CAG Report: 28 राज्यों पर 90 लाख करोड़ का कर्ज, CAG की रिपोर्ट में खुला देश की कंगाली का पूरा सच
India Debt Crisis 2026: के. संजय मूर्ति द्वारा जारी CAG की 'राज्य वित्त रिपोर्ट' ने उड़ाई नींद! देश के 28 राज्यों पर कुल कर्ज 90.51 लाख करोड़ के पार। जानें घाटे और खर्च का पूरा गणित।
India Debt Crisis 2026 (Image Source AI)
India Debt Crisis 2026: क्या हमारे देश के राज्य अपनी चादर से बाहर पैर पसार रहे हैं? क्या राज्यों की कमाई अठन्नी और खर्चा रुपइया हो चुका है? भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट ने कुछ ऐसे ही कड़वे और चौंकाने वाले सच देश के सामने रख दिए हैं। कैग की इस रिपोर्ट ने राज्यों की आर्थिक सेहत की पोल खोलकर रख दी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, देश का शायद ही कोई ऐसा राज्य बचा हो जो कर्ज के दलदल में न फंसा हो। कमाई कम और खर्च ज्यादा होने की वजह से आज देश के सभी 28 राज्यों को मिलाकर कुल कर्ज का आंकड़ा 90.51 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है। सबसे ज्यादा फिक्र की बात यह है कि देश के 15 राज्य ऐसे हैं जो भारी घाटे में चल रहे हैं। आइए समझते हैं कि आखिर क्यों हमारे राज्यों की माली हालत इतनी पतली होती जा रही है।
क्या है 'राज्य वित्त रिपोर्ट' और किसने दी यह चेतावनी?
देश के नए नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के. संजय मूर्ति ने मंगलवार को 'राज्य वित्त 2024-25 रिपोर्ट' जारी की। यह कोई आम सरकारी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह देश के सभी 28 राज्यों के नफा-नुकसान का पूरा कच्चा चिट्ठा है। इस रिपोर्ट को सामने लाते हुए कैग प्रमुख ने उम्मीद जताई कि यह आंकड़े सरकारों, नीति-निर्माताओं और आम जनता के लिए आंखें खोलने वाले साबित होंगे। इससे राज्यों को अपनी माली हालत सुधारने और सही फैसले लेने में मदद मिलेगी। लेकिन रिपोर्ट के भीतर जो आंकड़े छिपे हैं, वे बताते हैं कि राज्यों ने जो वादे और लक्ष्य तय किए थे, हकीकत में वे उनसे कोसों दूर रह गए हैं।
कमाई और खर्च का गणित
इस रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2024-25 की शुरुआत में देश के 18 राज्यों ने यह दावा किया था कि वे 'राजस्व अधिशेष' (Revenue Surplus) में रहेंगे। आसान शब्दों में कहें तो इन 18 राज्यों का लक्ष्य था कि वे अपनी कुल कमाई से कम पैसा खर्च करेंगे और बचत करेंगे। तीन राज्यों ने पहले ही घाटे की बात मानी थी और 7 राज्यों ने 'शून्य घाटे' का टारगेट रखा था।
लेकिन जब साल का अंत हुआ, तो नतीजा बिल्कुल उल्टा निकला। लक्ष्य रखने वाले 18 राज्यों में से केवल 9 राज्य ही अपनी बचत का टारगेट पूरा कर पाए। कुल मिलाकर 15 राज्य पूरी तरह घाटे की गर्त में चले गए, जबकि सिर्फ 13 राज्य ही किसी तरह बचत दर्ज कर पाए। उत्तर प्रदेश, गुजरात, झारखंड और मणिपुर जैसे भाग्यशाली राज्यों की कमाई तो खर्च से ज्यादा रही, लेकिन बाकी 15 राज्यों ने अपनी औकात से ज्यादा पैसा उड़ा दिया। इस अतिरिक्त खर्च की भरपाई करने के लिए इन राज्यों को बाजार से मोटा कर्ज उठाना पड़ा।
किसका हुआ फायदा और कौन डूबा भारी घाटे में?
कैग की रिपोर्ट में हर राज्य का अलग-अलग हिसाब दिया गया है। असम, बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मिजोरम और तेलंगाना उन राज्यों की सूची में शामिल हैं जिन्हें तगड़ा झटका लगा है और वे पूरी तरह घाटे में रहे हैं।
वहीं, जीरो घाटे का संकल्प लेने वाले सात राज्यों- गोवा, झारखंड, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, त्रिपुरा और उत्तर प्रदेश में से केवल उत्तर प्रदेश, गोवा, झारखंड और त्रिपुरा ही लाज बचा पाए और फायदे में रहे। पंजाब, राजस्थान और तमिलनाडु जैसे बड़े राज्य साल खत्म होते-होते भारी नुकसान के दलदल में धंस गए। इस मुश्किल घड़ी में हिमाचल प्रदेश, मिजोरम, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों को वित्त आयोग से मिलने वाली विशेष ग्रांट यानि की राजस्व घाटा अनुदान ने डूबने से बचाया।
GSDP का बढ़ा बोझ
वित्त आयोग ने देश के सभी राज्यों के लिए एक कड़ा नियम बनाया है। नियम यह है कि किसी भी राज्य का राजकोषीय घाटा उसकी कुल अर्थव्यवस्था (GSDP) के 3 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होना चाहिए। लेकिन कैग की रिपोर्ट कहती है कि देश के 18 राज्यों ने इस लक्ष्मण रेखा को पार कर लिया है।
घाटे का सामना कर रहे इन 15 राज्यों का कुल राजस्व घाटा 3,46,385 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो उनकी कुल अर्थव्यवस्था का 1.5 प्रतिशत बैठता है। अगर हम देश के सभी 28 राज्यों को एक तराजू में तौलें, तो कुल शुद्ध घाटा 2,19,041 करोड़ रुपये रहा। यह आंकड़ा साफ बयां करता है कि राज्यों को जितनी कमाई की उम्मीद थी, तिजोरी में उससे करीब सवा दो लाख करोड़ रुपये कम आए हैं।
कहां जा रहा है राज्यों का पैसा?
अब सवाल यह उठता है कि आखिर राज्यों की कमाई कहां से हो रही है और यह पैसा जा कहां रहा है? रिपोर्ट के अनुसार, राज्यों के लिए उनके खुद के टैक्स से होने वाली कमाई का महत्व बहुत बढ़ गया है। साल 2024-25 में राज्यों की कुल कमाई 40.52 लाख करोड़ रुपये रही, जिसमें से आधा हिस्सा यानी 50 प्रतिशत पैसा राज्यों ने खुद टैक्स वसूल कर कमाया है। इस टैक्स की कमाई में सबसे बड़ा रोल स्टेट जीएसटी (SGST) का रहा, जो कुल टैक्स आय का 43 प्रतिशत से ज्यादा है।
दूसरी तरफ, राज्यों का कुल बजट खर्च 51.20 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। पिछले दस सालों का ट्रेंड देखें तो राज्यों की कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा विकास कार्यों में लगने के बजाय तीन चीजों में स्वाहा हो रहा है—सरकारी कर्मचारियों की सैलरी, बुजुर्गों की पेंशन और पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में। साल 2024-25 में कुल खर्च का 43 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा सिर्फ इन्हीं तीन कामों में चला गया। नगालैंड में तो हालात इतने बदतर हैं कि वहां की कमाई का 74 प्रतिशत हिस्सा इसी में जा रहा है, जबकि महाराष्ट्र में यह आंकड़ा 29 प्रतिशत के करीब है।
कब थमेगा कर्ज का यह सिलसिला?
CAG की यह रिपोर्ट आंखें खोलने वाली है क्योंकि यह बताती है कि 21 मार्च 2025 तक देश के सभी 28 राज्यों पर कुल कर्ज का पहाड़ बढ़कर 90.51 लाख करोड़ रुपये का हो चुका था। साल 2015-16 से लेकर 2024-25 के पूरे दशक में हमारे राज्य लगातार घाटे की इस बीमारी से जूझते रहे हैं। साल 2020-21 में आई कोरोना महामारी ने इस घाटे की आग में घी डालने का काम किया था, जिससे आर्थिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया।
चिंता की बात यह है कि महामारी बीत जाने के बाद भी आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तराखंड जैसे समृद्ध माने जाने वाले राज्यों के राजकोषीय घाटे में भी जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अगर समय रहते राज्यों ने मुफ्त की योजनाओं और बेहिसाब खर्चों पर लगाम नहीं लगाई, तो आने वाले समय में यह कर्ज का जाल पूरे देश की आर्थिक रफ्तार को रोक सकता है।