Sonbhadra: सोनभद्र में आंगनबाड़ी भर्ती पर उठे गंभीर सवाल, सलखन के बाद अब असनहर भर्ती भी विवादों में
Sonbhadra News: सोनभद्र के असनहर गांव में आंगनबाड़ी भर्ती प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठे हैं। फर्जी निवास प्रमाण पत्र और अनियमितताओं के आरोपों के बीच जांच रिपोर्ट सामने आने के बावजूद कार्रवाई न होने से मामला विवादों में है।
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Sonbhadra News: उत्तर प्रदेश सरकार भले ही पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया और जीरो टॉलरेंस नीति का दावा करती हो, लेकिन सोनभद्र जिले में आंगनबाड़ी भर्ती प्रक्रिया ने इन दावों की पोल खोलकर रख दी है। जिले के असनहर गांव में आंगनबाड़ी सहायिका भर्ती को लेकर सामने आया मामला अब प्रशासनिक कार्यशैली, स्थानीय सत्ता और विभागीय भ्रष्टाचार पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। जांच में सत्य सामने आने के बावजूद पीड़िता आज भी न्याय के लिए अधिकारियों के दफ्तरों की चौखट नापने को मजबूर है।
पूरा मामला असनहर प्रथम केंद्र के रिक्त आंगनबाड़ी पद से जुड़ा हुआ है। गांव की मूल निवासी और पात्र अभ्यर्थी बबिता गुप्ता ने नियमानुसार आवेदन किया था। आरोप है कि गांव के प्रधान ने अपने प्रभाव और रसूख का इस्तेमाल करते हुए अपनी पुत्री सुनीता को लाभ पहुंचाने के लिए सरकारी तंत्र का खुला दुरुपयोग किया। बताया जा रहा है कि सुनीता की शादी कई वर्ष पहले छत्तीसगढ़ में हो चुकी है और वह वहीं निवास करती है, इसके बावजूद स्थानीय लेखपाल से मिलीभगत कर उसका फर्जी निवास प्रमाण पत्र तैयार कराया गया और उसे भर्ती की प्रथम वरीयता सूची में शामिल करा दिया गया।
पीड़िता बबिता गुप्ता को जब इस पूरे खेल की जानकारी हुई तो उन्होंने हार मानने के बजाय सबूत जुटाने शुरू किए। उन्होंने विपक्षी अभ्यर्थी के विवाह कार्ड, ग्राम प्रतिनिधियों के बयान तथा छत्तीसगढ़ में उसके परिवार और बच्चों से जुड़े प्रमाण इकट्ठा कर जिला कार्यक्रम अधिकारी कार्यालय में प्रस्तुत किए। लेकिन आरोप है कि विभाग ने निष्पक्ष कार्रवाई करने के बजाय मामले को दबाने का प्रयास शुरू कर दिया।
जांच में खुल गई पोल, रिपोर्ट ने खोली फर्जीवाड़े की परतें
मामला जब जिलाधिकारी के संज्ञान में पहुंचा तो उनके निर्देश पर जांच टीम गठित की गई। नायब तहसीलदार जितेंद्र कुमार के नेतृत्व में हुई जांच में जो तथ्य सामने आए, उन्होंने पूरे मामले की तस्वीर साफ कर दी। जांच रिपोर्ट संख्या 845/45 में स्पष्ट उल्लेख किया गया कि सुनीता की शादी लगभग चार वर्ष पहले छत्तीसगढ़ में हो चुकी है और वह असनहर गांव की वास्तविक निवासी नहीं है। रिपोर्ट में उसके निवास प्रमाण पत्र को अवैध बताया गया।
इतनी स्पष्ट जांच रिपोर्ट आने के बावजूद विभागीय स्तर पर कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी। पीड़िता का आरोप है कि अधिकारियों ने रिपोर्ट को ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड करने के बजाय फाइलों में दबाकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया। यही नहीं, पीड़िता को लगातार अलग-अलग दफ्तरों के चक्कर कटवाए जाते रहे।मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब आरोप लगा कि भर्ती प्रक्रिया में हुए खेल को छिपाने के लिए पीड़िता का आय प्रमाण पत्र तक निरस्त करा दिया गया, ताकि उसकी पात्रता खत्म हो जाए और वह भर्ती प्रक्रिया से स्वतः बाहर हो जाए। सवाल यह उठता है कि यदि जांच में सब कुछ स्पष्ट हो चुका था तो दोषियों पर कार्रवाई करने के बजाय पीड़िता को ही क्यों प्रताड़ित किया गया?
“लेनदेन” नहीं हुआ तो भर्ती ही रद्द करने की तैयारी?
पीड़िता का आरोप है कि जब अधिकारियों की कथित “मंशा” पूरी नहीं हुई तो अब पूरा मामला ही नए तरीके से मोड़ने की कोशिश की जा रही है। सूत्रों के मुताबिक अब विभाग भर्ती प्रक्रिया को निरस्त कर दोबारा नई भर्ती कराने की तैयारी में है। जबकि पीड़िता का कहना है कि यदि जांच में विपक्षी अभ्यर्थी अपात्र साबित हो चुकी है तो नियमानुसार उसे नियुक्ति दी जानी चाहिए।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि भर्ती प्रक्रिया 90 दिनों के भीतर पूरी की जानी थी तो आखिर मामला इतने समय तक लंबित क्यों रखा गया? किसके दबाव में फाइलें रोकी गईं? और क्यों एक पात्र अभ्यर्थी को न्याय के बजाय केवल तारीख पर तारीख दी जाती रही?जब इस संबंध में जिला कार्यक्रम अधिकारी से दूरभाष पर संपर्क किया गया तो उन्होंने स्पष्ट जवाब देने के बजाय गोलमोल बातें कीं। वहीं सीडीपीओ बभनी ने कहा कि यदि जांच 90 दिनों के भीतर पूरी हो जाती तो पुरानी प्रक्रिया से नियुक्ति संभव थी, लेकिन अब नए सिरे से भर्ती होगी। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि अंतिम निर्णय जिला कार्यक्रम अधिकारी स्तर से ही लिया जाएगा।
अब उठ रहे हैं ये बड़े सवाल
जब जांच में बबिता गुप्ता की दावेदारी सही पाई गई, तो अब तक नियुक्ति क्यों नहीं दी गई?
फर्जी निवास प्रमाण पत्र बनाने वाले लेखपाल और कथित रूप से प्रभाव का इस्तेमाल करने वाले ग्राम प्रधान पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
क्या सरकारी भर्ती प्रक्रियाएं अब केवल रसूख और पहुंच वालों के लिए रह गई हैं?
आखिर किस कारण भर्ती फाइल महीनों तक दबाकर रखी गई?
क्या सोनभद्र में सरकारी योजनाएं और भर्तियां अब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती रहेंगी?
पूरा मामला अब जिले में चर्चा का विषय बन चुका है। सलखन भर्ती विवाद के बाद असनहर का यह मामला भी प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रहा है। पीड़िता ने जिलाधिकारी से न्याय की गुहार लगाई है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। अब देखना यह होगा कि सरकार की “पारदर्शी व्यवस्था” का दावा जमीन पर उतरता है या फिर यह मामला भी फाइलों में दफन होकर रह जाएगा।