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पाकिस्तानी सेना की आर्मी चीफ बनना चाहती है दुरखाने बानुरी

raghvendra

raghvendraBy raghvendra

Published on 19 Jan 2018 9:43 AM GMT

पाकिस्तानी सेना की आर्मी चीफ बनना चाहती है दुरखाने बानुरी
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पाकिस्तान में लड़कियों के लिए जो सपना कभी असंभव सा दिखता था, वह धीरे धीरे संभव हो रहा है। सेना में जाने का उनका सपना साकार हो रहा है और अब वहां लड़कियों के लिए कैडेट कॉलेज खोला गया है। मर्दान के गल्र्स कैडेट कॉलेज में पढऩे वाली 13 साल की दुरखाने बानुरी की आखों में एक बड़ा सपना पल रहा है। वह पाकिस्तान की पहली महिला सेना प्रमुख बनना चाहती है। वह कहती है, ‘जब एक महिला प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री और स्टेट बैंक की गवर्नर बन सकती हैं, तो फिर सेना प्रमुख क्यों नहीं।’

इस्लामाबाद से 110 किलोमीटर दूर मर्दान के इस कॉलेज में बानुरी जैसी 70 लड़कियां पढ़ती हैं। यह पाकिस्तान में अपनी तरह का पहला कॉलेज हैं जहां लड़कियों को सेना में जाने के लिए तैयार किया जाता है। पाकिस्तानी सेना में महिलाओं की भागादारी बढ़ाने की दिशा में इसे अहम कोशिश माना जा रहा है। अब से पहले पाकिस्तान में सिर्फ लडक़ों के कैडेट कॉलेज रहे हैं, जहां पढऩे वालों को सेना की नौकरियों में प्राथमिकता दी जाती है। पाकिस्तान में सेना में जाने का मतलब है कि भविष्य सुरक्षित होना। कैडेट कॉलेजों में पढऩे वालों को बेहतरीन ट्रेनिंग मिलती हैं। उन्हें अच्छे से अच्छे संसाधन मुहैया कराए जाते हैं।

देश भर में ऐसे कैडेट कॉलेजों में सैकड़ों लडक़े पढ़ते हैं लेकिन लड़कियों को वहां पढऩे की अनुमति नहीं है। ऐसे में मर्दान में बना विशेष कॉलेज अपवाद दिखता है। रिटायर्ड ब्रिगेडियर नूरीन सत्ती का कहना है, ‘ऐसे कॉलेज लड़कियों को सशस्त्र सेनाओं, विदेश सेवा और सिविल सर्विस का हिस्सा या फिर डॉक्टर इंजीनियर बनने में मदद करेंगे।’

खाकी वर्दी और सिर पर लाल टोपी के साथ दुरखाने और उसकी क्लासमेट परेड ग्राउंड में मार्च करती हैं, इंस्ट्रक्टर के निर्देश पर कदमताल करती हैं। साथ वे फिजीकल ट्रेनिंग और मार्शल आर्ट ट्रेनिंग में हिस्सा लेती हैं। सेना में जाना है तो कड़ा अनुशासन और शारीरिक रूप से चुस्त दुरुस्त रहना ही होगा। पाकिस्तान में सेना को सबसे ताकतवर संस्थान के रूप में देखा जाता है। देश के 70 साल के इतिहास में आधे समय तक सेना ने ही देश पर राज किया है। माना जाता है कि देश में चुनी हुई सरकार रहने पर भी रक्षा और विदेश नीति सेना ही तय करती है।

सेना में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है। जो भी महिलाएं सेना में रहती हैं, उनकी जिम्मेदारी प्रशासनिक कार्यों तक सीमित रही है। लेकिन 2003 में सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ ने महिलाओं के लिए सेना, नौसेना और वायुसेना की युद्धक शाखाओं के दरवाजे खोल दिए। पाकिस्तानी सेना ने कभी नहीं बताया कि उसके यहां कितनी महिलाएं काम करती हैं। एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया कि लगभग सात लाख सैनिकों वाली पाकिस्तानी सेना में लगभग चार हजार महिलाएं हैं।

आयशा फारूक 2013 में पाकिस्तान की पहली महिला फाइटर पायलट बनीं। आयशा उन महिलाओं में से हैं जिन्होंने बीते 10 साल में वायुसेना में ट्रेनिंग ली, लेकिन लड़ाकू विमान उड़ाने वाली वह पहली हैं। हाल के सालों में पाकिस्तानी वायुसेना में शामिल होने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ी है।

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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