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जयपुर:प्री-मानसून या उत्तर पूर्व मानसून दक्षिणी भारत के ज्यादातर हिस्से में भारी वर्षा और तूफानों के लिए जिम्मेदार है। लेकिन मौसम वैज्ञानिक इस मानसून की निश्चित तारीखों का पता नहीं लगा पाए हैं। आमतौर पर इस शीत मानसून का समय अक्तूबर से दिसंबर तक माना जाता है। लेकिन अब फ्लोरिडा विश्वविद्यालय के अध्ययन में इस मानसून की तिथि निर्धारित करने का तरीका बताया गया है। इस अध्ययन को भारतीय मानसून के संबंध में अबतक अपनाई जा रही परिभाषाएं और नीतियों को पलटने वाला माना जा रहा है। असल में फ्लोरिडा राज्य विश्वविद्यालय में मौसम वैज्ञानिक प्रो. वासु मिश्रा ने अपने अध्ययन में पाया है कि उत्तर पूर्व मानसून के आने पर दक्षिणी प्रायद्वीप की सतह का तापमान बदल जाता है। तापमान के बदलाव के अध्ययन के आधार पर इन मानसून की दस्तक का सही पता लगाया जा सकता है। यह अध्ययन मासिक पत्रिका वेदर रिव्यू में प्रकाशित हुआ है।अध्ययन में प्रो. वासु मिश्रा ने सतह के तापमान के अध्ययन किया। इससे उन्होंने उत्तर पूर्व मानसून की शुरुआत-समाप्ति की तारीखों की पहचान क्रमश: 6 नवंबर और 13 मार्च के रूप की है। साथ ही वह मानते हैं कि उत्तर पूर्व मानसून के संबंध में चली आ रही परिभाषाएं दक्षिणी प्रायद्वीप की सतह के तापमान और मानसून अवधि में होने वाले बदलावों को नजरअंदाज करता है।
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माना जा रहा है कि यह शोध लाखों दक्षिण भारतीयों के स्वास्थ्य और रोजगार को प्रभावित होने से बचाने में मददगार साबित हो सकता है। शोधकर्ता प्रो. वासु मिश्रा ने अध्ययन में पाया है कि शिशु और वयस्क मृत्यु दर, श्वसन संबंधी बीमारियों के अलावा कृषि, विशेषकर चावल की खेती जमीनी सतह के तापमान के प्रति संवेदनशील होते हैं। इस कारण भी मानसून ज्ञात करने की नई विधि लोगों के लिए इन खतरों से बचाने में कारगर हो सकती है।
शीतकालीन मानसून को उत्तर पूर्व मानसून कहा जाता है। इसे लौटते मानसून या रिटर्निंग मानसून के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि सर्दियों के दौरान उत्तर पूर्व मानसूनी हवाएं हिमालय से टकराने के बाद समुद्र की ओर लौटती हैं। यह मानसून भारत के दक्षिण प्रायद्वीप में वर्षा का मुख्य स्त्रोत है। इससे तटीय आंध्र प्रदेश, रायलसीमा और तमिलनाडु-पांडिचेरी के पूर्वी उपखंडों में विशेष रूप से वर्षा होती है। तमिलनाडु राज्य में यह मानसून वार्षिक वर्षा का लगभग 48 फीसदी योगदान करता है।