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इस गांव में लोग ना पीते शराब,ना खाते हैं मांसाहार, मुगल काल से चला आ रहा रिवाज

 विश्व प्रसिद्ध नगर देवबंद से आठ किलोमीटर दूर मिरगपुर एक ऐसा अनूठा गांव है, जो अपने विशेष रहन सहन और सात्विक खानपान के लिए जाना जाता है। इस गांव में ना तो कोई शराबी है और ना ही कोई नॉनवेज खाता है। यहां तक कि लोग प्याज और लहसून तक भी नहीं छूते।

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sumanBy suman

Published on 21 Feb 2020 3:11 AM GMT

इस गांव में लोग ना पीते शराब,ना खाते हैं मांसाहार, मुगल काल से चला आ रहा रिवाज
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लखनऊ : विश्व प्रसिद्ध नगर देवबंद से आठ किलोमीटर दूर मिरगपुर एक ऐसा अनूठा गांव है, जो अपने विशेष रहन सहन और सात्विक खानपान के लिए जाना जाता है। इस गांव में ना तो कोई शराबी है और ना ही कोई नॉनवेज खाता है। यहां तक कि लोग प्याज और लहसून तक भी नहीं छूते। गांव के लोग बाहर जाकर भी इन चीजों को नहीं खाते। शराब, पान, बीड़ी, सिगरेट, सिगार, हुक्का, गुटखा, गांजा, अफीम और भांग खाने वाला भी कोई नहीं मिलेगा। यह परंपरा मुगलकाल से चली आ रही है।

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काफी बड़ा है गांव

शासकीय मानकों के अनुसार, गांव मिरगपुर विकास खंड देवबंद का आदर्श गांव है।गांव की आबादी करीब दस हजार है। यह विशिष्ट गांव खुद में देश की संस्कृति के साथ साथ अनेकों खुबियां समेटे हुए हैं। गांव में 90 फीसदी आबादी हिंदुओं की है। अन्य धर्मों के लोग भी उन्हीं की तरह खान-पान रखते हैं।गांव में गन्ने की खूब फसल होती है। खेती और ग्रामीणों की मेहनत और सात्विकता के बूते ही गांव में समृद्धि दिखाई देती है।

क्यों है ऐसी जीवन-शैली

यहां के निवासियों के मुताबिक, मुगल शासक नुरुद्दीन मोहम्मद जहांगीर के समय यहां बाबा फकीरादास आए थे।उन्होंने लोगों को मांसाहार और नशे से दूर रहने को कहा था। पूरे गांव ने श्रद्धापूर्वक बाबा की शर्त को स्वीकार करते हुए प्रतिज्ञा ली थी।गांव के बाहर काली नदी के किनारे पर बाबा फकीरादास की समाधि बनी है।यहां उनकी याद में हर साल महाशिवरात्रि से पहले मेला आयोजित किया जाता है।इस मेले में स्थानीय लोगों के अलावा हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड एवं दूसरे राज्यों से हजारों भक्त आते हैं। बाबा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

मेहमानों का स्वागत गांववासी देसी घी के हलवे और शुद्ध मावे से बने पेड़ों से करते हैं।इस दिन गांववासियों के सभी सगे संबंधी भी पहुंचते हैं।मिरगपुर गांव आज भी भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत है और देश में अनूठी मिसाल कायम किए है।

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क्या कहते हैं

जो लोग इस परंपरा का उलंघन करते हैं, उन्हें गुरु स्वयं ही सजा देते हैं।हरियाणा और उत्तराखंड और राजस्थान से भी लोग बाबा के दरबार में आते हैं।शुक्रवार को यहां मेला लगा था। श्रद्धालुओं ने बाबा फकीरादास की सिद्धकुटी पर पहुंचकर मत्था टेका और मन्नत मांगी।

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