Raja Ram Singh Kushwaha Wikipedia: राजा राम सिंह कुशवाहा, बिहार की राजनीति के मजबूत स्तंभ
Raja Ram Singh Kushwaha Wikipedia: किसानों, मजदूरों और गरीबों की आवाज बनकर संसद में पहुंचे हैं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी नेता राजा राम सिंह कुशवाहा;
Raja Ram Singh Kushwaha Wiki in Hindi
Raja Ram Singh Kushwaha Wiki in Hindi: राजा राम सिंह कुशवाहा बिहार के एक प्रमुख राजनीतिज्ञ हैं, जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन [CPI(ML)L] से जुड़े हुए हैं। वे औरंगाबाद जिले के ओबरा विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक रह चुके हैं और 2024 के लोकसभा चुनाव में काराकाट सीट से सांसद बने। उन्होंने यह सीट भोजपुरी गायक पवन सिंह को एक लाख से अधिक मतों के अंतर से हराकर जीती। उनका राजनीतिक सफर संघर्षों और सामाजिक परिवर्तन के लिए किए गए प्रयासों से भरा रहा है।
व्यक्तिगत जीवन और प्रारंभिक पृष्ठभूमि
राजा राम सिंह कुशवाहा बिहार के एक सामान्य किसान परिवार से आते हैं। उनका जन्म 27 मार्च 1958 बिहार औरंगाबाद जिले के एकौनी गांव में कोइरी परिवार से संबंधित दीपन सिंह के घर हुआ था। बचपन से ही वे समाज में व्याप्त असमानता और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित थे। उन्होंने बिहार कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग (अब राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, पटना) से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की, लेकिन कभी इंजीनियरिंग में करियर नहीं बनाया। उन्होंने इंडियन पीपुल्स फ्रंट (IPF) के माध्यम से राजनीति में प्रवेश किया और 1980 के दशक तक इस संगठन के एक प्रमुख नेता बन गए। वे किसानों, मजदूरों और गरीब तबके के हक के लिए संघर्ष करने लगे और जल्दी ही CPI(ML)L के पोलित ब्यूरो सदस्य बन गए। इनकी पत्नी रेलवे के प्राथमिक विद्यालय में प्रिंसिपल हैं।
राजनीतिक सफर
राजा राम सिंह कुशवाहा ने 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में ओबरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। इसके बाद उन्होंने 2000 के चुनावों में भी इस सीट को बरकरार रखा। उनकी जीत का मुख्य कारण उनके द्वारा किए गए किसानों, दलितों, मजदूरों और वंचित वर्गों के लिए किए गए संघर्ष थे। वे बिहार में जमीन सुधार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक न्याय के मुद्दों को लेकर मुखर रहे हैं। हालांकि, 2005 और 2010 के विधानसभा चुनावों में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने जनता से जुड़े रहने का अपना प्रयास जारी रखा और अपनी पार्टी को मजबूत किया। राजा राम सिंह कुशवाहा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में बिना बड़े कॉर्पोरेट चंदे, बिना हेलीकॉप्टर और बिना भारी चुनावी खर्च के चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। उनका चुनाव अभियान जनता द्वारा वित्तपोषित था, जिसमें आम मतदाताओं से छोटे-छोटे दान लेकर प्रचार किया गया। उन्होंने अपने पार्टी सहयोगी सुदामा प्रसाद की रणनीति अपनाई और 20 रुपये के बीस लाख कूपन जनता में वितरित किए। घर-घर जाकर लोगों से दान देने और उनके संघर्ष को समर्थन देने का अनुरोध किया। इस अनूठे जनसंपर्क अभियान ने सामान्य जनता को उनके अभियान का हिस्सा बना दिया और यह चुनाव एक जनआंदोलन बन गया।
राजा राम सिंह कुशवाहा का अभियान पारंपरिक महंगे चुनाव अभियानों से बिल्कुल अलग था। उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने हेलीकॉप्टर और बड़े प्रचार रथों की जगह साइकिल और मोटरसाइकिलों से यात्रा की, जिससे वे आम जनता से सीधे संवाद कर सके। इसका परिणाम यह रहा कि उनका अभियान वास्तविक जनता से जुड़ा और लोगों ने इसे अपनी लड़ाई समझा।
भाजपा और एनडीए के बड़े नामों को हराने की उपलब्धि
2024 के लोकसभा चुनाव में काराकाट सीट पर राजा राम सिंह कुशवाहा के सामने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के दिग्गज उम्मीदवार
पवन सिंह भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार और भाजपा के उम्मीदवार
आर.के. सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता वहीं उपेंद्र कुशवाहा, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP) के अध्यक्ष और बिहार के प्रभावशाली नेता इन तीनों को हराना आसान नहीं था, क्योंकि इनके पास *भारी संसाधन, मीडिया का समर्थन और व्यापक चुनावी मशीनरी थी।
लेकिन जनता के समर्थन से और न्यूनतम संसाधनों में जमीनी मेहनत के बल पर राजा राम सिंह ने पवन सिंह को एक लाख से अधिक मतों से हराया और एनडीए के बड़े नेताओं को पीछे छोड़ दिया। राजा राम सिंह कुशवाहा की जीत यह साबित करती है कि चुनाव सिर्फ पैसों और प्रचार के दम पर नहीं जीते जाते, बल्कि जनता के दिलों को छूने से भी चुनाव जीते जा सकते हैं।
जनता से चंदा लेकर चुनाव लड़ने की रणनीति ने जनता से गहरा संबंध बनाया। साइकिल और मोटरसाइकिल से प्रचार ने गांव-गांव तक उनकी पहुंच बनाई। उनका किसान और मजदूर समर्थक संघर्ष जनता के साथ गहराई से जुड़ा। यह जीत सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि जनता की भागीदारी और जमीनी राजनीति की जीत थी, जिसने दिखाया कि न्यूनतम संसाधनों में भी जनसमर्थन के दम पर चुनाव जीते जा सकते हैं।
राजनीतिक विचारधारा और योगदान
राजा राम सिंह कुशवाहा हमेशा से ही किसान आंदोलन, मजदूर अधिकार और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर केंद्रित रहे हैं। वे बिहार में काम भूमि सुधार और श्रमिकों के अधिकार को लेकर कई आंदोलनों में शामिल रहे हैं।
उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान बिहार के किसानों और खेत मजदूरों के हक में कई आंदोलन चलाए। वे मानते हैं कि किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य और मजदूरों को सम्मानजनक मजदूरी मिलनी चाहिए।
वे बिहार में सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की दशा सुधारने की मांग को लेकर लगातार सक्रिय रहे हैं। वे चाहते हैं कि गरीब और दलित समाज के बच्चे भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सकें।
ग्रामीण जनता से सीधा संपर्क रहा है काराकाट लोकसभा क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता के कारण
वे हमेशा ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर जनता की समस्याएं सुनते रहे हैं।
उन्होंने छोटे-छोटे गांवों में बैठकें करके लोगों को राजनीति और उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया। उन्होंने दलितों और पिछड़ों के आरक्षण, शिक्षा और रोजगार के अधिकारों के लिए आवाज उठाई। भूमि सुधारों के मुद्दे पर वे सरकार से टकराते रहे हैं। वे युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने और मनरेगा जैसी योजनाओं को मजबूत बनाने की वकालत करते हैं। वे बिहार में कुटीर उद्योग और कृषि-आधारित उद्योगों के विकास के समर्थक हैं। साफ़-सुथरी छवि और जनता के प्रति प्रतिबद्धता के साथ भ्रष्टाचार और अपराध के खिलाफ उनकी कठोर नीतियां उनकी लोकप्रियता का प्रमुख कारण रही हैं। वे हमेशा जनता के मुद्दों पर सरकार से सवाल पूछते रहे हैं।
अखिल भारतीय किसान महासभा और AIKSCC में सक्रियता के चलते किसान आंदोलनों में नेतृत्वकारी भूमिका
वे अखिल भारतीय किसान महासभा (AIKM) के राष्ट्रीय सचिव और अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (AIKSCC) के बिहार-झारखंड राज्य प्रमुख हैं। इन संगठनों के माध्यम से वे किसानों के अधिकार, कृषि सुधार और भूमि अधिकार के लिए संघर्ष करते रहे हैं। 2020-21 किसान आंदोलन में इनकी विशेष भूमिका रही है।
राजा राम सिंह कुशवाहा ने 2020-21 के किसान आंदोलन में बिहार से लेकर दिल्ली-पंजाब सीमा तक सक्रिय नेतृत्व किया।तीन कृषि कानूनों के खिलाफ़ हुए इस आंदोलन को उन्होंने "किसानों के लिए ऐतिहासिक संघर्ष" बताया। उन्होंने बिहार से दिल्ली तक किसान जुलूसों का नेतृत्व किया और किसानों को संगठित करने का कार्य किया।
उनकी मांग थी कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी मिले।
उनके नेतृत्व में किसान दिल्ली के बॉर्डर पर कई महीनों तक डटे रहे, और अंततः सरकार को तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़े। इसी कड़ी में बिहार सरकार ने 2006 में कृषि उपज मंडी समितियां (APMC) भंग कर दी थीं, जिससे किसानों को व्यापारियों के शोषण का सामना करना पड़ा। राजा राम सिंह कुशवाहा APMC सिस्टम की बहाली की माँग को लेकर लगातार संघर्षरत रहे हैं।
वे MSP को कानूनी रूप देने और सरकारी खरीद प्रणाली को मजबूत करने की भी वकालत करते हैं। उन्होंने भूमिहीन किसानों और मजदूरों के अधिकारों के मुद्दों को बिहार विधानसभा में उठाया।
वे गरीबों, दलितों और आदिवासियों के लिए भूमि सुधार कानूनों को लागू करने की मांग करते रहे। उनकी राजनीति का मूल उद्देश्य है: "किसानों, मजदूरों और गरीबों को सशक्त बनाना और उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करना।" आने वाले समय में, वे संसद में किसान आंदोलनों की आवाज बन सकते हैं और बिहार में वामपंथी राजनीति को और मजबूत कर सकते हैं।
भविष्य की संभावनाएं और चुनौतियां
1. वामपंथी राजनीति को मजबूत करना
बिहार में वामपंथी दलों का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो रहा था, लेकिन राजा राम सिंह कुशवाहा ने इसे पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब वे बिहार और देश में CPI(ML)L के विस्तार पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।
2. बिहार में विकास और रोजगार को बढ़ावा
वे बिहार में कृषि, उद्योग और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए योजनाएं लागू करवाने की कोशिश कर सकते हैं। बिहार में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार उनकी प्राथमिकता में रहेगा।
3. राष्ट्रीय राजनीति में लोकप्रिय बुलंद वामपंथी आवाज
2024 लोकसभा चुनाव में जीत के बाद, वे राष्ट्रीय स्तर पर वामपंथी राजनीति का चेहरा बन अपनी आवाज बुलंद कर सकते हैं। वे संसद में मजदूरों, किसानों और वंचित वर्गों के लिए एक मजबूत आवाज बन सकते हैं। राजा राम सिंह कुशवाहा बिहार की राजनीति में एक मजबूत और लोकप्रिय नेता हैं। उनका राजनीतिक सफर संघर्षों और सामाजिक न्याय के आंदोलनों से भरा रहा है। उन्होंने दो बार विधायक के रूप में और अब सांसद के रूप में जनता का प्रतिनिधित्व किया है।
2024 लोकसभा चुनाव में काराकाट सीट से उनकी जीत ने यह साबित कर दिया कि वामपंथी राजनीति अभी भी बिहार में प्रासंगिक है। वे किसानों, मजदूरों और गरीबों की आवाज बनकर संसद में पहुंचे हैं। आने वाले वर्षों में, वे बिहार की राजनीति में वामपंथी राजनीति को फिर से मजबूती देने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।