में पसरे पड़े हैं।

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उम्भा गांव की जमीन मूलतः बड़हर राजा की रियासत की थी। जमींदारी खत्म होते ही यह जमीन राजस्व अभिलेखों में बतौर बंजर दर्ज हो गई।

वर्ष 1952 में बिहार के आईएएस अफसर रहे प्रभात कुमार मिश्र और भानुप्रताप शर्मा ने आदर्श कोआपरेटिव सोसाइटी आफ उम्भा खोली और इस जमीन को राजस्व दस्तावेजों में इस सोसायटी के नाम दर्ज करा लिया।

बड़हर राजा की यह जमीन 600 बीघा जमीन का एक हिस्सा है। गोंड आदिवासी पुश्तैनी रूप से इस जमीन को जोतते आ रहे हैं।

धोखे से हड़प ली ग्रामीणों की जमीन

प्रभात कुमार मिश्र और भानुप्रताप शर्मा ने जब इस जमीन को अपनी सोसायटी के नाम दर्ज कराया तब गांव वासियों को यह धोखा दिया कि आप सभी इस सोसाइटी के सदस्य हैं और इस जमीन पर खेती आप ही करते रहेंगे।

गांववालों की मानें तो 2017 तक उनसे सोसाइटी के नाम पर पैसा लिया जाता रहा। हालांकि उन्हें सदस्य होने का कोई दस्तावेज कभी नहीं दिया गया।

इस जमीन विवाद को लेकर हुए खूनी संघर्ष के पीछे भदोही स्टेशन सुपरिंटेंडेंट कोमल सिंह मास्टर माइंड माना जा रहा है। वह रेलवे में नौकरी करने के साथ जमीन खरीदने बेचने का धंधा भी करता था। कोमल सिंह गिरोह के सदस्य लखनऊ में भी मंत्रियों के नाम पर धोखाधड़ी करने के मामले में जेल जा चुके हैं।

 

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पीड़ित पक्ष के वकील नित्यानंद द्विवेदी कहते हैं कि सरकार की जमीन अवैधानिक तरीके से 1955 में आदर्श कोआपरेटिव सोसाइटी के नाम तत्कालीन तहसीलदार राबर्ट्सगंज के आदेश से ट्रांसफर कर दी गई।

जबकि इस जमीन को ट्रांसफर करने का अधिकार तहसीलदार के पास था ही नहीं, यह अधिकार तहसीलदारों को उत्तर प्रदेश में 1960 में मिला है।

 

जमीन 1955 से 1989 तक सोसाइटी के नाम रही। 1989 में सोसाइटी के मंत्री और मैनेजर आरएस राव विनीता शर्मा ने सोसाइटी के नाम मुकदमा दर्ज कर इस जमीन जो कि 144-145 बीघा जमीन थी को अपने नाम दर्ज करा लिया।

यह आदेश अवैध था। क्योंकि सोसाइटी की कोई भी जमीन सोसाइटी के प्रबंधक व मैनेजर के नाम ट्रांसफर ही नहीं की जा सकती है।

तहसीलदार के आदेश को किया गया नजरअदांज

इस मामले में तहसीलदार ने अपने आदेश में साफ लिखा था कि सोसाइटी की जमीन को किसी के नाम ट्रांसफर करना अवैध होगा क्योंकि यह 33/39 एक्ट का मामला नहीं है, बावजूद इसके एसडीएम राबर्ट्सगंज ने खतौनी में आशा मिश्रा और विनीता शर्मा का नाम दर्ज करने के आदेश दे दिये।

एडवोकेट द्विवेदी के मुताबिक इस जमीन को बेचने विनीता शर्मा के पिता विनीता शर्मा की पावर आफ अटार्नी लेकर आए, विनीता शर्मा नहीं आईं।

नियम के मुताबिक जिस राज्य में खरीद बिक्री करनी होती है उसी राज्य की पावर आफ अटार्नी होनी चाहिए, लेकिन विनीता शर्मा के पिता दिल्ली की पावर आफ अटार्नी लेकर आए थे।

यहां भी म्यूटेशन में एआरओ ओबरा ने गड़बड़ी की। एडवोकेट द्विवेदी कहते हैं कि यहां भी जिलाधिकारी ने उनकी आपत्ति को खारिज कर दिया।

 

6 तारीख को आपत्ति खारिज की 16 को हमें कापी मिली। हम कमिश्नर के यहां अपील करते उससे पहले यह हत्याकांड हो गया। यज्ञदत्त गुज्जर का परिवार राजस्थान के किसी इलाके से 60 के दशक में यहां आ बसा है।

 

 

 

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