श्रीलंका में तूल पकड़ता जा रहा है बौद्ध बनाम मुस्लिमों का मुद्दा

Published by raghvendra Published: March 9, 2018 | 2:08 pm
Modified: March 9, 2018 | 2:11 pm

दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा द्वीप देश श्रीलंका हमेशा से चर्चा में रहा है। 2009 में चरमपंथी संगठन एलटीटीई के खात्मे के बाद लगने लगा था कि इस देश में पूरी तरह शांति स्थापित हो जाएगी लेकिन अब यहां बौद्ध बनाम मुस्लिमों का मुद्दा तूल पकड़ता जा रहा है। श्रीलंका में बौद्धों और मुस्लिमों के बीच हालिया तनाव कैंडी शहर से उपजा है।

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इसकी वजह एक ट्रैफिक सिग्नल से शुरू हुई थी। कहा जा रहा है कि कुछ सप्ताह पहले कुछ मुस्लिमों ने एक बौद्ध सिंहली व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। इसकी प्रतिक्रिया में 5 मार्च को को सिंहल बौद्धों ने मुस्लिमों की दुकानों को जला दिया और मंगलवार को एक मुस्लिम युवक की जली हुई लाश पाई गई थी। वैसे, श्रीलंका में बौद्ध बनाम मुस्लिम हिंसा पहली बार नहीं हुई है।

इसकी शुरुआत 2012 से हुई थी। श्रीलंका में मुस्लिम केवल मुस्लिम नहीं हैं, वे तमिल बोलने वाले मुस्लिम हैं और तमिलों का सिंहलियों से विवाद जगजाहिर है। 2.1 करोड़ की जनसंख्या वाले श्रीलंका में 70 फीसदी से अधिक सिंहला, 12 फीसदी तमिल हिंदू और तकरीबन 10 फीसदी मुस्लिम हैं। रोहिंग्या मुसलमानों की श्रीलंका में मौजूदगी भी विवादों की वजह बनता रहा है। कुछ बौद्ध राष्ट्रवादी उनको शरण देने पर अपना विरोध जताते रहे हैं।

मुस्लिमों के खिलाफ नफरत का कारण रोहिंग्या है यह अभी तक साफ नहीं है। श्रीलंका में सिंहली बौद्धों का एक बड़ा वर्ग है, जो गैर-सिंहली मूल के लोगों और मुस्लिमों को अपने लिए खतरे के तौर पर देखता है। 2014 में भी श्रीलंका में बड़े पैमाने पर दंगे हुए थे। एक अनुमान के मुताबिक उस हिंसा में 8,000 मुस्लिम और 2,000 सिंहलियों को विस्थापित होना पड़ा था।

श्रीलंका में कट्टर बौद्ध संगठन बोदु बाला सेना को भी ऐसी हिंसा के लिए जिम्मेदार माना जाता है। इस संगठन के जनरल सेक्रटरी गालागोदा ऐथे गनानसारा अकसर कहते रहे हैं कि मुस्लिमों की बढ़ती आबादी देश के मूल सिंहली बौद्धों के लिए खतरा है। मुस्लिम समुदाय के लोगों की कारोबार में मजबूत स्थिति को भी बौद्धों का एक कट्टर तबका खतरे के तौर पर देखता रहा है।

बौद्ध कट्ट्ररपंथियों का कहना है कि मुसलमान जबरन हमारे लोगों का धर्म परिवर्तन करा रहे हैं और साथ ही हमारी ऐतिहासिक धरोहरों को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। लिट्टे चीफ वी. प्रभाकरण की मौत के साथ साल 2009 में ईलम युद्ध समाप्त हुआ था। इसके साथ माहिंदा राजपक्षे का उदय हुआ और बौद्धों व मुसलमानों के बीच तनाव बढऩे लगा। कुछ उग्रवादी बौद्ध संगठनों ने मुस्लिमों पर हमले करने भी शुरू कर दिए।

हालांकि जब संयुक्त विपक्ष ने जनवरी 2015 में राजपक्षे की सरकार गिराई तो उसके बाद ये हमले कम हो गए। नवनिर्वाचित सिरिसेना और विक्रमसिंघे की सरकार ने दोनों समुदायों को जोडक़र रखने की कोशिश की। नई सरकार ने लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्ष समाज के पुनर्निर्माण की कोशिश की लेकिन हिंसा की हालिया घटनाओं से यह साफ है कि उनकी कोशिशों का असर तीन साल के अंदर ही समाप्त हो रहा है।

भारत पर पड़ सकता है असर

श्रीलंका समस्या से भारत भी अछूता नहीं रह सकता। कुछ दूसरे देश इस मौके का फायदा उठाने की कोशिश कर सकते हैं। माना जा रहा है कि अगर जल्द हालात नहीं सुधरे तो भारत को शरणार्थियों की समस्या का भी सामना करना पड़ सकता है। म्यांमार से भाग कर बड़ी संख्या में रोहिंग्या शरणार्थी भारत में दाखिल हो चुके हैं।

अब ये सवाल उठ रहे हैं कि अगर श्रीलंका में भी हालात नहीं सुधरे तो क्या वहां के अल्पसंख्यक मुस्लिम भारत का रुख करेंगे। इसके अलावा चिंता इस बात की भी है कि कई दूसरे देश मदद के बहाने श्रीलंका के करीब आ सकते हैं और चीन, पाकिस्तान, सऊदी अरब जैसे देशों को मौका मिल सकता है।