चंद्रशेखर आजाद करेंगे यूपी में ‘बड़ा उपलटफेर’? सत्ता परिवर्तन यात्रा से सियासत में बढ़ी हलचल

Chandrashekhar Azad: आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और सांसद चंद्रशेखर आजाद ने प्रदेश में जनाधार मजबूत करने के लिए ‘सत्ता परिवर्तन यात्रा’ निकालने का ऐलान किया है

Update:2026-05-06 15:45 IST

Chandrashekhar Azad

Chandrashekhar Azad: 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी तेज होती जा रही है। इसी क्रम में आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) ने भी अपनी सक्रियता बढ़ाते हुए बड़ा राजनीतिक दांव चलने की तैयारी कर ली है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और सांसद चंद्रशेखर आजाद ने प्रदेश में जनाधार मजबूत करने के लिए ‘सत्ता परिवर्तन यात्रा’ निकालने का ऐलान किया है, जो 2 जून 2026 से शुरू होगी। इस यात्रा का उद्देश्य प्रदेश के सभी 75 जिलों और 403 विधानसभा सीटों पर पहुंचकर गांव-गांव, कस्बे-कस्बे और शहरों में आम जनता से सीधा संवाद स्थापित करना है।

विपक्ष को देंगे चुनौती

पार्टी का लक्ष्य है कि वह बहुजन समाज पार्टी, भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे बड़े दलों को चुनौती देने की स्थिति में खुद को खड़ा करे। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा समय में आसपा का जनाधार इतना व्यापक नहीं है कि वह अकेले दम पर बीजेपी को सत्ता से बाहर कर सके। प्रदेश में प्रमुख विपक्षी दल भी फिलहाल भाजपा के मुकाबले कमजोर नजर आते हैं। कांग्रेस लंबे समय से यूपी में संघर्ष कर रही है, जबकि बीएसपी का जनाधार लगातार घट रहा है। समाजवादी पार्टी जरूर एक मजबूत चुनौती के रूप में उभरी है और 2024 के लोकसभा चुनाव में उसने भाजपा को झटका भी दिया था।

दलित, मुस्लिम और अति पिछड़े वर्ग को करेंगे एकजुट 

ऐसे में आसपा की रणनीति दलित, मुस्लिम और अति पिछड़े वर्ग को एकजुट करने पर केंद्रित है। पार्टी का मानना है कि यदि इन वर्गों को एक मंच पर लाया जा सके, तो भले सत्ता न मिले, लेकिन एक मजबूत राजनीतिक पहचान जरूर बनाई जा सकती है। हालांकि, यह राह आसान नहीं है। दलित वोट बैंक पर बीएसपी, मुस्लिम मतदाताओं पर सपा और अति पिछड़ों पर भाजपा की मजबूत पकड़ मानी जाती है। इसके अलावा, समाजवादी पार्टी पहले से ही ‘पीडीए’ (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले के जरिए इन वर्गों को साधने की कोशिश कर रही है।

सीटों के बंटवारे को लेकर सहमति नहीं

राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि यदि आसपा अकेले चुनाव लड़ती है, तो उसका असर मुख्य रूप से सपा-कांग्रेस गठबंधन के वोट बैंक पर पड़ सकता है, जिससे भाजपा को अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है। यही कारण है कि सपा के कुछ नेता चंद्रशेखर आजाद के साथ गठबंधन की संभावनाएं तलाशने की सलाह दे रहे हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी सपा और आसपा के बीच गठबंधन की बातचीत अंतिम चरण तक पहुंच गई थी, लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर सहमति नहीं बन पाई।

प्रदेश की सामाजिक संरचना पर नजर डालें तो दलित आबादी लगभग 22 प्रतिशत है और 150 से अधिक सीटों पर इनका प्रभाव निर्णायक है। वहीं, मुस्लिम मतदाता करीब 130 से अधिक सीटों पर हार-जीत तय करने की स्थिति में हैं। इसके अलावा, अति पिछड़ी जातियां, जिनकी आबादी 40 प्रतिशत से अधिक मानी जाती है, करीब 100 से 140 सीटों पर चुनावी परिणामों को प्रभावित करती हैं। ऐसे में आसपा इन सभी वर्गों को साधने की कोशिश में जुटी है। चंद्रशेखर आजाद का कहना है कि यह यात्रा सिर्फ राजनीतिक अभियान नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का आंदोलन है। उनका दावा है कि पार्टी हर घर तक पहुंचकर लोगों को जोड़ने और मौजूदा सरकार के खिलाफ माहौल बनाने का काम करेगी। अब देखना होगा कि यह रणनीति 2027 के चुनावी समीकरणों को कितना प्रभावित कर पाती है।

Tags:    

Similar News