Sawan green bangles: सावन में क्यों पहनती हैं महिलाएं हरी चूड़ियां? जानें मान्यता

Sawan Green Bangles: सावन में हरी चूड़ियां पहनने की परंपरा क्यों है? जानें शिव-पार्वती से जुड़ी मान्यता, हरे रंग का महत्व और चूड़ियां पहनने के धार्मिक नियम।

Update:2026-08-11 16:09 IST

Sawan green bangles: Why Do Women Wear Green Bangles in Sawan? Know the Religious Belief

Sawan Green Bangles:सावन का महीना आते ही प्रकृति का रंग बदल जाता है। चारों तरफ हरियाली, बारिश की फुहार और शिव भक्ति का माहौल नजर आने लगता है। इस मौसम में महिलाओं के श्रृंगार में भी हरे रंग की खास झलक दिखाई देती है। खासकर सुहागन महिलाओं की कलाइयों में खनकती हरी चूड़ियां सावन की पहचान बन जाती हैं। भारतीय परंपरा में चूड़ियों को सिर्फ आभूषण नहीं माना गया है, बल्कि इन्हें सुहाग, सौभाग्य और मंगल का प्रतीक भी माना जाता है। यही वजह है कि सावन में हरी चूड़ियां पहनने की परंपरा कई क्षेत्रों में आज भी निभाई जाती है।

ज्योतिष एक्सपर्ट प्रभात मिश्रा के अनुसार, धार्मिक मान्यताओं में सावन का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती से माना जाता है। इस महीने में माता पार्वती की पूजा के साथ हरी चूड़ियां पहनना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे वैवाहिक जीवन में सुख-शांति और दांपत्य संबंधों में मधुरता बनी रहती है।

सावन में हरे रंग का इतना महत्व क्यों है?

सावन का महीना बारिश और हरियाली से जुड़ा हुआ है। गर्मी के बाद जब बारिश होती है तो सूखी धरती फिर से हरी होने लगती है। इसी वजह से हरे रंग को सावन की प्रकृति और नई ऊर्जा से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में भी हरे रंग को शांति, समृद्धि, संतुलन और सकारात्मकता से जोड़ा जाता है। हरी चूड़ियां इसी भावना का हिस्सा मानी जाती हैं। महिलाओं के लिए सावन में हरे कपड़े, हरी चूड़ियां और अन्य हरे रंग के श्रृंगार का चलन इसी प्राकृतिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रतीक है। ग्रामीण परिवेश में कई जगहों पर आज भी सावन के दौरान महिलाएं हरी चूड़ियां पहनकर, कलाइयों पर मेंहदी रचाकर झूला झूलती हैं और सावन के गीत गाती हैं।

माता पार्वती से जुड़ी है हरी चूड़ियों की मान्यता

सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है, लेकिन इस दौरान माता पार्वती की पूजा का भी खास महत्व बताया गया है। धार्मिक कथाओं में माता पार्वती को भगवान शिव की अर्धांगिनी और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। इसलिए विवाहित महिलाएं सावन में माता पार्वती की पूजा कर अपने पति और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

मान्यता है कि हरा रंग माता पार्वती को प्रिय है। इसी कारण सावन में हरी चूड़ियां पहनना उनके प्रति श्रद्धा और सौभाग्य की कामना से जोड़ा जाता है। हरी चूड़ियों को कई परिवारों में दांपत्य सुख और मंगल का प्रतीक भी माना जाता है।

चूड़ियां क्यों मानी जाती हैं सुहाग का प्रतीक?

भारतीय संस्कृति में चूड़ियों का संबंध लंबे समय से महिला के श्रृंगार और सुहाग से रहा है। अलग-अलग राज्यों में चूड़ियों के रंग, डिजाइन और उन्हें पहनने की परंपरा अलग हो सकती है। कई समुदायों में विवाह के बाद चूड़ियां पहनने की विशेष रस्म भी होती है। सावन में हरी चूड़ियां पहनने की परंपरा इसी श्रृंगार संस्कृति का एक हिस्सा है। चूड़ियों की खनक को घर की खुशहाली और सकारात्मक माहौल से जोड़ने की मान्यता भी काफी ज्यादा प्रचलित है।

सावन में हरी चूड़ियां पहनने के क्या नियम बताए गए हैं?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन में हरी चूड़ियां पहनते समय कुछ बातों का ध्यान रखना शुभ माना जाता है। सबसे पहले सुबह स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनने और भगवान शिव तथा माता पार्वती का स्मरण करने की परंपरा बताई जाती है। इसके बाद श्रद्धा के साथ हरी चूड़ियां धारण की जा सकती हैं।

चूड़ियां पहनते समय अपने दांपत्य जीवन, परिवार की सुख-शांति और सभी के कल्याण की प्रार्थना करने की मान्यता है। कुछ परिवारों में सावन के सोमवार या किसी विशेष शुभ दिन हरी चूड़ियां पहनने को प्राथमिकता दी जाती है।

टूटी चूड़ियां पहनने से क्यों किया जाता है परहेज?

परंपराओं में टूटी या खंडित चूड़ियां पहनने से बचने की सलाह दी जाती है। चूड़ियों को सुहाग और मंगल का प्रतीक मानने के कारण कई परिवार इन्हें संभालकर रखने और टूट जाने पर तुरंत अलग करने की परंपरा का पालन करते हैं।

भारत में अलग संस्कृतियों और मान्यताओं के चलते सावन से जुड़े रीति-रिवाज भले ही एक जैसे नहीं हैं। लेकिन हरी चूड़ियां पहनने की परंपरा प्रायः हर जगह प्रचलित है वहीं हरे वस्त्र पहनना, मेहंदी लगाना, झूला झूलना और सावन के गीत गाना भी इस दौरान प्रमुख चलन होता है।

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