Punjab Politics: कनाडा-अमेरिका में बैठकर पंजाब की सत्ता का रिमोट कंट्रोल कैसे चलाते हैं NRI?

Punjab Politics: 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब में एनआरआई समुदाय फिर सियासत के केंद्र में है। जानिए क्यों विदेशों में बसे पंजाबी वोट कम होने के बावजूद चुनावी रणनीति, फंडिंग, प्रचार और जनमत पर बड़ा असर डालते हैं और सभी राजनीतिक दल उन्हें साधने में जुटे हैं।

Update:2026-06-28 17:37 IST

Punjab Politics: जैसे-जैसे पंजाब विधानसभा चुनाव करीब आ रहे हैं, राज्य का सियासी पारा चढ़ने लगा है। सभी प्रमुख राजनीतिक दल सूबे के रसूखदार प्रवासी भारतीय समुदाय को लुभाने में जुट गए हैं। हाल ही में मोहाली में आयोजित 'एनआरआई मिलनी-2026' कार्यक्रम में एनआरआई मामलों के मंत्री डॉ. रवजोत सिंह ने विदेशी पंजाबियों को भरोसा दिलाया कि उनकी हर समस्या का निपटारा पूरी पारदर्शिता और तय समय के भीतर किया जाएगा।

सिर्फ सत्ताधारी दल ही नहीं, बल्कि विपक्ष भी इन अप्रवासी पंजाबियों को अपने पाले में करने की जुगत भिड़ा रहा है। ऐसे में एक बड़ा सवाल यह उठता है कि जो लोग पंजाब में रहते ही नहीं और जिनमें से ज्यादातर कभी वोट डालने भी नहीं आते, वो अचानक पंजाब की राजनीति की धुरी कैसे बन जाते हैं?

वोटों से कहीं ज्यादा है अप्रवासी पंजाबियों का असर

आंकड़ों के लिहाज से देखें तो पंजाब में एनआरआई वोटरों की तादाद कोई बहुत बड़ी नहीं है। इसके बावजूद चुनावी बिसात पर उन्हें एक बेहद ताकतवर मोहरे के रूप में देखा जाता है। दरअसल, विदेशों में बसे पंजाबी अपने परिवारों, रिश्तेदारों और दोस्तों के जरिए पूरे चुनावी माहौल का रुख मोड़ने का माद्दा रखते हैं। दोआबा, माझा और मालवा जैसे अहम इलाकों में तो विदेश में बैठे किसी सदस्य की राय ही अक्सर तय करती है कि घर का वोट किस पार्टी को जाएगा।

ये अप्रवासी अपने गांव और इलाके की हर छोटी-बड़ी खबर पर पैनी नजर रखते हैं। आर्थिक सहयोग और सामाजिक रुतबे के चलते वो अपने लोगों के बीच एक 'ओपिनियन मेकर' यानी राय बनाने वाले की भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि चुनाव से ठीक पहले हर नेता की कोशिश होती है कि वह एनआरआई समुदाय की गुड लिस्ट में शामिल हो जाए।

सियासी पार्टियों को मिलता रहा है भरपूर समर्थन

पंजाब में आम आदमी पार्टी के उभार को इसका सबसे सटीक उदाहरण माना जा सकता है। साल 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को विदेशी पंजाबियों से जबरदस्त बैकअप मिला था। एनआरआई समर्थकों ने न सिर्फ पार्टी के लिए फंड जुटाया, बल्कि डिजिटल प्रचार से लेकर जमीनी कैंपेनिंग तक में जान फूंक दी थी।

इसी के दम पर पार्टी खुद को एक मजबूत विकल्प के तौर पर पेश कर पाई। हालांकि, यह समर्थन सिर्फ किसी एक दल की जागीर नहीं है। कांग्रेस को भी हमेशा से उन परिवारों का साथ मिलता रहा है जिनके तार विदेशों से जुड़े हैं। दूसरी तरफ, शिरोमणि अकाली दल की पैठ सिख धार्मिक संस्थाओं और पंथिक राजनीति से जुड़े तबकों में गहरी है, जिसका सीधा फायदा उन्हें कनाडा जैसे देशों में बसे समर्थकों से मिलता है।

बदलता चुनावी माहौल और सुरक्षा की चिंताएं

चुनावों के आसपास एनआरआई समुदाय के साथ सरकार और नेताओं की बैठकें एक आम बात रही हैं। एक वक्त था जब चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर एनआरआई मिलनी और फीडबैक सेशन हुआ करते थे। लेकिन, अब इस तरह के खुले आयोजनों में थोड़ी कमी आई है। इसकी एक बड़ी वजह हाल के सालों में सामने आए रंगदारी और गैंगस्टरों से जुड़े मामले हैं।

डर के साये में कई एनआरआई अब सार्वजनिक मंचों पर ज्यादा एक्टिव दिखने से कतराने लगे हैं। वे नहीं चाहते कि उनका कारोबार या परिवार किसी भी तरह की गैर-जरूरी चर्चा या खतरे में आए। हालांकि, सामने न आने के बावजूद वे पर्दे के पीछे से चुनावी नैरेटिव सेट करने का काम बदस्तूर जारी रखते हैं। पंजाब सरकार लगातार इस बात पर जोर दे रही है कि विदेशी पंजाबियों की शिकायतों को गंभीरता से सुना जाए, ताकि आने वाले 2027 के विधानसभा चुनावों में इस प्रभावशाली वर्ग का पूरा साथ मिल सके।

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