Mahakumbh 2021: जानिए कुंभ का रहस्य, इन 4 जगहों पर ही क्यों लगता है

सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुकुंभ पर्व गोदावरी के तट पर नासिक में होता है। अमावस्या के दिन बृहस्पति, सूर्य एवं चन्द्र के कर्क राशि में प्रवेश होने पर भी कुंभ पर्व गोदावरी तट पर आयोजित होता है

Published by suman Published: January 18, 2021 | 10:17 pm
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सोशल मीडिया से फोटो

लखनऊ: दुनिया भर में किसी भी धार्मिक प्रयोजन में भक्तों का सबसे बड़ा संग्रहण है कुंभ मेला। कुंभ का पर्व हर 12 साल के अंतराल पर चारों पवित्र तीर्थ स्थलों पर मनाया जाता है। यह हर 12 साल बारी बारी से किसी एक पवित्र नदी के तट पर मनाया जाता है- हरिद्वार में गंगा, उज्जैन में शिप्रा, नासिक में गोदावरी और इलाहाबाद में त्रिवेणी संगम जहां गंगा, यमुना और सरस्वती मिलती हैं।

इस बार महाकुंभ  12 साल से एक साल पहले ही लग रहा है। इसका आयोजन 12 साल की जगह 11 साल पर हो रहा है। इस वर्ष महाकुंभ का आयोजन हरिद्वार में है। इस उत्सव को लेकर श्रद्धालुओं में काफी उत्साह है। श्रद्धालु पुण्य कमाने के लिए महाकुंभ में जाने की तैयारी शुरू कर दिये है और प्रशासन भी मुस्तैद है।

 

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इस समय लगता है कुंभ

 

जब बृहस्पति कुम्भ राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, तब कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है। प्रयाग का कुम्भ मेला सभी मेलों में सर्वाधिक महत्व रखता है।कुंभ का अर्थ है- कलश, ज्योतिष शास्त्र में कुम्भ राशि का भी यही चिह्न है। कुंभ मेले की पौराणिक मान्यता अमृत मंथन से जुड़ी हुई है।

 दरअसल, अमृत पर अधिकार को लेकर देवता और दानवों के बीच लगातार बारह दिन तक युद्ध हुआ था। जो मनुष्यों के बारह वर्ष के समान हैं। अतएव कुंभ भी बारह होते हैं। उनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और आठ कुंभ देवलोक में होते हैं।

इन स्थानों पर कुम्भ मेला

असुरों से अमृत को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने वह पात्र अपने वाहन गरुड़ को दे दिया। असुरों ने जब गरुड़ से वह पात्र छीनने का प्रयास किया तो उस पात्र में से अमृत की कुछ बूंदें छलक कर इलाहाबाद, नासिक, हरिद्वार और उज्जैन में गिरीं। तभी से प्रत्येक 12 वर्षों के अंतराल पर इन स्थानों पर कुम्भ मेला आयोजित किया जाता है।

इन देव दैत्यों का युद्ध सुधा कुंभ को लेकर 12 दिन तक 12 स्थानों में चला और उन 12 स्थलों में सुधा कुंभ से अमृत छलका जिनमें से चार स्थल मृत्युलोक में है, शेष आठ इस मृत्युलोक में न होकर अन्य लोकों में (स्वर्ग आदि में) माने जाते हैं। 12 वर्ष के मान का देवताओं का बारह दिन होता है। इसीलिए 12वें वर्ष ही सामान्यतया प्रत्येक स्थान में कुंभ पर्व की स्थिति बनती है।

 

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महाकुंभ में स्नान करने से व्यक्ति को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है । मान्यता है कि कुंभ में स्नान करने पर पितरों का भी उद्धार हो जाता है। इस बार कुंभ में चार शाही और छह मुख्य स्नान होंगे। कुंभ मेला का आयोजन 12 साल बाद होता है, लेकिन साल 2022 में बृहस्पति कुंभ राशि में नहीं होंगे। इसलिए इस बार 11वें साल यानि कि एक साल पहले ही महाकुंभ पर्व का आयोजन किया जा रहा है। इस बार पहला शाही स्नान 11 मार्च 2021, शिवरात्रि के दिन पड़ेगा।

 

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कथा और महत्व- मोक्ष की प्राप्ति

पद्म पुराण के अनुसार जो व्यक्ति महाकुंभ में स्नान करता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।  तीर्थों में संगम को सभी तीर्थों का अधिपति माना गया है। इस संगम स्थल पर ही अमृत की बूंदें गिरी थी, इसीलिए यहां स्नान का विशेष महत्व है।

समुद्र मंथन की कथा में कहा गया है कि कुंभ पर्व का सीधा सम्बन्ध तारों से है। अमृत कलश को स्वर्गलोक तक ले जाने में जयंत को 12 दिन लगे। देवों का एक दिन मनुष्यों के 1 वर्ष के बराबर है। इसीलिए तारों के क्रम के अनुसार हर 12वें वर्ष कुंभ पर्व विभिन्न तीर्थ स्थानों पर आयोजित किया जाता है।

युद्ध के दौरान सूर्य, चंद्र और शनि आदि देवताओं ने कलश की रक्षा की थी, अतः उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, तब कुंभ का योग होता है और चारों पवित्र स्थलों पर प्रत्येक तीन वर्ष के अंतराल पर क्रमानुसार कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है।

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कुंभ,अर्धकुंभ और सिंहस्थ क्यों कहते हैं…

कलश को कुंभ कहते  है। कुंभ का अर्थ होता है घड़ा। इस पर्व का संबंध समुद्र मंथन के दौरान अंत में निकले अमृत कलश से जुड़ा है। देवता-असुर जब अमृत कलश को एक दूसरे से छीन रह थे तब उसकी कुछ बूंदें धरती की तीन नदियों में गिरी थीं। जहां जब ये बूंदें गिरी थी उस स्थान पर तब कुंभ का आयोजन होता है। उन तीन नदियों के नाम है:- गंगा, गोदावरी और क्षिप्रा।

कुंभ 4 स्थानों पर प्रत्येक तीन वर्ष के अंतराल में कुंभ का आयोजन होता है, इसीलिए किसी एक स्थान पर प्रत्येक 12 वर्ष बाद ही कुंभ का आयोजन होता है। जैसे हरिद्वार में कुंभ का अयोजन हो रहा है, तो उसके बाद प्रयाग और फिर अगले तीन वर्ष बाद नासिक में कुंभ का आयोजन होगा।

अर्ध का अर्थ है आधा। हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का आयोजन होता है। पौराणिक ग्रंथों में भी कुंभ एवं अर्ध कुंभ के आयोजन को लेकर ज्योतिषीय जानकारी दी गई। कुंभ पर्व हर 3 साल के अंतराल पर हरिद्वार से शुरू होता है। हरिद्वार के बाद कुंभ पर्व प्रयाग नासिक और उज्जैन में मनाया जाता है। प्रयाग और हरिद्वार में मनाए जानें वाले कुंभ पर्व में एवं प्रयाग और नासिक में मनाए जाने वाले कुंभ पर्व के बीच में 3 सालों का अंतर होता है। यहां माघ मेला संगम पर आयोजित एक वार्षिक समारोह है।

 

 

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हरिद्वार में कुंभ 

हरिद्वार का सम्बन्ध मेष राशि से है। कुंभ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुंभ का पर्व हरिद्वार में आयोजित किया जाता है। हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का भी आयोजन होता है।

प्रयाग में कुंभ

 

कुंभ का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि यह 12 वर्षो के बाद गंगा, यमुना एवं सरस्वती के संगम पर आयोजित किया जाता है। ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार  मेष राशि के चक्र में बृहस्पति एवं सूर्य और चन्द्र के मकर राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन कुंभ का पर्व प्रयाग में आयोजित किया जाता है। एक अन्य गणना के अनुसार मकर राशि में सूर्य का एवं वृष राशि में बृहस्पति का प्रवेश होनें पर कुंभ पर्व प्रयाग में आयोजित होता है।

 

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नासिक में कुम्भ

12  वर्षों में एक बार सिंहस्थ कुंभ मेला नासिक एवं त्रयम्बकेश्वर में आयोजित होता है। सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुकुंभ पर्व गोदावरी के तट पर नासिक में होता है। अमावस्या के दिन बृहस्पति, सूर्य एवं चन्द्र के कर्क राशि में प्रवेश होने पर भी कुंभ पर्व गोदावरी तट पर आयोजित होता है।

उज्जैन में कुंभ

 सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर यह पर्व उज्जैन में होता है। इसके अलावा कार्तिक अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र के साथ होने पर एवं बृहस्पति के तुला राशि में प्रवेश होने पर मोक्षदायक कुंभ उज्जैन में आयोजित होता है।

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