क्या है IMAX? 35mm से 10 गुना बड़ी फिल्म क्यों? जाने IMAX का पूरा इतिहास

IMAX क्या है और इसकी 15/70 फिल्म 35mm से लगभग 10 गुना बड़ी क्यों होती है? जानिए 1967 के मॉन्ट्रियल एक्सपो से 2026 तक IMAX का पूरा इतिहास और तकनीक।

Update:2026-08-21 20:34 IST

इस तरह आईमैक्स ने एक दिलचस्प स्थिति बना ली। पुराने 15/70 फिल्म वाले आईमैक्स की विशालता और आधुनिक डिजिटल प्रक्षेपण की सुविधा, दोनों अलग-अलग तरह के थिएटरों में मौजूद हैं। आज आईमैक्स कोई एक ही तकनीक नहीं है, बल्कि कई तरह की प्रणालियों का परिवार है।

कुछ थिएटर 15/70 फिल्म दिखाते हैं। कुछ दो लेजर वाली 1.43:1 व्यवस्था इस्तेमाल करते हैं। कुछ एक लेजर या दूसरी डिजिटल 1.90 व्यवस्था पर चलते हैं। इसलिए गंभीर फिल्म प्रेमियों के लिए ‘आईमैक्स की टिकट’ खरीदने से पहले यह जानना महत्वपूर्ण होता है कि उस थिएटर में किस तरह का प्रोजेक्टर और किस आकार का पर्दा है।

आईमैक्स में आवाज इतनी अलग क्यों लगती है?

आईमैक्स का असर सिर्फ तस्वीर से नहीं आता। कंपनी शुरू से ही थिएटर की बनावट और आवाज की पूरी व्यवस्था को अपने अनुभव का हिस्सा मानती रही है। आईमैक्स थिएटर में स्पीकर केवल आवाज को ज्यादा तेज करने के लिए नहीं लगाए जाते। कोशिश यह होती है कि संवाद और दूसरी आवाजें पूरे थिएटर में लगभग एक जैसी साफ सुनाई दें। इसलिए आईमैक्स में विस्फोट का सिर्फ ‘जोर से’ सुनाई देना मकसद नहीं है। कोशिश यह होती है कि उसकी जगह और उसका असर भी महसूस हो। आईमैक्स अपने बड़े फिल्म फ्रेम, थिएटर की खास बनावट और बहुत सटीक आवाज व्यवस्था को एक ही अनुभव के हिस्से के रूप में देखता है।

आईमैक्स फिल्म इतनी महंगी क्यों होती है?

इसके पीछे एक सीधा भौतिक कारण है कि फिल्म बहुत ज्यादा महँगी होती है। हर फ्रेम 15 छेद वाली कतारों जितना लंबा होता है। फिल्म हर सेकंड 24 फ्रेम की रफ्तार से आगे बढ़ती है। लंबी फिल्म में इस्तेमाल होने वाली फिल्म की लंबाई कई लाख फीट तक पहुंच सकती है। इसके बाद मूल फिल्म को तैयार करने, उसकी प्रतियां बनाने, उन्हें एक जगह से दूसरी जगह भेजने और बहुत बड़े प्रोजेक्टर की देखभाल का खर्च अलग होता है। एक 15/70 फिल्म की प्रति का वजन सैकड़ों किलोग्राम तक हो सकता है। उसे चलाने के लिए इस्तेमाल होने वाली बड़ी गोल प्लेट भी बहुत विशाल होती है। इसी वजह से डिजिटल सिनेमा ने दुनिया भर में फिल्म प्रोजेक्टर का इस्तेमाल लगभग खत्म कर दिया। 15/70 आईमैक्स आज केवल चुनिंदा थिएटरों में बचा है। लेकिन इस पुराने तरीके की प्रतिष्ठा इतनी ज्यादा है कि कुछ निर्देशक आज भी इसे जिंदा रखे हुए हैं।

2023: ‘ओपेनहाइमर’ ने फिल्म वाले आईमैक्स को फिर चर्चा में ला दिया

‘ओपेनहाइमर’ की रिलीज के समय दुनिया भर के चुनिंदा 15/70 थिएटरों में टिकटों की भारी मांग ने दिखाया कि डिजिटल दौर में भी दर्शक असली फिल्म पर दिखाई जाने वाली फिल्म के लिए यात्रा करने को तैयार हैं। यह आईमैक्स के लिए केवल पुराने दौर की याद नहीं थी। इससे यह भी साबित हुआ कि असली फिल्म पर दिखाई जाने वाली बड़ी तस्वीर अपने आप में दर्शकों को खींचने वाला अनुभव बन सकती है। और इसका अगला बड़ा अध्याय 2026 में सामने आया।

2026: द ओडिसी और आईमैक्स इतिहास का नया अध्याय

क्रिस्टोफर नोलन की द ओडिसी, जो जुलाई 2026 में रिलीज हुई, पहली पूरी लंबाई वाली ऐसी फिल्म बनी जिसे पूरी तरह आईमैक्स फिल्म कैमरों पर शूट किया गया। आईमैक्स के अनुसार नोलन और छायाकार होयटे वैन होयटेमा ने करीब 21 लाख फीट आईमैक्स फिल्म पर शूटिंग की। यहां आईमैक्स के तकनीकी इतिहास ने लगभग पूरा चक्कर पूरा कर लिया। दशकों से आईमैक्स कैमरे की सबसे बड़ी दिक्कत उसका शोर था। नई कीग्ली आईमैक्स फिल्म कैमरा और आवाज को ढकने वाली खास पेटी तैयार की गई, जिससे बातचीत वाले दृश्यों को भी आवाज के साथ एक ही समय पर बड़े पैमाने पर शूट करना संभव हुआ। आईमैक्स ने इस नए कैमरे का नाम अपने दिवंगत गुणवत्ता विशेषज्ञ डेविड कीग्ली और पेट्रीसिया कीग्ली के सम्मान में रखा।

यानी 1970 में जिस तकनीक को मुख्य रूप से शानदार और बड़े दृश्य दिखाने वाली छोटी फिल्मों के लिए बनाया गया था, 2026 तक वही पूरी लंबाई की फिल्म के हर दृश्य, यहां तक कि बातचीत वाले दृश्यों को भी रिकॉर्ड करने की क्षमता तक पहुंच गई।

क्या आज आईमैक्स का मतलब फिर फिल्म ही है?

असलियत इसके उलट है। दुनिया के ज्यादातर आईमैक्स थिएटर डिजिटल हैं। 15/70 फिल्म दिखाने वाले थिएटर बहुत कम हैं। आज आईमैक्स की ताकत यह है कि उसने अपने नाम को तीन अलग-अलग स्तरों पर खड़ा कर दिया है। पहला है फिल्म बनाना, यानी फिल्म किस कैमरे या आईमैक्स से प्रमाणित व्यवस्था से शूट हुई।

दूसरा है फिल्म को तैयार करना, यानी उसे आईमैक्स पर्दे पर दिखाने के लिए किस तरह तैयार किया गया।

तीसरा है फिल्म दिखाना, यानी आखिर वह किस तरह के आईमैक्स थिएटर में दिखाई जा रही है।

इसीलिए ‘आईमैक्स के लिए बनाई गई’, ‘आईमैक्स फिल्म कैमरों से शूट की गई’, ‘लेजर वाला आईमैक्स’ और ‘आईमैक्स 70mm’ एक ही बात नहीं हैं।

आईमैक्स में कौन-सा अनुभव सबसे असली माना जाए?

अगर फिल्म वास्तव में 15/65 आईमैक्स फिल्म पर शूट हुई है और आपके पास उसकी 15/70 फिल्म की प्रति और 1.43:1 विशाल पर्दे वाला थिएटर उपलब्ध है, तो वह पुराने और मूल आईमैक्स अनुभव का सबसे सीधा रूप है। इसके बाद बहुत ऊंचे स्तर का अनुभव दो लेजर वाली 1.43:1 आईमैक्स व्यवस्था देती है, जो उसी बड़े पर्दे के आकार को डिजिटल तरीके से दिखा सकती है। इसके बाद एक लेजर और दूसरी 1.90 डिजिटल आईमैक्स व्यवस्थाएं आती हैं। इसका मतलब यह नहीं कि छोटा आईमैक्स खराब है। वह सामान्य थिएटर के मुकाबले बेहतर प्रक्षेपण, पर्दा और आवाज दे सकता है। लेकिन हर आईमैक्स एक जैसा नहीं होता। यही बात आईमैक्स की सफलता और उसके बारे में होने वाले भ्रम, दोनों की वजह है।

35mm और आईमैक्स का सबसे बड़ा अंतर

बहुत लोग आईमैक्स को सिर्फ तस्वीर की साफ़-सफाई की बहस बना देते हैं - 4K बनाम 8K बनाम 18K। यह तस्वीर का सिर्फ एक हिस्सा है। आईमैक्स का मूल विचार था कि इंसान की आंखों के सामने ऐसी तस्वीर लाई जाए जो उसके देखने के बड़े हिस्से को भर दे। इसके लिए बड़े फिल्म निगेटिव की जरूरत थी, ताकि बहुत बड़े पर्दे पर तस्वीर को फैलाने के बाद भी उसकी बारीकियां बनी रहें। इसके बाद पर्दे और थिएटर की बनावट ऐसी रखी गई कि दर्शक उसके काफी पास बैठ सके। फिर आवाज को इस तरह तैयार किया गया कि अनुभव सिर्फ सामने से आने वाली आवाज तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे थिएटर में महसूस हो।

यानी तकनीक का पूरा क्रम था: बड़ा फ्रेम → ज्यादा बारीकी → बहुत बड़ा पर्दा → आंखों के सामने बड़ा दृश्य क्षेत्र → गहरा अनुभव।

इसलिए ‘फिल्म का फ्रेम दस गुना बड़ा है’ अपने आप में अंतिम लक्ष्य नहीं था। वह सिर्फ एक साधन था। असली लक्ष्य था दर्शक को यह महसूस कराना कि वह पर्दे के बाहर नहीं, दृश्य के भीतर है।

क्या 1967 के उन प्रयोगकर्ताओं ने यही भविष्य सोचा था?

शायद उन्होंने क्रिस्टोफर नोलन या आज के मल्टीप्लेक्स आईमैक्स की कल्पना नहीं की होगी। लेकिन मूल सवाल वही था कि कई पर्दों और कई प्रोजेक्टर की जटिलता के बिना दर्शकों को विशाल और अपने भीतर खींच लेने वाली तस्वीर कैसे दिखाई जाए? 1967 के एक्सपो 67 में ग्रेम फर्ग्यूसन, रोमन क्रोइटर और उनके साथियों ने दर्शकों को तस्वीर के फ्रेम से बाहर निकालने का प्रयोग किया। रॉबर्ट केर ने उत्पादन और संगठन की नींव तैयार की। बिल शॉ ने वह इंजीनियरिंग विकसित की, जिससे फिल्म के एक बहुत बड़े फ्रेम और एक बड़े प्रोजेक्टर के जरिए यह काम संभव हो सका। इसलिए आईमैक्स का जन्म किसी कैमरा कंपनी की प्रयोगशाला में नहीं, बल्कि फिल्मकारों की असंतुष्टि से हुआ था। उन्हें सामान्य सिनेमा पर्याप्त बड़ा नहीं लगता था।

आईमैक्स ने सिनेमा की परिभाषा कैसे बदली?

पहला बदलाव यह था कि फिल्म का फ्रेम खुद थिएटर की बनावट तय कर सकता है। पारंपरिक सिनेमा में थिएटर पहले से मौजूद होता था और फिल्म उसमें दिखाई जाती थी। आईमैक्स में कैमरा, फिल्म, प्रोजेक्टर, पर्दा और दर्शकों की बैठने की जगह को एक ही व्यवस्था के रूप में सोचा गया। दूसरा बदलाव यह था कि दर्शक सिर्फ देखने वाला व्यक्ति नहीं रहता, बल्कि उसे ऐसा महसूस हो सकता है जैसे वह दृश्य का हिस्सा हो। विशाल फ्रेम उसकी आंखों के किनारों तक फैल जाता है और दृश्य को दूर से देखने के बजाय उसके भीतर होने जैसा एहसास देता है।

तीसरा बदलाव यह था कि आईमैक्स बड़े फिल्म प्रारूप को छोटी फिल्मों और वृत्तचित्रों की खासियत से निकालकर मुख्यधारा की फिल्मों तक ले आया। चौथा बदलाव यह था कि डिजिटल दौर में भी उसने असली फिल्म को एक खास और प्रतिष्ठित माध्यम के रूप में जिंदा रखा। और पांचवां बदलाव यह था कि उसने हॉलीवुड को यह समझाया कि खास सिनेमा अनुभव सिर्फ बेहतर सीट या महंगे टिकट का नाम नहीं है। फिल्म का प्रारूप खुद कहानी कहने का एक तरीका हो सकता है।

‘आईमैक्स क्या है?’ का सबसे सही जवाब क्या होगा?

आईमैक्स सिर्फ बड़ा पर्दा नहीं है। यह 1967 के मॉन्ट्रियल में शुरू हुआ एक विचार है - दर्शक को तस्वीर के सामने बैठा हुआ नहीं, बल्कि तस्वीर के भीतर मौजूद होने जैसा अनुभव कराया जाए। इसे संभव करने के लिए कनाडाई फिल्मकारों और इंजीनियरों ने फिल्म को सामान्य दिशा से 90 डिग्री घुमा दिया। 70mm फिल्म की पट्टी पर 15 छेद वाली कतारों जितना बड़ा फ्रेम बनाया गया। ऐसा प्रोजेक्टर बनाया गया जो उस भारी फिल्म को स्थिरता के साथ चला सके। पर्दे को दर्शक की आंखों के किनारों तक फैलाया गया और आवाज तथा थिएटर की बनावट को भी उसी अनुभव के हिसाब से तैयार किया गया। इसीलिए 15/70 आईमैक्स फ्रेम का तस्वीर वाला हिस्सा पारंपरिक 35mm फ्रेम से करीब दस गुना बड़ा हो सकता है।

1967 के एक्सपो 67 में कई पर्दों के सामने खड़े दर्शकों से शुरू हुई यह यात्रा 1970 की टाइगर चाइल्ड, 1971 के सिने-स्फीयर, नासा की वृत्तचित्र फिल्मों, आईमैक्स 3डी, हॉलीवुड की डिजिटल फिल्म रूपांतरण तकनीक, डिजिटल प्रक्षेपण, लेजर आईमैक्स, क्रिस्टोफर नोलन और आखिरकार 2026 में पूरी तरह आईमैक्स फिल्म कैमरों पर शूट हुई द ओडिसी तक पहुंच चुकी है। और शायद आईमैक्स के इतिहास की सबसे खूबसूरत बात यही है, करीब छह दशक बाद भी उसका मूल सवाल नहीं बदला है। पर्दा कितना बड़ा हो सकता है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वह कब दर्शक को पर्दा लगना बंद कर देता है।

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