Split in Samajwadi Party: ममता-उद्धव के बाद क्या अखिलेश यादव का है अगला नंबर? जानें विपक्षी दलों के टूटने की असली वजह

Split in Samajwadi Party: टीएमसी और शिवसेना (यूबीटी) में बगावत के बाद अब समाजवादी पार्टी में टूट की अटकलें तेज हैं। ओम प्रकाश राजभर के दावों पर अखिलेश यादव ने जवाब दिया है। विपक्षी दलों में उठापटक के बीच एनडीए के दो-तिहाई बहुमत की चर्चा भी तेज हो गई है।

Update:2026-06-17 18:13 IST

Split in Samajwadi Party: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को मिली हार के बाद विपक्षी खेमे में मानो भगदड़ मच गई है। राज्य में भाजपा की शानदार जीत के तुरंत बाद ममता बनर्जी की पार्टी दरकने लगी। शुरुआत बागी विधायकों से हुई और देखते ही देखते 20 से ज्यादा सांसदों ने ममता से किनारा कर लिया। इन सांसदों ने अपनी नई पार्टी 'नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (एनसीपीआई) बनाकर एनडीए को अपना समर्थन भी सौंप दिया है।

इस सियासी उठापटक के बीच अब महाराष्ट्र से भी बड़ी खबर आ रही है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) एक बार फिर से टूट की कगार पर खड़ी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि उद्धव गुट के 9 में से करीब छह सांसद जल्द ही एकनाथ शिंदे की शिवसेना का दामन थाम सकते हैं। इसे लेकर संजय राउत ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपना जमकर गुस्सा भी जाहिर किया है। अगर टीएमसी और शिवसेना के ये बागी सांसद पूरी तरह से एनडीए के पाले में आते हैं, तो सत्ताधारी गठबंधन का आंकड़ा 318 से 319 तक पहुंच जाएगा।

क्या अब समाजवादी पार्टी में भी मचेगा घमासान?

ममता और उद्धव की पार्टी में मची उथल-पुथल के बीच अब अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी अचानक चर्चा के केंद्र में आ गई है। उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर के एक हालिया दावे ने यूपी की सियासत में भूचाल ला दिया है। राजभर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर दावा किया कि समाजवादी पार्टी में बहुत जल्द एक बड़ी बगावत देखने को मिलेगी।

उनके मुताबिक, रामगोपाल यादव ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को एक चिट्ठी भी सौंपी है। राजभर ने तंज कसते हुए कहा कि यूपी का बच्चा-बच्चा जानता है कि खनन और गोमती रिवर फ्रंट घोटाले का मास्टरमाइंड कौन है। जांच एजेंसियों का शिकंजा कसता देख पूरी की पूरी सपा भाजपा में शामिल होने के लिए बेताब है। इस बयान के आते ही यह सवाल तैरने लगा है कि क्या बंगाल और महाराष्ट्र के बाद अब यूपी में भी विपक्ष बिखरने वाला है।

अखिलेश यादव का पलटवार: 'जो डरेगा, वो जाएगा'

राजभर के इन सनसनीखेज दावों पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी अपनी चुप्पी तोड़ी और स्थिति को साफ करने की कोशिश की। अखिलेश ने पार्टी में किसी भी तरह की टूट की खबरों को सिरे से खारिज कर दिया। हालांकि, उन्होंने दबी जुबान में यह भी मान लिया कि जिसे डर लगेगा, वो पार्टी छोड़ सकता है। अपनी बात रखते हुए अखिलेश ने कहा कि भाजपा का पुराना इतिहास रहा है कि वह विपक्षी नेताओं को डरा-धमकाकर या लालच देकर अपने पाले में खींचती है। उन्होंने याद दिलाया कि पहले भी कई विधायक, एमएलसी और राज्यसभा सांसद निजी स्वार्थ या खौफ के चलते सपा छोड़ चुके हैं।

2024 के झटके से उबरी भाजपा, फिर से हावी हुआ एनडीए

साल 2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी अपने दम पर बहुमत का जादुई आंकड़ा नहीं छू पाई थी। पार्टी को सिर्फ 240 सीटें मिली थीं, जबकि एनडीए का कुल आंकड़ा 292 तक पहुंचा था। केंद्र में सरकार तो बन गई, लेकिन विपक्ष पहले से कहीं ज्यादा हमलावर नजर आने लगा। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सड़क से लेकर संसद तक सरकार को घेरते रहे और कई लोगों ने तो यहां तक कह दिया कि यह सरकार शायद अपना कार्यकाल ही पूरा न कर पाए।

लेकिन इसके बाद हुए कई राज्यों के विधानसभा चुनावों ने पूरी तस्वीर ही बदल कर रख दी। महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार, असम और बंगाल जैसे अहम राज्यों में विपक्ष को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। इन जीतों ने भाजपा के भीतर एक नई ऊर्जा भर दी और उनका खोया हुआ मोमेंटम वापस लौट आया।

परिसीमन बिल: विपक्ष में सेंधमारी की असली वजह?

केंद्र में एनडीए के पास बहुमत होने के बावजूद विपक्ष में लगातार हो रही इस टूट के पीछे एक बहुत बड़ा सियासी गणित काम कर रहा है। संसद के पिछले सत्र में केंद्र सरकार लोकसभा में परिसीमन (डिलिमिटेशन) बिल लेकर आई थी। इस बिल का मकसद लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करना और महिला आरक्षण को 33 फीसदी तक ले जाना था। लेकिन संविधान संशोधन बिल होने के नाते इसे पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की दरकार थी, जो एनडीए के पास नहीं था। विपक्ष के कड़े विरोध के चलते यह बिल अटक गया, जिसे राहुल गांधी ने अपनी बड़ी जीत बताया था।

अब जरा इस पूरे खेल को समझिए। टीएमसी के 20 सांसदों का एनडीए को समर्थन देना और फिर शिवसेना यूबीटी के छह-सात सांसदों के पाला बदलने की अटकलें, यह सब उसी दो-तिहाई बहुमत को हासिल करने की कवायद मानी जा रही है। बिल पास कराने के लिए 363 सांसदों का समर्थन जरूरी है। सूत्रों का मानना है कि टीएमसी और उद्धव गुट के बाद भाजपा की नजर समाजवादी पार्टी पर हो सकती है, क्योंकि 37 सांसदों के साथ यह लोकसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है।

अगर सपा में कोई बड़ी टूट होती है, तो एनडीए 363 के जादुई आंकड़े के बेहद करीब पहुंच जाएगा। इसके अलावा, अब चूंकि डीएमके 'इंडिया' गठबंधन से अलग हो चुकी है, तो उसे भी सरकार अपने पाले में लाने की कोशिश कर सकती है। कुल मिलाकर रणनीति साफ नजर आ रही है, जैसे ही जरूरी नंबर पूरे होंगे, सरकार एक बार फिर से परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़ा यह अहम बिल संसद के पटल पर रख देगी।

Tags:    

Similar News