UP Rajya Sabha Election: मिशन 2027 का सेमीफाइनल... राज्यसभा चुनाव में BJP vs SP, किसका रहेगा पलड़ा भारी

UP Rajya Sabha Election: उत्तर प्रदेश राज्यसभा चुनाव 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा सियासी शक्ति प्रदर्शन माना जा रहा है। भाजपा और समाजवादी पार्टी की रणनीति, सीटों का गणित, संभावित उम्मीदवार, पीडीए फॉर्मूला और क्रॉस वोटिंग की पूरी कहानी जानें।

Update:2026-06-28 15:37 IST

UP Rajya Sabha Election: उत्तर प्रदेश में आगामी राज्यसभा चुनाव महज उच्च सदन की दस सीटों का फैसला नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले एक बड़े शक्ति प्रदर्शन का मंच बनने जा रहा है। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी, दोनों ही इसे एक अहम सियासी लिटमस टेस्ट के तौर पर देख रहे हैं।

इस चुनाव में जिन दस दिग्गजों का कार्यकाल पूरा हो रहा है, उनमें भाजपा के हरदीप सिंह पुरी, अरुण सिंह, बृजलाल, नीरज शेखर, सीमा द्विवेदी, गीता शाक्य, बनवारी लाल वर्मा और दिनेश शर्मा के साथ-साथ समाजवादी खेमे से रामगोपाल यादव और रामजी गौतम शामिल हैं। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि पार्टियां किन पुराने चेहरों पर दोबारा दांव लगाएंगी और किन्हें बाहर का रास्ता दिखा सकती हैं।

विधानसभा का मौजूदा गणित

अगर हम 403 विधायकों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा के वर्तमान आंकड़ों पर गौर करें, तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का पलड़ा साफ तौर पर भारी नजर आता है। गठबंधन के पास करीब 290 से 294 विधायकों का मजबूत समर्थन है। दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी और उसके सहयोगी दलों के पास लगभग 103 से 105 विधायक मौजूद हैं।

राज्यसभा की एक सीट पक्की करने के लिए किसी भी उम्मीदवार को करीब 37 प्रथम वरीयता वाले वोटों की जरूरत पड़ेगी। इस लिहाज से भाजपा बड़ी आसानी से सात से आठ सीटें अपनी झोली में डाल सकती है, जबकि समाजवादी पार्टी के खाते में दो से तीन सीटें जाने की प्रबल संभावना है।

भाजपा की रणनीतिक चाल और संभावित चेहरे

सियासी हलकों में इस बात की जोरों पर चर्चा है कि भाजपा केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और पूर्व आईपीएस अधिकारी बृजलाल को एक बार फिर से राज्यसभा भेज सकती है। वहीं, पार्टी के भीतर लंबे समय से सक्रिय अरुण सिंह के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। चूंकि 2027 का विधानसभा चुनाव ज्यादा दूर नहीं है, इसलिए भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव के जरिए नए क्षेत्रीय और जातीय चेहरों को आगे लाकर एक बड़ा दांव चलने की रणनीति पर काम कर रही है ताकि सियासी समीकरणों को अपने पक्ष में किया जा सके।

पीडीए फॉर्मूले पर अखिलेश यादव का जोर

समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव इस पूरी चुनावी बिसात पर अपने बहुचर्चित 'पीडीए' यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले को ही धार देने में लगे हुए हैं। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो सपा इस बार कम से कम दो ऐसे वफादार नेताओं को उच्च सदन में भेजने का मन बना रही है, जो इस समीकरण में बिल्कुल सटीक बैठते हों। इसके जरिए पार्टी अपने कोर वोटर बेस को यह संदेश देना चाहती है कि वह समाज के हाशिए पर खड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व को लेकर पूरी तरह गंभीर है।

क्रॉस वोटिंग का डर और इंडिया गठबंधन की एकजुटता

भारतीय जनता पार्टी रालोद, सुभासपा और अपना दल जैसे अपने तमाम सहयोगियों को साथ लेकर सात सीटों के सुरक्षित लक्ष्य पर काम कर रही है। साथ ही, भगवा दल की नजरें विपक्षी खेमे में सेंधमारी और संभावित क्रॉस वोटिंग पर भी गड़ी हुई हैं। इसके विपरीत, समाजवादी पार्टी कांग्रेस के साथ बेहतर तालमेल बिठाकर अपनी तीन सीटों का आंकड़ा छूने की जुगत में है।

हाल ही में इंडिया गठबंधन की बैठकों में अखिलेश यादव और राहुल गांधी के बीच जो सियासी तालमेल देखने को मिला है, उसे इसी साझा रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। अगर विपक्ष एकजुट रहने में कामयाब होता है और सेंधमारी से बच जाता है, तो यह चुनाव बेहद दिलचस्प मोड़ ले सकता है।

2027 के महामुकाबले का असली सेमीफाइनल

तमाम राजनीतिक जानकारों का यही मानना है कि यह चुनाव सिर्फ दिल्ली दरबार में नुमाइंदगी का सवाल नहीं है, बल्कि यह असल में 2027 के विधानसभा चुनाव का बिगुल है। अगर भाजपा अपनी उम्मीद से ज्यादा सीटें निकाल लेती है या फिर समाजवादी पार्टी अपने तय आंकड़े से बेहतर प्रदर्शन कर दिखाती है, तो इसका सीधा असर प्रदेश के सियासी नैरेटिव पर पड़ेगा। यह जीत या हार दोनों ही पार्टियों के जमीनी कार्यकर्ताओं के मनोबल की दिशा तय करेगी, जो अगले बड़े चुनावी संग्राम के लिए निर्णायक साबित होगा।

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