Meerut News: कदमों में रफ्तार, जुबां पर भोले का नाम, आठ घंटे में हरिद्वार से मेरठ डाक कांवड़
Meerut News: हरिद्वार से मेरठ तक डाक कांवड़िए 8 से 10 घंटे में पहुंचने का लक्ष्य लेकर दौड़ रहे हैं। 25-45 युवाओं की टोली दो महीने पहले से तैयारी करती है।
Meerut News: रात का सन्नाटा हो या दिन की तपती सड़क... कंधे पर कांवड़, हाथ में तिरंगा और जुबां पर ‘हर-हर महादेव’ का जयघोष। कदम थमते नहीं और निगाहें मंजिल से हटती नहीं। हरिद्वार से गंगाजल लेकर मेरठ और आसपास के शिवालयों की ओर दौड़ती डाक कांवड़ की टोलियां इन दिनों सड़कों पर आस्था, अनुशासन और सामूहिक संकल्प की अनोखी तस्वीर पेश कर रही हैं।
सामान्य कांवड़ यात्रा में श्रद्धालु कई दिनों में दूरी तय करते हैं, लेकिन डाक कांवड़ियों का संकल्प अलग है। ये युवा हरिद्वार से गंगाजल उठाने के बाद कुछ ही घंटों में अपने गंतव्य तक पहुंचने की कोशिश करते हैं। कई टोलियां आठ से दस घंटे में हरिद्वार से मेरठ पहुंचने का लक्ष्य लेकर दौड़ रही हैं। इनके लिए यह केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि महीनों की तैयारी के बाद खुद को साबित करने का मौका भी है।
दो महीने पहले शुरू हो जाती है तैयारी
डाक कांवड़ की असली यात्रा सावन शुरू होने से करीब दो महीने पहले ही शुरू हो जाती है। 25 से 45 युवाओं की टोली बनती है और सुबह की नींद छोड़कर दौड़ और व्यायाम का अभ्यास शुरू होता है। शुरुआत कम दूरी से होती है और धीरे-धीरे दौड़ का समय और दूरी बढ़ाई जाती है, ताकि शरीर लगातार कई घंटे तक रफ्तार बनाए रखने के लिए तैयार हो सके।
अलवर डाक कांवड़ लेकर जा रहे राहुल चौधरी बताते हैं कि अभ्यास धीरे-धीरे कठिन किया जाता है। शरीर को लंबी दूरी की दौड़ का अभ्यस्त बनाने के साथ ही सांस और गति को नियंत्रित रखने का अभ्यास कराया जाता है।
जयराम के मुताबिक, तैयारी में खानपान की भी अहम भूमिका है। तला-भुना और भारी भोजन कम किया जाता है। पौष्टिक भोजन और पर्याप्त पानी के जरिए शरीर को लंबी दूरी की दौड़ के लिए तैयार किया जाता है।
एटा निवासी आशुतोष कहते हैं कि डाक कांवड़ियों का लक्ष्य पहले दिन से साफ रहता है—हरिद्वार पहुंचना, गंगाजल उठाना और तय समय में अपने शिवालय तक पहुंचकर जलाभिषेक करना।
अकेले नहीं, पूरी टोली की जीत
डाक कांवड़ की सबसे बड़ी ताकत इसकी सामूहिकता है। एक टोली में 25 से 45 तक युवा होते हैं। हर सदस्य की अपनी जिम्मेदारी होती है। कोई आगे रहकर गति बनाए रखता है तो कोई पीछे चल रहे साथियों का हौसला बढ़ाता है। पूरी टोली एक-दूसरे की रफ्तार के साथ कदम मिलाकर चलती है।
यही टीम भावना डाक कांवड़ को सामान्य दौड़ से अलग बनाती है। यहां मंजिल तक पहुंचना किसी एक युवक की उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरी टोली के संकल्प की जीत होती है।
पैर जवाब देने लगते हैं, लेकिन जयघोष रफ्तार बढ़ा देता है
सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करना आसान नहीं होता। लगातार दौड़ने से पैर जवाब देने लगते हैं, शरीर पसीने से तर हो जाता है और सांसें तेज चलने लगती हैं। कई बार थकान इतनी बढ़ जाती है कि कदम रोकने का मन करता है।
लेकिन तभी टोली में किसी एक की आवाज गूंजती है—‘हर-हर महादेव।’
इसके साथ ही बाकी युवा भी उसी ऊर्जा में शामिल हो जाते हैं। कुछ क्षण पहले तक थके कदम फिर रफ्तार पकड़ लेते हैं। सड़क पर दौड़ती 25 से 45 युवाओं की टोली, कंधों पर सजी कांवड़ और गूंजता शिवभक्ति का जयघोष राहगीरों का भी ध्यान खींचता है।
समय की पाबंदी से लेकर आपसी तालमेल तक
डाक कांवड़ में केवल शारीरिक क्षमता ही नहीं, बल्कि समय की पाबंदी और अनुशासन भी जरूरी है। यात्रा शुरू होने से पहले भोजन, पानी, विश्राम और मार्ग की व्यवस्था तक तय कर ली जाती है। टोली के सदस्यों को यह भी मालूम रहता है कि किसे किस समय क्या जिम्मेदारी निभानी है।
मेरठ निवासी राहुल कहते हैं कि महीनों की तैयारी के बाद जब टोली हरिद्वार से निकलती है तो हर सदस्य अपने संकल्प और जिम्मेदारी से परिचित होता है। इसी वजह से पूरी यात्रा के दौरान आपसी तालमेल बना रहता है।
मंजिल पर पहुंचकर जब यही गंगाजल भोलेनाथ को अर्पित किया जाता है तो घंटों की दौड़, थकान और रास्ते की मुश्किलें पीछे छूट जाती हैं। डाक कांवड़ का यही रंग है—कदम दौड़ते हैं, टोली साथ चलती है और मन में सिर्फ एक मंजिल रहती है... भोलेनाथ का जलाभिषेक।
Meerut News: कांवड़ में ‘Gen-Z’ का जलवा, भोले की भक्ति में दिखा बदलता भारत
Meerut News: सड़क पर दूर से आती विशाल कांवड़... कहीं नटराज का तांडव, कहीं रौद्र रूप में महादेव, कहीं भारत माता तो कहीं अग्नि-5। कुछ कदम आगे बढ़िए तो 1857 के गुमनाम नायक की कहानी और फिर पर्यावरण बचाने का संदेश। यह सिर्फ कांवड़ नहीं, बदलती पीढ़ी की सोच का चलता-फिरता कैनवास है।
हरिद्वार से गंगाजल लेकर मेरठ के रास्ते अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे शिवभक्तों की इस यात्रा में इस बार Gen-Z ने कांवड़ का ट्रेंड ही बदल दिया है। युवाओं ने तकनीक, डिजाइन और क्रिएटिविटी को आस्था के साथ जोड़कर ऐसी विशाल कांवड़ें तैयार की हैं, जिन्हें देखने के लिए रास्ते में लोग रुक रहे हैं। इन कांवड़ों को तैयार करने में 25 लाख रुपये तक खर्च किए गए हैं।
भोले की भक्ति... और ‘न्यू इंडिया’ की झलक
कांवड़ अब सिर्फ फूल, झालर और रोशनी से सजी संरचना नहीं रह गई। युवाओं ने इसे अपनी बात कहने का माध्यम बना दिया है। केदारनाथ की प्रतिकृति जहां शिवभक्ति का प्रतीक है, वहीं भारत माता और अग्नि-5 की झांकियां देशभक्ति और वैज्ञानिक क्षमता का संदेश देती हैं।
लकड़ी, चारकोल और दूसरी सामग्रियों से तैयार विशाल झांकियों में पौराणिक प्रसंगों को आधुनिक तकनीक के साथ पेश किया गया है। भगवान शिव का रौद्र रूप, नटराज, तांडव, मां काली और रुद्र अवतार हनुमान जैसे प्रसंगों को इस तरह सजाया गया है कि कांवड़ मार्ग पर ये चलते-फिरते मंच नजर आते हैं।
कांवड़ में लौटे इतिहास के ‘भूले हुए चेहरे’
इस बार युवाओं ने इतिहास को भी कांवड़ में जगह दी है। दिल्ली के करोलबाग से आई एक झांकी 1857 के जननायक मातादीन वाल्मीकि को समर्पित है। दिल्ली के तिगरी क्षेत्र के युवाओं ने भगवान शिव के साथ दादा सबल सिंह और दादा केसर सिंह की जीवनगाथा भी झांकी में दिखाई है।
25 सदस्यीय वाल्मीकि युवा शक्ति ग्रुप की इस पहल ने कांवड़ को धार्मिक आस्था से आगे बढ़ाकर इतिहास और सामाजिक सरोकार से जोड़ दिया।
कांवड़ के साथ 1,100 पौधे... प्रसाद भी, संदेश भी
युवाओं की क्रिएटिविटी का एक और चेहरा पर्यावरण वाली कांवड़ में दिखाई देता है। दिल्ली निवासी सोनू 225 किलोमीटर की यात्रा में 1,100 पौधे साथ लेकर चल रहे हैं। हरिद्वार से शुरू हुई यात्रा में वह रास्ते में लोगों को पौधे ‘भोले के प्रसाद’ के रूप में बांट रहे हैं।
पर्यावरण का संदेश सिर्फ पौधों तक नहीं रखा गया। उन्होंने अपने वाहन और वेशभूषा को भी हरी घास का स्वरूप दिया है।
25 लाख की कांवड़, लेकिन कीमत सिर्फ पैसे की नहीं
विशाल कांवड़ों पर लाखों रुपये खर्च करने के पीछे युवाओं का मकसद केवल आकर्षण पैदा करना नहीं है। इन कांवड़ों में उनकी आस्था के साथ उनकी सोच भी दिखाई दे रही है—धर्म, इतिहास, विज्ञान, देशभक्ति और पर्यावरण... सब एक साथ।
यही वजह है कि कांवड़ मार्ग पर गुजरती ये झांकियां कुछ सेकंड के लिए लोगों को रोक देती हैं। कोई महादेव का रौद्र रूप देख रहा है, कोई अग्नि-5 की प्रतिकृति, कोई मातादीन वाल्मीकि की कहानी पढ़ रहा है तो कोई पौधा लेकर आगे बढ़ रहा है।
कांवड़ का रूप बदला है, आस्था नहीं। Gen-Z ने परंपरा को छोड़ने के बजाय उसे अपनी भाषा और तकनीक में पेश किया है। इस बार मेरठ की सड़कों पर सिर्फ शिवभक्ति नहीं चल रही, बदलते भारत की एक पूरी कहानी चल रही है।