Jhansi News: हार्वेस्टर ने छीना बुंदेली चैतुओं का रोजगार, एक मशीन अकेले कर देती है सैकड़ों मजदूरों का काम

Jhansi News : मशीनों की वजह से चैतुओं को चैत्र मास में गेहूं की फसल की कटाई का मिलने वाला काम बंद हो गया है।;

Update:2025-04-02 19:09 IST

Harvester snatched employment (social media)

Jhansi News:  बीते दस वर्षों में हार्वेस्टर से गेहूं की फसल की कटाई होने लगी है, जिसकी वजह से बुंदेलखंड के लाखों खेतिहर मजदूरों पर मार पड़ी है। मशीनों की वजह से चैतुओं को चैत्र मास में गेहूं की फसल की कटाई का मिलने वाला काम बंद हो गया है। रेलवे स्टेशन के बाहर महानगरों को पलायन करने वाली गांवों की युवा शक्ति की भीड़ देखी जा रही है। यदि पलायन का ऐसा ही सिलसिला चलता रहा तो आने वाले समय में लोग चैतुआ शब्द ही भूल जाएंगे।

बुंदेलखंड में जिन लोगों के पास खेती की जमीन नहीं है, वह लोग दूसरों के खेतों में मजदूरी का कार्य करते हैं, जिससे उनके परिवार का भरण-पोषण होता है। यही वजह थी कि खेतिहर मजदूर साल भर चैत्र के महीने में होने वाली गेहूं की फसल की कटाई का इंतजार करते थे। समृद्ध किसानों के खेतों में फसल की कटाई के लिए खेतिहर मजदूरों के पूरे परिवार को फसल कटाई, मढ़ाई व ओसाई का काम मिल जाता था। जिससे उनके साल भर के खाने का इंतजाम हो जाता था। बीते दस-पंद्रह वर्ष में बुंदेलखंड में हार्वेस्टर से फसल की कटाई का चलन बढ़ गया है, जिसके चलते चैतुओं को काम मिलना बंद हो गया है। ऐसे में इनके समक्ष महानगरों को पलायन करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है। वहीं मजदूरों के पलायन करने की वजह से गांवों में खेतिहर मजदूरों की संख्या भी बहुत कम हो गई है, जो गांव में बचे हैं उन्हें हार्वेस्टर की वजह से काम नहीं मिल रहा है।

आसानी से नहीं मिल रहे मजदूर

प्रगतिशील संपन्न किसान आनंद श्रोतिय और वीर सिंह राजपूत का कहना है कि कटाई, मढ़ाई और ओसाई के लिए गांव में आसानी से मजदूर नहीं मिलते हैं। ऐसे में हार्वेस्टर का सहारा लेना पड़ता है। इससे भूसा भले नहीं मिलता, लेकिन साफ अनाज मिल जाता है। इसके साथ ही कई दिनों तक कटाई और गहाई की देख-रेख करने से मुक्ति भी मिल जाती है।

उदय लोहारी ने कहा पलायन ने बिगाड़े हालात

भाजपा के वरिष्ठ नेता उदय लोहारी का कहना है कि पूर्व में बुंदेलखंड में गेहूं की फसल की कटाई, मढ़ाई ओसाई सहित अन्य कृषि कार्य करने के लिए गांव में ही मजदूर मिल जाते थे। फसल काटने वाले मजदूरों को बुंदेलखंड में चैतुआ कहा जाता है। चैतुआ को फसल काटने की मजदूरी के साथ गेहूं भी मिल जाता था जिससे उसका जीवन यापन हो जाता था। हालांकि गांवों में ही खेतिहर मजदूरों को मनरेगा सहित कई अन्य योजनाओं में काम मिल रहा है। वहीं शासन की विभिन्न योजनाओं के तहत मकान, शौचालय, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई सहित इलाज की भी सुविधाएं दी जा रहीं हैं। इसके बाद भी गांवों से पलायन हो रहा है। कोरोना महामारी के समय जिस तरह से महानगरों से मजदूरों के साथ दुर्व्यवहार करके उन्हें गांव वापस भेजा गया था, उसे देखकर लगा था कि गांव की युवा शक्ति अब गांव में ही रहकर काम करेगी। लेकिन, साल भर भी नहीं बीता और युवा शक्ति फिर से महानगरों को पलायन कर गई। ऐसे में गांवों में मजदूरों की कमी हो गई है। फसल काटने को मजदूर नहीं मिल रहे हैं। ऐसे में बड़े किसानों को मशीनों का सहारा लेना पड़ रहा है।

केके मिश्रा ने कहा गांवों में ही हैं बहुत काम

जिला कृषि अधिकारी के के मिश्रा का कहना है कि सरकार कृषि कार्य में मशीनीकरण को बढ़ावा दे रही है ताकि किसान की उपज बिना किसी जोखिम के उसके गोदाम तक पहुंच जाए। ऐसे में किसान भी अपना पैसा बचाने के लिए मशीनों पर आश्रित हो गया है। खेतिहर मजदूरों को शासन की विभिन्न योजनाओं में काम दिए जा रहे हैं ऐसे में उन्हें महानगरों को पलायन नहीं करना चाहिए।

हार्वेस्टर से संपन्न किसानों को होती है काफी बचत

कृषि विभाग के मुताबिक एक हेक्टेयर खेत की कटाई, मढ़ाई व ओसाई के काम में कम से कम 45 मजदूरों की आवश्यकता होती है। जिससे यदि एक मजदूर की 500 रुपए प्रतिदिन मजदूरी मान ली जाए तो कम से कम 22 हजार रुपए खर्च होते हैं। यह काम पूरे एक दिन में होता है। जबकि वहीं एक हार्वेस्टर 5000 रुपए में एक हेक्टेयर खेत की कटाई मात्र दो घंटे में कर देता है। जिससे किसान को एक हेक्टेयर खेत की हार्वेस्टर से कटाई कराने में 17000 रुपए की बचत होती है। हालांकि इसे मानवीय दृष्टिकोण से हम गलत मान सकते हैं। लेकिन किसान को भी अपना फायदा देखना है तो उसे मशीनों से काम कराने से कोई रोक भी नहीं सकता है।

Tags:    

Similar News