Women Respect Story: स्त्री सम्मान एवं अनुभव
Women Respect Story: मुंबई लोकल ट्रेन के सफर का एक दिलचस्प अनुभव, जहां स्त्री सम्मान, सहानुभूति और उम्मीदों के बीच लेखक को जीवन का एक अनोखा सबक मिला।
Women Respect Story (Image Credit-Social Media)
Women Respect Story: बात तीस पैंतीस साल पुरानी है। तकरीबन 1990 से 1995 के बीच का कोई समय रहा होगा। मैं अपने व्यापारिक कार्यों के लिए अक्सर ही मुम्बई जाया करता था। भिवंडी, कल्याण, भायखला, शिवा जी टर्मिनस, थाने, सानपाड़ा और वाशी के दरम्यान मेरा आना जाना लोकल ट्रेन के दूसरे दर्जे से ही होता था। पैसे भी बचते थे। युवा था तो भाग दौड़, चलने फिरने और भीड़ की धक्का मुक्की से कोई परहेज नहीं था बल्कि अच्छा ही लगता था।
एक दिन मैंने शिवाजी टर्मिनस से कल्याण के लिये लोकल ट्रेन पकड़ी। तीन तीन सीटों के युग्मों में आखिरी सीट जो खिड़की की तरफ न होकर गलियारे (रास्ते) की तरफ होती है, उस पर बैठ गया। ट्रेन खचाखच भरी जा रही थी। लेकिन दादर पर जो भीड़ का रेला आया उसके बाद तो खड़े हुए यात्री हिल भी नहीं पा रहे थे। मेरे आगे पीछे सब तरफ से यात्रियों का इतना घना घेरा था कि मैं बगल के यात्रियों के अलावा कुछ भी देख नहीं पा रहा था। ट्रेन रुकती और चलती तो आसपास खड़े लोगों से पूछ लेता कि कौन सा स्टेशन है।
मेरे बगल में एक लड़की हाथों में एक बैग लिए खड़ी थी। भीड़ के धक्के और उतरने चढ़ने वालों की जगह बनाने में वह पूरी तरह मेरे ऊपर झुक जाती थी।मैं असहज होने लगा। उस लड़की की परिस्थिति और चेहरे की शिकन बयां कर रहे थे कि वो कितने कष्ट में है। और फिर मेरे जेहन में आया कि रोज ही बेचारी को इस तरह की कष्ट दायक यात्राएं करनी पड़ती होंगी। मेरे मन में दया का सागर उमड़ पड़ा। उस अकेली, लाचार, निःसहाय और शांत लड़की के प्रति मेरे हृदय में करुणा के भाव बह निकले। एक पुरुष सीट पर बैठा है। एक अबला उसके सामने विपत्ति में है !
वहां और भी पुरुष बैठे थे। लेकिन किसी के पास वह हिम्मत नहीं थी जो मैंने दिखाई। मैं तुरंत उठ खड़ा हुआ और अपनी सीट ससम्मान उस लड़की को सौंप दी, जिसके चेहरे की कातरता मुझे लगातार व्यथित कर रही थी। उसे सीट सौंप कर मैंने दिग्विजय प्राप्त कर ली। बड़े ही गर्व से, आंखों में विजयी चमक लिए आसपास बैठे कापुरुषों को देखकर खुश हो रहा था कि मैंने पुरुषत्व का मान रखा और महिला को न्यायोचित सम्मान दे दिया।
उस सीट पर बैठते ही उस लड़की ने थोड़ा सा खिसक कर अपने साथ आये एक लड़के को अपनी आधी सीट शेयर कर दी। और फिर वे दोनों हाथों में हाथ पकड़ कर गुफ्तगू करने लगे। जो लड़की मुझे शांत और अबला लग रही थी। उसके चेहरे पर मुस्कान खिल गई। वह अब मेनका बन कर अपने प्रेमी के साथ अत्यंत ही विनोदी अंदाज मे बतिया रही थी।
इतने ही क्षण में मेरे गर्व का दर्प चूर चूर हो गया। जिन बैठे हुए पुरुषों को मैं कापुरुष समझ कर आंखें उठा कर देख रहा था, अब वही पुरुष मेरी बेवकूफी पर स्मित मुस्कान लिए मुझे चिढ़ा रहे थे। मैं किसी अन्य की तरफ आंख ना उठा सका और मारे गुस्सा और शर्मिंदगी से नजरें नीचे कर ली या इधर उधर देखने लगा। बार बार मेरे मन में आ रहा था कि मैंने ग़लत क्या किया ! भीड़ बहुत थी। अन्यत्र कहीं भी सीट नहीं थी। मैं करीब 45, 50 मिनट वैसे ही भीड़ में फंसा खड़ा रहा। डोम्बिवली आया और वो दोनों एक दूसरे का साथ पकड़े पकड़े भीड़ को चीरते स्टेशन पर उतर गये।
डिब्बा करीब करीब खाली हो चला था। कोई खड़ा नहीं था। मेरी सीट भी खाली हो गयी थी। लेकिन परास्त भाव से उस सीट को देखते हुए मेरा मन उस पर बैठने का नहीं हुआ। खिसियाहट और क्रोध से मेरा सर भन्ना रहा था।अगर उतरते समय वो लड़की एक शब्द ‘धन्यवाद’ कह जाती तो शायद मेरे कटु अनुभव पर कुछ शीतल जल की फुहारें पड़ जाती और मन की तपन और अगन कुछ कम हो जाती।
कल्याण स्टेशन आने में आठ, दस मिनट का समय अब भी बाकी था। मैं मन मार कर बैठ गया और अपने अनुभव की पुस्तक में एक अध्याय लिख लिया।
( लेखक प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं।)