टूटे पैर, झुका शरीर और हाथ में लाठी…फिर भी ब्रिगेड ग्राउंड पहुंचीं, जानें कौन हैं शुव्रा बनर्जी जिसके जज्बे ने खींचा सबका ध्यान

Suvendu Adhikari Oath Ceremony: कोलकाता का विशाल ब्रिगेड परेड ग्राउंड शुक्रवार को केवल राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि एक ऐसी तस्वीर से गूंज उठा जिसने वहां मौजूद हजारों लोगों को भावुक कर दिया।

Update:2026-05-09 13:58 IST

Suvendu Adhikari Oath Ceremony: कोलकाता का विशाल ब्रिगेड परेड ग्राउंड शुक्रवार को केवल राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि एक ऐसी तस्वीर से गूंज उठा जिसने वहां मौजूद हजारों लोगों को भावुक कर दिया। मौका था शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री पद के शपथ ग्रहण समारोह का, लेकिन भीड़ के बीच एक चेहरा ऐसा था जिसने हर किसी का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया। यह चेहरा था तारकेश्वर की रहने वाली शुव्रा बनर्जी का।

शरीर से लाचार, कमर से झुकी हुईं और एक पैर टूटने के बाद मुश्किल से चल पाने वाली शुव्रा बनर्जी हाथ में पुरानी लकड़ी की छड़ी थामे जब ‘जय श्री राम’ के नारे लगाते हुए भीड़ के बीच आगे बढ़ीं, तो वहां मौजूद लोग उन्हें देखते ही रह गए। सुरक्षाकर्मी हों या आम कार्यकर्ता, हर कोई उनके जज्बे को देखकर हैरान था।

पद के लिए नहीं, विचारधारा के लिए पहुंचीं शुव्रा

रिपोर्ट्स के मुताबिक, शुव्रा बनर्जी किसी पद, पहचान या लालच के लिए इस कार्यक्रम में नहीं पहुंचीं थीं। वे सिर्फ उस विचारधारा की जीत देखने आई थीं, जिससे उनका रिश्ता दशकों पुराना है। बताया जाता है कि अटल बिहारी वाजपेयी के दौर से ही वे भाजपा और भगवा ध्वज से जुड़ी रही हैं।

उन्होंने कभी चुनावी राजनीति में सक्रिय भूमिका नहीं निभाई और न ही कभी किसी पद की मांग की। वे हमेशा एक शांत समर्थक की तरह अपनी पार्टी की जीत की दुआ करती रहीं। उनके लिए अटल बिहारी वाजपेयी केवल नेता नहीं, बल्कि एक आदर्श थे। ऐसे में जब बंगाल में भाजपा की पहली सरकार बन रही है, तो उन्हें लगा कि उनका वर्षों पुराना सपना पूरा हो गया है।

टूटे पैर के बावजूद तय किया लंबा सफर

शुव्रा बनर्जी की हालत ऐसी है कि वे बिना सहारे के ठीक से चल भी नहीं सकतीं। कुछ समय पहले एक हादसे में उनका पैर टूट गया था, जिसके बाद से वे सीधे खड़ी भी नहीं हो पातीं। लेकिन उनका हौसला हर शारीरिक कमजोरी पर भारी पड़ गया।

तारकेश्वर से कोलकाता तक का सफर किसी भी व्यक्ति के लिए आसान नहीं माना जाता, लेकिन शुव्रा देवी ने अपनी लाठी के सहारे यह दूरी तय की। उन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर मन में विश्वास और इच्छा मजबूत हो, तो शरीर की परेशानियां रास्ता नहीं रोक पातीं।

भगवा रंग में रंगा नजर आया पूरा ब्रिगेड ग्राउंड

9 मई की सुबह से ही कोलकाता की सड़कों पर अलग ही माहौल दिखाई दे रहा था। चारों तरफ भगवा रंग नजर आ रहा था। यातायात प्रतिबंधों की वजह से बसों और अन्य वाहनों को काफी दूर रोक दिया गया था। ऐसे में हजारों लोग पैदल ही ब्रिगेड ग्राउंड की तरफ बढ़ रहे थे।

इसी भीड़ में शुव्रा बनर्जी भी अपनी लाठी के सहारे धीरे-धीरे आगे बढ़ती नजर आईं। रास्ते में जो भी उन्हें देखता, उनके जज्बे को सलाम किए बिना नहीं रह पाता। उन्होंने मीडिया से कहा कि वे नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी आंखों से देखना चाहती हैं। उनके चेहरे की मुस्कान यह बता रही थी कि वे अपनी सारी तकलीफें भूल चुकी हैं।

दिखा राजनीति और बंगाल की संस्कृति का संगम

ब्रिगेड ग्राउंड का माहौल किसी उत्सव से कम नहीं था। एक तरफ राजनीतिक भाषणों की तैयारी चल रही थी, तो दूसरी तरफ बंगाल की संस्कृति भी पूरे रंग में नजर आ रही थी। मैदान में जगह-जगह झालमुरी की दुकानों पर भारी भीड़ दिखाई दी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार अपने भाषणों में झालमुरी का जिक्र कर चुके हैं और इसे बंगाल की पहचान बता चुके हैं। यही वजह रही कि भाजपा कार्यकर्ता इस दिन झालमुरी को सिर्फ नाश्ता नहीं, बल्कि ‘मोदी का प्रसाद’ मानकर खा रहे थे। मैदान में शंख और पद्म के आकार वाली मिठाइयों का भी वितरण हो रहा था। शुव्रा बनर्जी जैसी बुजुर्ग महिलाएं भी इस माहौल का आनंद लेती नजर आईं।

शुव्रा बनर्जी बनीं बदलाव की प्रतीक

शुव्रा बनर्जी का इस शपथ ग्रहण समारोह में पहुंचना केवल एक महिला की मौजूदगी नहीं माना जा रहा, बल्कि यह उन हजारों ‘साइलेंट वोटर्स’ और निस्वार्थ कार्यकर्ताओं की भावना का प्रतीक बन गया, जो वर्षों से बंगाल की राजनीति में बदलाव का इंतजार कर रहे थे।

शुभेंदु अधिकारी के शपथ ग्रहण को शुव्रा देवी अपनी व्यक्तिगत जीत की तरह महसूस कर रही थीं। रिपोर्ट के मुताबिक वे बार-बार यही कह रही थीं कि उन्होंने अपनी आंखों से बंगाल में भाजपा का सूर्योदय देख लिया है और अब वे शांति से घर लौट सकती हैं। वहीं उनके हाथ की लाठी इस दिन केवल चलने का सहारा नहीं रही, बल्कि उनके संघर्ष, विश्वास और जिद की सबसे बड़ी गवाह बनकर उभरी।

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